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क्या दिल्ली के पास है अपना राज्य मानवाधिकार आयोग?

मई 2016 में इसी से सम्बंधित मामले के ऊपर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर ने यह टिप्पणी की थी कि जब बीस लाख के आसपास की संख्या वाले मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्यों के पास अपने राज्य मानवाधिकार आयोग हो सकते हैं तो एक करोड़ से भी अधिक जनसँख्या वाले दिल्ली के पास क्यों नहीं? 

क्या दिल्ली के पास है अपना राज्य मानवाधिकार आयोग?

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से ही मानवाधिकारों को लेकर राष्ट्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक की सियासत होती रही है फिर चाहे वो अमेरिका का सीरिया और यमन जैसे देशों में सैन्य-कार्यवाही करना हो या पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर में तथाकथित रूप से मानवाधिकारों के हनन हो लेकर घडियाली आंसू बहाना. गौरतलब है कि मानव अधिकार से तात्पर्य उन सभी अधिकारों से है जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता एवं प्रतिष्ठा से जुड़े हुए हैं. यह अधिकार व्यक्ति को किसी विशेष धर्म, जाति, समुदाय, लिंग या राष्ट्रीयता की वजह से नहीं बल्कि उसके मानव होने ही वजह से दिए जाते हैं. इसी लिए इनका हनन केवल कानूनी ही नहीं बल्कि नैतिक अपराध भी माना जाता है. नब्बे के दशक से पूरे विश्व में इसको लेकर जागरूकता और बहस दोनों उभरी है जिसकी वजह से समाज का कोई भी पहलु आज इससे अछूता नहीं रह गया है. 

भारतीय संविधान में भी मानवाधिकारों को पर्याप्त महत्व दिया गया है. यह सभी अधिकार भारतीय संविधान के भाग-तीन में मूलभूत अधिकारों के नाम से वर्णित किए गए हैं और न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है, जि‍सकी 'भारतीय संविधान' न केवल गारंटी देता है, बल्कि इसका उल्लंघन करने वालों को न्यायलय दंड भी देती है.वैसे तो भारत में 28 सितंबर, 1993 से मानव अधिकार कानून अमल में लाया गया था और 12 अक्टूबर, 1993 में 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' का गठन किया गया था, लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 10 दिसंबर 1948 को घोषणा पत्र को मान्यता दिए जाने पर 10 दिसंबर का दिन ‘मानवाधि‍कार दिवस’ के लिए निश्चित किया गया. पूरे विश्व की तरह भारत में भी कुछ समय पहले 10 दिसम्बर को मानवाधिकार दिवस मनाया गया और हमेशा की तरह मानवाधिकारों की रक्षा को लेकर कई तरह के संकल्प लिए गए. दुर्भाग्यवश भारत में मानवधिकारों को लेकर उस तरह की बहस एवं चर्चा नहीं होती जैसी होनी चाहिए. जिस देश में इतनी सामाजिक, आर्थिक, जातिगत एवं लैंगिक असमानताएं हैं वहां पर मानवाधिकारों के प्रति आम नागरिकों को सजक करना केवल सरकार का काम नहीं होना चाहिए और इसके लिए नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) को भी अपना योगदान देना होगा.

लेकिन राज्य सरकारें ही मानवाधिकारों को लेकर कितनी सजग हैं इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश की संसद द्वारा 1993 में मानवाधिकार क़ानून लागु करने के 25 साल बाद भी दिल्ली समेत कई राज्यों में अभी तक राज्य मानवाधिकार आयोग तक स्थापित नहीं किये गए हैं. जिन राज्यों में हैं भी वहां पारदर्शिता का इतना अभाव है कि न तो इनकी वेबसाइट को समय पर अपडेट किया जाता है और न ही जनता को इसके बारे में जागरूक करने की दिशा में कोई कदम उठाया जाता है. बात अगर देश की राजधानी दिल्ली की ही की जाए तो अंग्रेजी समाचारपत्र टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में उत्तर प्रदेश में बाद दिल्ली में सबसे अधिक मानवाधिकार हनन के मामले सामने आए थे. और ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ था. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की 2010 की रिपोर्ट में भी 5,498 मामलों के साथ दिल्ली दुसरे स्थान पर था. सुप्रीम कोर्ट भी समय-समय पर इसको लेकर चिंता ज़ाहिर करता रहा है. 

2015 के एक आरटीआई की जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा वर्ष 2010 से जनवरी 2015 तक देश भर में मानव अधिकार उत्पीड़न के 4,90,206 मामले दर्ज किए गए हैं. इस सूची में उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बाद दिल्ली तीसरे नंबर पर है, आयोग ने यहां मानवाधिकार उत्पीड़न के कुल 37,730 मामले दर्ज किए हैं. और तो और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 से 2016 के बीच पुलिसकर्मियों द्वारा प्रताड़ित करने के 63 मामलों के साथ दिल्ली उत्तर प्रदेश के बाद दुसरे स्थान पर है. हालाँकि इस अवधी में दर्ज मामलों में अभी तक किसी को दोषी नहीं ठहराया गया है. ऐसे में यह ज़रूरी है कि दिल्ली में भी अन्य राज्यों की तरह अपना राज्य मानवाधिकार आयोग हो जो नागरिकों के हितों की रक्षा कर सके. इसको लेकर कई प्रयास भी हुए हैं और घोषणा भी हुई है, लेकिन उसका नतीजा क्या हुआ है यह किसी को पता नहीं क्योंकि न किसी अख़बार में इसके बारे में कोई जानकारी आई है और न ही इन्टरनेट में सर्च करने पर कोई जानकारी (आयोग की वेबसाइट, उसका पता, उसके सदस्य आदि) मिलती है जिससे इस नतीजे पर पंहुचा जा सके कि वाकई में दिल्ली राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन हो चुका है.

दिल्ली राज्य मानवाधिकार आयोग स्थापना की रस्साकशी
दिल्ली में राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना के लिए काफी समय से प्रयासरत संगठन ‘नेशनल ह्यूमन राइट्स एंड क्राइम कण्ट्रोल ब्यूरो’ (NHRCCB) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणधीर कुमार कहते हैं, “दिल्ली में राज्य मानव अधिकार आयोग बनाने को लेकर सिर्फ सियासत होती है, काम बिलकुल नहीं. इसके लिए केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारें बराबरी से ज़िम्मेदार हैं. ऐसा लगता है जैसे कोई भी राजनीतिक पार्टी इस विषय को गंभीरता से नहीं लेती है. दिल्ली की जनता की भलाई के नाम पर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए जिस तरह का संघर्ष किया जा रहा है, दिल्ली की जनता के मानवाधिकार की रक्षा करने की लिए राज्य मावाधिकार आयोग के गठन को लेकर वैसी उत्सुकता और तत्परता क्यों नहीं दिखाई जाती?” 

इसी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव प्रवीण कुमार और गिरीश चंद्रा कहते हैं, “दिल्ली राज्य मानवाधिकार आयोग बनाने के लिए हमने केंद्र एवं दिल्ली सरकार को अनेकों पत्र लिखे एवं वरिष्ठ अधिकारीयों से मिलने के लिए समय माँगा. लेकिन कहीं से भी संतुष्टिदायक जवाब नहीं आया. इस बाबत हमने सूचना के अधिकार के तहत RTI भी डाला है ताकि यह पता चल सके कि क्या सच में दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार को इस विषय पर कोई पत्र लिखा है? और यदि लिखा है तो उस पर केंद्र सरकार द्वारा क्या कार्यवाही की गई है. जब दिल्ली की अपनी विधानसभा और हाईकोर्ट हो सकते हैं तो मानवाधिकार आयोग क्यों नहीं?”

वैसे दिल्ली राज्य मानावाधिकार आयोग गठन की घोषणा तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा लगभग दो साल पहले जनवरी 2016 में ही की जा चुकी है. इसके लिए एक समिति बनाई गयी थी जिसके अध्यक्ष जस्टिस उमा नाथ सिंह और सदस्य आम आदमी पार्टी के नेता और सामाजिक कार्यकर्त्ता राम मंगल प्रसाद को बनाया गया था. मई 2016 में इसी से सम्बंधित मामले के ऊपर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर ने यह टिप्पणी की थी कि जब बीस लाख के आसपास की संख्या वाले मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्यों के पास अपने राज्य मानवाधिकार आयोग हो सकते हैं तो एक करोड़ से भी अधिक जनसँख्या वाले दिल्ली के पास क्यों नहीं? 

मामले की सुनवाई कर रही बेंच ने केंद्र की तरफ से प्रस्तुत हुए अटॉर्नी जनरल को कड़ी चेतावनी देते हुए यह कहा था कि यदि सरकार इस समस्या का समाधान नहीं निकालती है तो मजबूरन अदालत को राज्य मानवाधिकार आयोग के गठन का फैसला देना पड़ेगा. अदालत ने अटॉर्नी जनरल की यह दलील, कि दिल्ली पूर्ण रूप से एक राज्य नहीं अपितु एक ‘केंद्र शाषित राज्य’ है, को भी ख़ारिज करते हुए कहा था कि यदि ऐसा है तो इसके पास अपना हाईकोर्ट और महिला आयोग क्यों है? वैसे जुलाई 2015 में भी सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने केंद्र सरकार को छह महीने के भीतर आयोग स्थापित करने के लिए कहा था. तो इन सब के बीच सवाल यह है कि आखिर आयोग बना है या नहीं? अगर बना है तो इसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं है और अगर नहीं बना है तो मामला कहाँ पर आ कर फंस रहा है? क्या इसके लिए केंद्र सरकार ज़िम्मेदार है या राज्य सरकार? उम्मीद है कि जल्द ही इन सवालों के जवाब मिलेंगे और दिल्ली के लोगो के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए जल्द ही राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन किया जाएगा.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के शोधार्थी हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)