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डियर जिंदगी : बच्‍चों को अपने जैसा नहीं बनाना !

जब त‍क हम बच्‍चों को संपत्ति की तरह प्रेम करना नहीं छोड़ते. हम उनके साथ जीवन का आनंद नहीं ले सकते.

डियर जिंदगी : बच्‍चों को अपने जैसा नहीं बनाना !

बच्‍चों को अपने जैसा नहीं बनाना. बात अजीब लग सकती है! बेतुकी लग सकती है. लेकिन जब हम एक पटरी पर चलने के अभ्‍यस्‍त हो जाते हैं तो अक्‍सर ऐसा ही होता है. माता-पिता का सबसे बड़ा संकट बच्‍चों पर नियंत्रण को लेकर है. हम बच्‍चों को आसमां में उड़ाने की बात तो करते हैं लेकिन ऐसा करते हुए उनकी दिशा पर अपना अधिकार रखते हैं! हम भूल जाते हैं कि बच्‍चे हमसे हैं, लेकिन हमारे लिए नहीं हैं!

जब त‍क हम बच्‍चों को संपत्ति की तरह प्रेम करना नहीं छोड़ते. हम उनके साथ जीवन का आनंद नहीं ले सकते. ध्‍यान रहे, वह हमारे साथ रहते जरूर हैं लेकिन वह हमारे नहीं हैं. जैसे एक विशाल जंगल में हजारों तरह के पेड़ होते हैं. सब एक से बढ़कर एक गुण वाले. कितने ही तरह की वनस्‍पतियां, विविधता होती है. जंगल किसी पर नियंत्रण नहीं रखता. वह केवल ‘माहौल’ देने का काम करता है. वह अपनी क्षमता नियंत्रण की जगह वातावरण प्रदान करने में लगाता है. हमें भी यही करना है. बच्‍चों को बस वातावरण देना है. उनके साथ जंगल की तरह व्‍यवहार करना है, सर्कस की तरह नहीं. जैसे सर्कस में कितना ही बलशाली, हुनरमंद जानवर क्‍यों न हो, उसकी स्वतंत्र चेतना नहीं होती. वैसे ही अगर हम बच्‍चों को अधिक नियंत्रण में रखकर परवरिश करेंगे तो उनकी चेतना कभी विकसित नहीं हो पाएगी.

डियर जिंदगी : क्‍या कहना है, बच्‍चों से!

बच्‍चों को नियंत्रित करने वाली परवरिश का परिणाम कुछ ऐसा होता है, मानो तोते को घर के पिजरे में पालना. इसके दो परिणाम देखने को मिलते हैं. पहला, तोता रहता आपके नियंत्रण में है, आपकी बिना मर्जी के कहीं नहीं जाता. पिंजरा खुला छोड़ने पर भी उससे बाहर नहीं आता. दूसरा, वह हमेशा के लिए बाहरी दुनिया का सामना करने की शक्ति खो देता है. अब यह हम पर है कि हम कैसा तोता चाहते हैं.

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मेरे एक मित्र हैं, जिन्‍हें पक्षियों, पशुओं से बेइंतहां मोहब्‍बत है. उनके घर में खूब सारे पक्षी,पशु हैं. वह अक्‍सर कहते हैं, बच्‍चों की परवरिश और जानवरों की परवरिश में कोई अंतर नहीं होता. बस एक ही अंतर होता है, जानवर को आप स्‍कूल नहीं भेजते. उससे आप अपने लिए कुछ लौटाने की व्‍यवस्‍था करने को नहीं कहते! इसलिए जानवर से आपके संबंध कहीं गहरे होते हैं. कहीं अधिक स्‍नेहपूर्ण होते हैं.

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आपने महान कवि, दार्शनिक, चित्रकार खलील जिब्रान का नाम सुना होगा. खलील सीर‍िया में जन्‍मे, बाद में अमेरिका जाकर बस गए. ‘द प्रोफेट’ उनकी सबसे बेहतरीन रचना मानी जाती है. खलील 1931 में इस दुनिया से विदा हो गए. लेकिन जैसे उनकी नजर ने सब देख लिया था कि आगे दुनिया कहां किस संकट में फंसने वाली है! बच्‍चों के साथ व्‍यवहार, परवरिश, जीवन दर्शन पर जिब्रान की बातों को अगर एक वाक्‍य में समेटा जाए तो वह है, ‘बच्‍चों के प्रति स्‍वतंत्र दृष्टि. उनके साथ रहना लेकिन उनको अपने जैसा बनाने की कोशिश नहीं करना!’ 

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जनवरी शुरू होते ही बच्‍चों पर परीक्षा का दवाब गहराने लगता है. देशभर में बच्‍चों की आत्‍महत्‍या के बढ़ते मामले इस बात की ओर निरंतर संकेत दे रहे हैं कि हमें बच्‍चों के प्रति अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन की जरूरत है.

बच्‍चों को अपेक्षा से अधिक प्रेम, स्‍नेह और आत्‍मीयता की चाहत है. हम उनके सपनों को जितना अधिक उनका बनाने में उनकी मदद करेंगे, वह उतने ही प्रसन्‍न होंगे. उतने ही भले,अच्‍छे मनुष्‍य बनेंगे! अब यह हमें चुनना है कि हमें अच्‍छे मनुष्‍य चाहिए या रोबोट की तरह हमारे संकेत पर काम करने वाले भावना रहित रोबोट!

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