डियर जिंदगी : अर्थहीन, मैं हूं ना !

संकट मनुष्‍य की सबसे बड़ी पाठशाला है. यहां से जीवन के प्रति, मनुष्‍यता के प्रति जो श्रद्धा सीखी/समझी जा सकती है, वह किसी किताब, प्रवचन से मिलना संभव नहीं है.

डियर जिंदगी : अर्थहीन, मैं हूं ना !

हर दिन 'डियर जिंदगी' को फेसबुक/ट्विटर और एसएमएस से जिंदगी के बारे में अनूठे अनुभव मिल रहे हैं. मेरी विनम्र कोशिश बस इतनी होती है कि मैं इन्‍हें अपने संवाद में शामिल कर सकूं. यह अनुभव अनेक बार इतने मौलिक/निजी होते हैं कि ययार्थ आश्‍चर्य में पड़ जाता है.

जीवन की नाव में मुश्किल के वक्‍त जब अपने साथ छुड़ा लेते हैं, तो अगले ही पल अचानक कोई अनजान आकर जीवन की डोर थाम लेता है. असल में संकट मनुष्‍य की सबसे बड़ी पाठशाला है. यहां से जीवन के प्रति, मनुष्‍यता के प्रति जो श्रद्धा सीखी/समझी जा सकती है, वह किसी किताब, प्रवचन से मिलना संभव नहीं है. इसलिए भी यह जरूरी है कि हम जिंदगी में नए की ओर रुख करते रहें, नए की ओर देखते रहें. नया करने के लिए अपने कदम बढ़ाते रहें.

मुझे पिछले दिनों मिले संदेश में से एक बेहद भावुक और आत्‍मीय है. इसे मैं आपसे साझा कर रहा हूं. यह जीवन के प्रति हमारे दृष्टिकोण के निर्माण, जीवन के प्रति नवीन नजरिया बनाने में मददगार हो सकता है.

'डियर जिंदगी' के पाठक नरेश त्रिपाठी ने मध्‍यप्रदेश से मजेदार बात लिखी है. वह लिखते हैं, 'उनका अनुभव/विचार है कि हम अपने शब्‍दों का अर्थ खोते जा रहे हैं. हम जो कहते हैं, असल में वह करने के लिए होता ही नहीं. वह तो बस कहने के लिए होता है. इससे हमारे आसपास ऐसे ही शब्‍द गूंजते रहते हैं, जो अर्थहीन होते हैं.'

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नरेश ने जो कहा, उसे थोड़ी से सजगता से देखेंगे तो हम पाएंगे कि ऐसा वातावरण बन चुका है कि कोई अपना महत्‍व कम नहीं करना चाहता. कोई मदद से इंकार नहीं करना चाहता. बस हर कोई कहते ही अगले पल भूल जाता है. अगर नहीं भी भूला, तो कम से कम उसकी प्राथमिकता तो वह बात नहीं रहती. उसके बाद भी मित्रता की कसमें उतनी ही शिद्दत से खाई जाती हैं.

वायदा करते ही भूल जाना और उसके बाद भी यही राग कि 'मैं हूं ना'. जबकि  'मैं हूं ना' का अर्थ भूल जाना नहीं है. इसका अर्थ वादे पर मिट्टी डालकर उसके ऊपर पौधा लगाना नहीं है. वायदे का अर्थ है कहे हुए पर खरे उतने का हरसंभव प्रयास करना. उस प्रयास के लिए अपना सर्वोत्‍तम दांव पर लगाना.

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मनुष्‍यता और मनुष्‍य इससे जीवित रहेंगे. इससे बचे रहेंगे. केवल भाषण और निबंध से मनुष्‍य नहीं बचने वाले. मनुष्‍यों को बचाए रखने और उन्‍हें तनाव और मनोरोग से बचाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि जो कह रहे हैं, उन शब्‍दों में सत्‍य हो. उन शब्‍दों को निबाहने का सामर्थ्‍य और साहस हो.

इसके साथ ही यह भी ध्‍यान रखने की बात है कि हमारे निर्माण में सामर्थ्‍य से कहीं अधिक भूमिका साहस और प्रयास की है. एक-दूसरे के लिए किए गए प्रयास में अगर ईमानदार हों, तो जिंदगी जितनी आज है, उससे कहीं अधिक खूबसूरत हो सकती है. खुशहाल हो सकती है और हां ... इससे कहीं अधिक तनावमुक्‍त हो सकती है. बस करना इतना है कि जो हम कह रहे हैं, उसकी मर्यादा का पालन पूरी निष्‍ठा के साथ करें.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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