डियर जिंदगी: ...जो कुछ न दे सके

 समय का छोटा सा टुकड़ा उनके लिए भी निकालना चाहिए, जिन्होंने 'धूप' के वक्त बिना शर्त हमें अपनी छांव देने के साथ ही, हमारे होने में अहम भूमिका का निर्वाह किया.

डियर जिंदगी: ...जो कुछ न दे सके

हम सब अक्सर अपने परिजनों, दोस्तों, साथियों के साथ यात्राएं करते हैं. उनके साथ वक्त बिताना हमेशा अच्छा ही लगता है जिन्होंने हमारे साथ कभी ना कभी अच्छा समय बिताया है. जिन्होंने हमारे होने में अपनी कुछ न कुछ भूमिका निभाई है. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो घने पेड़ के पास, जरूरी झाड़ियों और पौधों सरीखे होते हैं. अक्सर यह होता है कि हम पर्यावरण की बात में जंगल, नदी, पेड़ों की बात तो करते हैं, लेकिन हमारी नजर से छोटे नन्हे पौधे, छोटी नदी, तालाब छूट जाते हैं.

ठीक यही बात जिंदगी पर भी लागू होती है. हमारे और हमारे अपनों के आसपास छोटी-छोटी भूमिकाओं वाले लोग भी होते हैं. ठीक वैसे ही जैसे एक फिल्म में हीरो के साथ छोटे-छोटे साइड हीरो होते हैं. वह ठीक उस वक्त नायक के साथ होते हैं जब उसे जरूरत होती है. हमारे आस-पास भी कितने ही ऐसे लोग होते हैं, जो अपनी छोटी-छोटी भूमिकाएं समय-समय पर निभाते रहते हैं.

डियर जिंदगी : साथ रहते हुए स्‍वतंत्र होना!

मुझे याद आता है कि एक बार स्कूल के दिनों में पारिवारिक शुभचिंतक ने सलाह दी कि केवल स्‍कूली पाठ्यक्रम पर ध्‍यान दो, बाकी पढ़ाई-लिखाई का जीवन में कोई अर्थ नहीं है. इसकी वजह एकदम साफ थी, स्कूल में मेरे नंबर अच्छे नहीं आ रहे थे. उस समय ऐसी सलाह मेरे लिए बहुत सामान्य बात थी. लेकिन एक शिक्षिका मिलीं, जिन्होंने समझाया, जिस तरफ तुम जा रहे हो, असल में उसी में कुछ नया है. आज इतने बरस बाद सोचता हूं कि अगर उन्होंने यह विश्वास न दिया होता तो क्या होता!

ठीक इसी तरह का संबल पिताजी के एक ऐसे मित्र ने दिया, जो दूसरों की नजर में बेहद सामान्य और कम जानकार थे. ऐसे लोगों ने उस वक्त पर इस लेखक का साथ दिया जब लोग यह चाहते थे कि आप उस रास्ते पर जाएं जिस पर अक्सर ही जाना सिखाया जाता है.

कोई बरस भर पहले हम परिवार के साथ एक ऐसी यात्रा पर बात कर रहे थे जिसमें ऐसे लोगों को शामिल किया जाना था जो कभी दिल्ली न आए हों. तभी यह विचार आया कि इस यात्रा को कैसे रचनात्मक बनाया जा सकता है. वह अपनी यादों को कैसे आत्मीय और स्नेहिल बना सकते हैं. हम लोग कुछ सोच ही रहे थे कि पिताजी ने अपने इन्हीं मित्र का नाम सुझाया. उसी समय तय हो गया कि उनको भी इस टीम में शामिल किया जाए. आगे चलकर यात्रा हुई और उसमें परिवार के बाहर के 2 सदस्य शामिल हुए. जिनमें से सबसे अधिक आश्चर्य परिजनों और रिश्तेदारों की ओर से पिताजी के मित्र को लेकर था.

डियर जिंदगी : ‘आईना, मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे...’

इस आश्चर्य ने मुझे सोचने पर विवश किया कि हमारे सोचने-समझने के दायरे कहां तक सिमट गए हैं. सबने कहा अरे वह क्यों! उनकी जगह किसी दूसरे चाचा, मामा, ताऊ, परिवार के दूसरे सदस्य को बुलाया जाना अधिक ठीक होता. जबकि मेरी और पिताजी की राय में इस चुने हुए यात्री से बेहतर कोई था ही नहीं. हमने परिवार के अर्थ को इतना सीमित, संकुचित कर लिया है कि उसमें छोटी-छोटी भूमिका वाले लेकिन जरूरी लोग छूट जाते हैं. इनका छूट जाना नदी के किनारों का कटाव होते जाने जैसा है.

इस वर्ष एक बार फिर हम जब ऐसी ही यात्रा की तैयारी करने बैठे तो हमने सोचा कि फिर 'बाहर' से किसी एक आदमी को जरूर बुलाया जाए. इस बार जिनका चयन किया गया, वह ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें यात्रा पसंद नहीं थी. तो सबने कहा वह नहीं आएंगे! वह कहीं आते-जाते नहीं. लेकिन हमने उन्हें आमंत्रित किया. वह आए और अपने साथ ऐसी प्रसन्‍नता लेकर आए जिसने हमें भीतर से प्रेम और स्नेह से सराबोर कर दिया. मुझे लगा यह तो कमाल का प्रयोग है. बेहद सीमित संसाधन और ऊर्जा में इससे बेहतर परिणाम किसी दूसरी चीज से निकलना मुश्किल है.

डियर जिंदगी: अपेक्षा का कैक्टस और स्नेह का जंगल

कुल मिलाकर जिंदगी को पहाड़, मचान, ऊंचाई से देखने, समझने की कोशिश करते रहना चाहिए, क्योंकि अक्सर एक ही तल से देखने के कारण हम अधिक दूरी और गहराई तक नहीं देख पाते! इसमें उनके लिए जगह बना पाना असल में प्रेम और स्नेह की दुनिया को नया विस्तार देना है जो हमारे लिए कुछ नहीं कर सकते. जो कर सकता है, सब उसकी चिंता में ही जुटे हैं. ऐसे में कितना भला लगता है, समय का छोटा सा टुकड़ा उनके लिए निकालना जिन्होंने 'धूप ' के वक्त बिना शर्त हमें अपनी छांव देने के साथ ही, हमारे होने में अहम भूमिका का निर्वाह किया.

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