डियर जिंदगी : मेरा होना सबका होना है!

दुविधा और मन की दुर्बलता से जैसे ही आशंका के गुब्‍बारे मिलते हैं, वह मन में ऐसी गरम हवा का निर्माण करते हैं, जिसमें भीतर की कोमलता, उदारता और स्‍नेह कुछ ही मिनट में छू मंतर हो जाते हैं.

डियर जिंदगी : मेरा होना सबका होना है!

किसी के होने के क्‍या मायने हैं! किसी का होना अपरिचत के प्रति एक किस्‍म का स्‍नेह है. बचे रहने का अर्थ है, मनुष्‍यता अभी शेष है. क्योंकि हर जिंदगी कीमती है. लेकिन जब कभी जिंदगी पर मुश्किल के बादल मंडराते हैं, सबसे पहले वह हमारे भीतर आशंका के गुब्‍बारे छोड़ देते हैं.

दुविधा और मन की दुर्बलता से जैसे ही आशंका के गुब्‍बारे मिलते हैं, वह मन में ऐसी गरम हवा का निर्माण करते हैं, जिसमें भीतर की कोमलता, उदारता और स्‍नेह कुछ ही मिनट में छू मंतर हो जाते हैं.

इसलिए केवल अपने मन में ही नहीं, बल्कि उन सबके मन में जिन्‍हें हम जानते हैं, मानते हैं, प्रेम करते हैं, उनके मन निरंतर टटोलते रहना होगा. ठीक वैसे ही जैसे प्री-पेड मोबाइल वाले लोग अपने बैलेंस के प्रति सजग रहते हैं. जिससे जरूरी ‘टॉक-टाइम’ बचा रहे!

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ठीक वैसे ही हमें और प्रियजन के मन को जांचते रहना है. उनके मन में कोई उथल-पुथल तो नहीं चल रही, इसके प्रति खासी सजगता रखनी होगी.

आपने अपने जीवन में संभवत: कभी न कभी नदी, गहरा नाला पार किया होगा. ऐसा करते समय मां अक्‍सर सिखाती कि एक दूसरे का हाथ कसकर पकड़े रहो. इससे शक्ति मिलती है, हम तेज़ धारा में भी गिरेंगे नहीं, आसानी से नदी पार हो जाएगी.

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जीवन का भी यही नियम है. एकदम सरल, सहज.

हां, हम उसे कभी-कभी मुश्किल कर देते हैं. जीवन की तेज़ धारा में तो हम दूसरे का हाथ पकड़ना चाहते हैं, लेकिन जब धारा सहज तो हो दूसरों के साथ और हाथ का महत्‍व भूल जाते हैं. इस भूल जाने और पकड़े रहने में ही जीवन का सारा सार है.

एक छोटे से किस्‍से से इस ‘पकड़े’ रहने की कोमतला को समझाने का प्रयास करता हूं.

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यह किस्‍सा 2004 के अक्‍टूबर की बात है. मैंने भोपाल की सुकून भरी दोपहरी, बड़ी झील के मनोरम नजारों से दिल्‍ली के नेहरू प्‍लेस के लिए रवाना हुआ. उन दिनों मीडिया में स्‍टार्टअप कम ही हुआ करते थे. इसलिए, ‘स्‍टार्टअप’ में आने के लिए एक सुपरिचित, प्रतिष्ठित मी‍डिया घराने को नमस्‍कार कह दिया.

जानकार खुश नहीं थे. लेकिन दोस्‍त, मन की उमंग ने उनकी खुशी को महत्‍व नहीं दिया. अब हुआ यह कि दो महीने में ‘स्‍टार्टअप’ ने बड़े ही दिलकश अंदाज में हमारी ओर से मुंह मोड़ लिया. कंप्‍यूटर के पास पड़ी ‘डमी’ और उन पर फिदा राकेश मालवीय के अलावा वहां कोई बात करने वाला नहीं बचा.

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बस क्‍या था. हम दोनों भी अधूरे ख्‍वाब के ‘मर्सिया’ के बीच घिरे थे. ऐसे दिन भी आए जब जेब में मुश्किल से बीस रुपए थे और यह तय किया गया कि भोजन थोड़ा देर से किया जाए, ताकि वह शाम तक चल जाए.

इस बीच मेरे चाचा जी संयोग से दिल्‍ली आए. उन दिनों उनको भी कोई बहुत पैसे नहीं मिलते थे. और उनको जिंदगी के इस मोड़ की सूचना भी न थी. जब मैं उनसे मिलने गया तो उनको किस्‍सा पता चला.

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उन्‍होंने दो बातें की;

पहली, यह सब चलता रहता है. इससे परेशान न होना. यह जिंदगी का चक्र है. जो कुछ मेरा है, वह हम ‘सबका’ है. भूलकर भी दुखी न होना.

दूसरा जेब में जितने रुपए थे, मेरे हाथ में रखकर बोले, कम हो तो और कहीं से इंतजाम करूं!

चाचा के इस हौसले से पहले, लोग दिल्‍ली आने का ताना ही देते रहते. हम न कहते थे, इसमें जोखिम है. चाचा ने एक बार भी यह नहीं कहा! उनने तो उल्‍टे कहा, ‘मैं हूं ना’ और भूलकर भी दुखी न होना!  

उस दिन यह बात मेरे अंर्तमन में बैठ गई, मेरा होना सबका होना है!

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हमारे होने में असल में इतने लोगों के होने का निवेश है कि उस पर किसी एक का एकाधिकार संभव नहीं.

ज़रा, ऐसे लोगों की सूची तो बनाइए, जिनने आपके ‘होने’ में निवेश किया है. इससे आप अपने ‘होने’ के अर्थ तक आसानी से पहुंच सकेंगे.

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