डियर जिंदगी : नीयत और समझ का अंतर!

निर्णय करते समय इस बात का विशेष ख्‍याल रखा जाए कि नीयत और समझ दोनों बेहद अलग स्‍वभाव की खूबियां हैं.

डियर जिंदगी : नीयत और समझ का अंतर!

भारत में कोई बच्‍चा अपने निर्णय लेना कब शुरू करता है, इस पर तथ्‍यात्‍मक रूप से कुछ कहना थोड़ा मुश्किल है, क्‍योंकि इस पर कोई सटीक विश्‍लेषण उपलब्‍ध नहीं है. लेकिन भारतीय समाज के व्‍यवहार और अनुभव के आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि देश में बच्‍चे अपने फैसले शायद पच्‍चीस बरस तक नहीं लेते और कुछ मामलों में तो कई बार यह देखा गया है कि निर्णय लेते ही नहीं. बड़ी आबादी की उम्र बिना निर्णय लिए ही गुजर जाती है. आज हम नीयत और समझ के अंतर पर बात करेंगे. क्‍योंकि यह इन दोनों के बीच में अंतर नहीं करने के कारण हमारे बच्‍चों, युवाओं के जीवन पर सबसे अधिक अंतर पड़ रहा है.

डियर जिंदगी : आ अब लौट चलें…

डियर जिंदगी को बीते सप्‍ताह दो ईमेल मिले. एक जबलपुर से तो दूसरा मुंबई से, लेकिन दोनों का मूल प्रश्‍न एक जैसा ही था. जबलपुर से चिराग दुबे ने लिखा है कि वह जिस लड़की से प्रेम विवाह करना चाहते हैं, उसमें वैसी कोई बाधा नहीं है, जैसी आमतौर पर होती है. लड़की उनकी ही जाति, धर्म से है. समस्‍या केवल इतनी है कि लड़की के पिता नहीं हैं, उनकी मां एक कस्‍बे में रहती हैं. वह रिटेल के एक छोटे बिजनेस से जुड़ी हैं, पति जब नहीं रहे तो बच्‍चों के छोटे होने के कारण उन्‍हें ही यह जिम्‍मेदारी उठानी पड़ी. लेकिन उस गांव, कुल में महिला के काम, व्‍यापार करने का चलन नहीं होने के कारण पंचायत और परिवार के पुरुषों को यह निर्णय पसंद नहीं आया. जिसके कारण उनके बारे में ऐसे प्रचार किए गए जो उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने वाले हैं. इस प्रचार के कारण अब चिराग के पिता ने इस रिश्‍ते से इंकार कर दिया है.

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यहां नीयत और समझ का अंतर हम आसानी से समझ सकते हैं. यहां पिता बेटे के विवाह में बाधा बनने की चाहत नहीं रखते, लेकिन उनकी समझ कथि‍त परंपरा और खास नजरिए के कारण एक ऐसी समझ के रूप में विकसित हो गई है, जिसे आज स्‍वीकार करना संभव नहीं. चिराग ने लिखा है कि वह पिता के निर्णय के साथ नहीं हैं, लेकिन वह उन्‍हें नाराज भी नहीं करना चाहते!

मेरे विचार से यहां चि‍राग को केवल यह समझने की जरूरत है कि वह क्‍या चाहते हैं. किसी की नीयत सही हो सकती है, लेकिन उसकी समझ भी सही हो, यह दावा नहीं किया जा सकता. ठीक इसके उलट भी बात हो सकती है, किसी व्‍यक्‍ति की नीयत किसी विषय के बारे में चाहे जैसी हो, लेकिन उसकी समझ सही हो सकती है. आपके किसी मित्र की बड़ी अच्‍छी नीयत है कि आप घर लें. आपके पास घर होना चाहिए. इसमें गड़बड़ तो कुछ नहीं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि आपके उस मित्र की प्रॉपर्टी के बारे में समझ भी सही हो. इसलिए आप उसकी नीयत पर तो भरोसा कीजिए, लेकिन उसकी समझ पर नहीं. हम चिराग के फैसले का सम्‍मान कर सकते हैं, लेकिन वह जिस तरह नीयत और समझ के अंतर को समझ पाने में नाकामयाब हुए, वह निराशाजक है.

डियर जिंदगी : बस 'मन' बदल गया है...

अब दूसरा किस्‍सा मुंबई से. मुंबई में 24 बरस से रह रहे विष्‍णु यहां की रग-रग से वाकिफ हैं. उनका कहना है कि समंदर ने उनको बचपन से, लेकिन हर मुश्किल से बाहर आने में मदद दी है. विष्‍णु न तो कभी किसी धोखेबाजी का शिकार हुए, न ही कभी किसी को ठगा. वह एक छोटी सी टैक्‍सी सर्विस के मालिक हैं. पिछले दिनों उन्‍हें अचानक कुछ पैसे की जरूरत पड़ी. इसी दौरान उन्‍हें दिल्‍ली से एक एसएमएस मिला कि हम तुरंत लोन देते हैं. विष्‍णु ने उस नंबर पर फोन किया. मीठी बातों और अनिवार्य जरूरत ने उन्‍हें विवश किया कि वह कंपनी को अपनी मेहनत और बचत के चालीस हजार भी प्रोसेसिंग फीस के नाम पर कंपनी के खाते में जमा कर दें. उन्‍होंने सोचा इस पर बच्‍चों से क्‍या बात करना. बच्‍चों को इस चक्‍कर में क्‍या डालना. जबकि बच्‍चे कॉलेज में हैं, इस तरह की धोखेबाजी को अच्‍छी तरह समझ लेते.

इस तरह विष्‍णु धोखे के चक्रव्‍यूह में फंस गए. उन्होंने उस कंपनी की नीयत को जांचने की जगह अपनी उस भोली समझ पर भरोसा किया जो इस सिद्धांत पर थी कि दुनिया में सबकुछ सही है. उन्‍होंने अपनी समझ को समय के साथ अपडेट नहीं किया. इसलिए निर्णय करते समय इस बात का विशेष ख्‍याल रखा जाए कि नीयत और समझ दोनों बेहद अलग स्‍वभाव की खूबियां हैं. दोनों का अपना महत्‍व है, दोनों के अनुचित घालमेल से जिंदगी में मुश्किलें पैदा हो सकती हैं.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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