• 0/542 लक्ष्य 272
  • बीजेपी+

    0बीजेपी+

  • कांग्रेस+

    0कांग्रेस+

  • अन्य

    0अन्य

डियर जिंदगी : तर्क के दंगल और 'संतुलन' की सुंदरता!

असल में शुरू में तो सबकुछ सुंदर ही दिखता है. किसी भी रिश्‍ते में. दूर से हम एक-दूसरे को कहां अच्‍छे से समझ पाते हैं. यह बात और है कि हम पास आकर भी कई बार चीजों में इतने उलझ जाते हैं कि हर बात में अपने वादों, दावों और सपनों को खोजने लगते हैं.

डियर जिंदगी : तर्क के दंगल और 'संतुलन' की सुंदरता!

तर्क करना अच्‍छी बात है. एकदम बढ़िया. तर्कशील व्‍यक्‍ति होना किसी के लिए भी एक सम्‍मानजनक टिप्‍पणी है. लेकिन क्‍या हर बात में तर्क करने की आदत सही है! अगर सही है तो कितनी सही है. अगर मुश्‍किल है तो कितनी मुश्किल! उप्र के बलिया से 'डियर जिंदगी' की पाठक रुचि यादव लिखती हैं, 'तर्क के चक्‍कर में फंस गई हूं. पति-पत्‍नी दोनों प्रोफेसर हैं. एक दर्शनशास्‍त्र से तो दूसरे गणित के. दोनों के तर्क से शुरू में जो जिंदगी रोमांचक नजर आती रही, उसमें बाद में इतना तनाव हो गया कि अब साथ निभाना मुश्किल लग रहा है.'

असल में शुरू में तो सबकुछ सुंदर ही दिखता है. किसी भी रिश्‍ते में. दूर से हम एक-दूसरे को कहां अच्‍छे से समझ पाते हैं. यह बात और है कि हम पास आकर भी कई बार चीजों में इतने उलझ जाते हैं कि हर बात में अपने वादों, दावों और सपनों को खोजने लगते हैं. जिंदगी में 'रिसर्चर' का रवैया होना ठीक है, लेकिन ऐसी चीजें पूरी तरह से जिंदगी के आंगन में उतर आएं तो जरा मुश्किल हो जाती है. इसलिए, संतुलन अत्‍यंत खूबसूरत शब्‍द है. हमारी जिंदगी में इसके जैसा सुंदर, सहनशील और संवेनदशील शब्‍द दूसरा नहीं है. इसमें एक-दूसरे के साथ रहते हुए, उसके लिए जगह बनाने का जो भाव है, वह दुर्लभ है.

एक छोटी-सी कहानी सुनिए. इसमें संतुलन को बेहद सरलता से सीखा जा सकता है. जिंदगी तर्क के जंगल में फंसने का काम नहीं. बल्कि जंगल से तर्क के सहारे फूल चुनने का नाम है.

यह भी पढ़ें- डियर जिंदगी : फूल-पत्‍तों में उलझे, जड़ों को भूल गए...

एक गांव में दो संन्‍यासी रहते थे. दोनों में बड़ा भारी विरोध था. मजे की बात यह कि उतना ही प्रेम भी था. दोनों एक ही गुरु के शिष्‍य थे. दोनों साथ-साथ पले बढ़े थे. गुरु के कहने पर इस गांव में साधना कर रहे थे. गुरु बुजुर्ग हो गए थे, इसलिए दोनों से कम ही मिलते और नदी के पार बीहड़ में एक कुटिया में रहते.

दोनों शिष्‍यों में मतभेद का मूल कारण वही पैसा था, जिसने हम सभी के अच्‍छे भले संबंधों में दरार डाल दी. एक कहता कि कुछ पैसे बुरे वक्‍त के लिए बचाकर रखने चाहिए, तो दूसरा कहता हमें पैसे की क्‍या जरूरत! हम तो संन्‍यासी हैं, हम रुपए का संग्रह क्‍यों करें?

एक दिन शाम के वक्‍त शिष्‍यों को संदेश मिला. गुरु बीमार हैं. अंतिम समय है. किसी भी तरह कुटिया पहुंचे. दोनों भागे-भागे नदी किनारे पहुंचे. वहां एक माझी नाव बांध रहा था. वह किसी सूरत में जाने को तैयार न हुआ. बहुत मनुहार करने पर उसने पांच रुपए लेकर पार लगाने की बात कही. तो वह जो पैसे रखने की बात कहता था, उसने गर्व से कहा, कोई बात नहीं, चलो! तट से कुटिया दूर थी. तो उतरते ही बहस शुरू हो गई.

पैसे देने वाले ने कहा, हम पार इसलिए उतरे क्‍योंकि मेरे पास पैसे थे. तुम तो कहते हो कि संन्‍यासी को पैसा रखना ही नहीं चाहिए. अगर तुम्‍हारी बात मानते तो कैसे नदी के पार आते.

यह भी पढ़ें- डियर जिंदगी : आपको भी निर्णय नहीं लेने की आदत है!

दूसरे शिष्‍य ने हंसते हुए कहा, हम नदी इसलिए पार कर सके, क्‍योंकि तुम पैसे खर्च करने को तैयार हो गए. हम पैसा होने से नहीं, पैसा त्‍यागने के कारण नदी पार हुए. अगर तुम पकड़े रहते, छोड़ते ही नहीं तो हम पार कैसे होते. गुरु के पास थोड़ा ही वक्‍त बचा था. उन्‍होंने कहा, पूछो, कुछ बाकी रह गया हो तो. दोनों ने अपनी दुविधा साझा कर दी.

गुरु ने कहा, अरे! तुम भी वही करने जा रहे हो, जो दुनिया जमाने भर से कर रही है. तुम सत्‍य के आधे हिस्‍से को ही देख रहे हो. पैसा पास होने से ही तुम नदी पार कर सके. यह सत्‍य है लेकिन दूसरी बात भी उतनी ही सत्‍य है कि तुमने पैसे छोड़े, इसलिए नदी के पार आ सके. यह दोनों ही बातें सच हैं. और ये दोनों बातें एक साथ जीवन हैं. इनमें विरोध नही है. गुरु ने आगे विस्‍तार से कहा, 'जीवन को हमने अनेक स्‍तरों पर बांट रखा है. हर विरोध को मानने वाला अपनी दलील दे सकता है. और पूरी जिंदगी दे सकता है. वह अपने आधे सच के सहारे पूरी जिंदगी गुजार सकता है. लेकिन यह जिंदगी आधी ही रहेगी! क्‍योंकि वह अपने आधे सच के साथ लड़ता रहेगा. इसलिए सच को टुकड़ों में खोजना बंद करें. उसे एक साथ, एक लय में जीना शुरू करें.'

तभी बात बनेगी. उम्‍मीद है रुचि यादव को अपने प्रश्‍न का कुछ समाधान इस संवाद में मिला होगा.

सभी लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें : डियर जिंदगी

(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

(https://twitter.com/dayashankarmi)

(अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें: https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)