डियर जिंदगी : ‘काला’ उजाले की आत्‍मकथा है...

‘काला’ के बारे में एक से बढ़कर एक लेख हैं. नजरिए हैं. मैं फिल्‍म समीक्षक, इस विधा का विशेषज्ञ भी नहीं हूं, इसलिए मैं यहां केवल इसके जीवन पक्ष से जुड़ी बातों पर संवाद कर रहा हूं. उन दृश्‍यों पर हम बात करेंगे, जो हमारी जिंदगी को नया अर्थ देते हैं.

डियर जिंदगी : ‘काला’ उजाले की आत्‍मकथा है...

रजनीकांत की ‘काला’ कालीकरण एक फि‍ल्‍म है. इसे केवल सिनेमा के नजरिए से नहीं देखना चाहिए. इसमें कला, राजनीति और जीवन के रंग फ्रेम दर फ्रेम हमारे सामने आते जाते हैं. अगर हम अपने दिल-दिमाग को उस चश्‍मे से देखने से मुक्‍त कर सकें, जिसे बचपन से लादे फि‍र रहे हैं, तो इसके कुछ दृश्‍य ऐसे हैं, जो जिंदगी के नजारे को बदल सकते हैं.

‘काला’ के बारे में एक से बढ़कर एक लेख हैं. नजरिए हैं. मैं फिल्‍म समीक्षक, इस विधा का विशेषज्ञ भी नहीं हूं, इसलिए मैं यहां केवल इसके जीवन पक्ष से जुड़ी बातों पर संवाद कर रहा हूं. उन दृश्‍यों पर हम बात करेंगे, जो हमारी जिंदगी को नया अर्थ देते हैं.

1.काला’ इस मायने में अनूठी है कि नायक पर हर बार उसके रंग को लेकर वैसी ही टिप्‍पणी का सामना करना पड़ता है, जो निजी जिंदगी में हर उस व्‍यक्ति को झेलनी पड़ती है, जिसका रंग काला है.  लेकिन हीरो में ‘काले’ रंग को लेकर कोई हीन भावना नहीं, बल्कि गर्व की गहरी अनुभूति है. मुझे नहीं याद आता कि हमारी किसी दूसरी फिल्‍म में कभी इस तरह की बात की गई हो. विशेषकर ऐसी जो हमें हिंदी में सुलभ हुई हो. क्‍योंकि दूसरी भाषा के सिनेमा के बारे में मेरा हाथ तंग है. अगर आपकी जानकारी में हो तो साझा करें.

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2. ‘काला’ दलित विमर्श, कला की राजनीति के साथ जिस बात को सबसे अच्‍छे से कहती है, वह है- हीरो की गलती की संभावना. यहां हमारा हीरो एक सामान्‍य आदमी है. प्रेम करता है. शादी करता है. परिवार और बच्‍चे हैं. वह भी परिवार में झगड़े का सामना खराब तरीके से करता है. कुल मिलाकर गलतियां करता है. एकदम हमारी तरह. यह बॉलीवुड के तय पैटर्न से अलग है. वहां तो हीरो और गलती दोनों एकदम अलग पटरी पर होने वाली चीजे हैं. ‘काला’ हमें बहुत प्‍यार से मनुष्‍य को मनुष्‍य की तरह समझना सिखाती है. उसे अवतार की तरह पेश नहीं करती. यह एक आम आदमी के तर्क के साथ जीने, अपने विश्‍वास पर टिके रहने की गाथा है.

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3. वैसे तो पूरा भारत ही रंग को लेकर संवेदनशील है. सुंदर व्‍यक्ति को सदा से सुशील, गुणवान मानने की प्रथा रही है. विशेषकर हिंदी पट्टी, उत्‍तर भारत में गोरा होना विशेषाधिकार है. काले होने के मायने किसी व्‍यक्ति के जीवन को हमेशा के लिए निराशा की खाई में झोंक देने जैसा है. युवा तो रंग को लेकर लगभग पागल हैं. सांवले की सुपरलेटिव डिग्री वाले काले रंग के व्‍यक्ति को भी संगिनी गोरी चाहिए. इसी तरह शादी योग्‍य लड़कों की ‘तलाश’ में भी रंग जरूरी आयाम है.

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4. नैना मजूमदार ने ‘डियर जिंदगी’ को लिखा, वह रंग के प्रति आकर्षण से खुद को अलग नहीं कर पातीं. उनमें गोरे के प्रति पागलपन की हद तक प्रेम है. नैना के पति का रंग सांवला नहीं काला है. वह अपने पति के साथ खुश, संतुष्‍ट, संपन्‍न जीवन जी रही हैं. बस, एक ही कमी है. काश! वह गोरे होते. नैना सुशिक्षित और मानवीय दृष्टिकोण से युक्‍त महिला हैं, वह सब समझती हैं, लेकिन कहती हैं कि थोड़े बेहतर की चाह में क्‍या बुराई है. मैंने उन्‍हें लिखा, ‘यह थोड़े बेहतर की बात नहीं है. यह किसी के साथ छल,अन्‍याय और अप्रेम है. किसी के रंग के आधार पर उससे कम प्रेम कैसे किया जा सकता है!’ 

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काला हमें बताती है कि काला होने का अर्थ क्‍या है. यह रंग और आत्‍मा की प्रसंग सहित व्‍याख्‍या है. जैसा कि मैंने पहले भी लिखा, अपनी पूरी कमियों के साथ. यह सिनेमा का ऐसा स्‍वाद है, जो एक बार चखने योग्‍य है.

5. ‘काला’ के उन हिस्‍सों में, जिनमें रजनीकांत रंग को प्राकृतिक बताते हैं, रंगहीन सोच को आगे ले जाया गया है, उन दृश्‍यों को बार-बार देखने से शायद सांवले और काले रंग वालों को यह समझ में आ जाए कि रंग को जीवन-मरण का प्रश्‍न बनाना विशुद्ध रूप से तर्कहीनता है.

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‘काला’ एक खास तरह के विचार की सत्‍ता के सामने महज चुनौती ही नहीं, बल्कि ऐसी सोच के विरुद्ध अभियान है, जिसमें श्रेष्‍ठता का पैमाना योग्‍यता नहीं रंग है. हम रंगभेद के मामलों में बाहरी दुनिया पर ध्‍यान लगाए बैठे हैं, जबकि हमारी दुनिया में यह कहीं घातक, जहरीला और मनुष्‍य विरोधी है.

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हमें रजनीकांत का आभारी होना चाहिए. उन्होंने एक ऐसे विचार को खाद-पानी देने का काम किया है, जो सदियों से प्रतीक्षा में था...

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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