शायर अल्लामा इकबाल: इंसान के सियासी हो जाने से शायर की महानता नहीं घटती

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा के कवि अल्लामा इकबाल भले ही बाद में पाकिस्तान के विचार से जुड़ गए हों, लेकिन भारतीय समाज को आज भी उनकी रहबरी की जरूरत है.

शायर अल्लामा इकबाल: इंसान के सियासी हो जाने से शायर की महानता नहीं घटती

महान शायर और दार्शनिक शेख मोहम्मद इकबाल के बारे में सोचना जितना सरल और सुखद है, कहना उतना ही कठिन और कई तरह की जटिल चुनौतियों का सामना करना भी है. इस बारे में कोई साफ सुथरी निगाह रख पाना और विचार करना तभी संभव है जब हम उन परिस्थितियों पर सोचें जिनके बीच इकबाल पैदा हुए, पढ़े-लिखे, शिक्षा ग्रहण की और अपनी भूमिका दर्ज की.

इकबाल के बारे में सोचते हुए हमें उन्नीसवीं सदी के मुस्लिम नवजागरण को लेकर जरूर सोचना होगा जिसके एक अगुआ सर सैयद अहमद खान जैसे व्यक्ति थे. इस संदर्भ में शायर हाली और शिबली जैसे विद्वानों को भुलाया नहीं जा सकता. दूसरी तरफ राजा राममोहन राय जैसे नवजागरण के अगुआ और दयानंद जैसे ऋषियों को भी जो हिंदू नवोत्थान को लेकर अपने-अपने ढंग से चिंतनशील थे.

 आज यह बात भी निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सत्ता ने 1857 के बाद ही यह सोचना शुरू कर दिया था कि इन दोनों महाजातियों का संगठित प्रतिरोध झेल पाना उनके लिए मुश्किल होगा. तब इन्हें दो पृथक राष्ट्रीयताओं के रूप में अलग-अलग रखकर ही यहां शासन करना सहज संभव होगा. कालांतर में वे अपनी इस साजिश में सफल हुए, यह तथ्य है. अगर बाद में भी सत्ताएं यही करती रही हैं तो चिंता घेरती है कि फिर इतनी पढ़ी-लिखी और सुशिक्षित बिरादरी किस मतलब की.

इकबाल जैसे चिंतक शायरों और बौद्धिकों के संदर्भ में यह सवाल बेहद जरूरी लगता है. प्रसंग न होते हुए भी यहां मुझे बादशाह अकबर की याद आती है, जिन्होंने सत्ता और समाज के परस्पर नैतिक भरोसों पर सोचा और एक ऐसा वातावरण रचा कि हिंदुत्व और इस्लाम नए मानवीय संबंधों की इमारतें रच सके. ब्रिटिशों ने इसे चालाकीपूर्वक तोड़ा और हम आज तक इस में फंसे हुए हैं.

इन राजनीतिक स्थितियों में जब हम इस महान शख्सियत को याद कर रहे हैं जो पिछली सदी में हमारे साथ था और जिसने हम हिंदुस्तानियों के लिए ‘नया शिवाला’ और ‘तराना ए हिंदी’ जैसी अद्वितीय रचनाएं दी हैं, तब उसको लेकर हमारे सोचने की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. ‘नया शिवाला’ में वही शायर अपने हिंदू भाइयों से समूचे अपनत्व के हक से कह रहा था:

आ गैरियत के पर्दे एक बार फिर उठा दें

बिछड़ों को फिर मिला दें, नक्शे दुई मिटा दें.

सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती

आ इक नया शिवाला इस देश में बना दें.

यह अकेले उसके दिल की आवाज नहीं थी, समूचे भारत के सामूहिक मन की मांग थी. प्रमाण ढूंढना हो तो लगभग इसी समय के आसपास एक युवा हिंदू संपादक जो आगे के बरसों में हिंदी का एक महान आलोचक माना गया, बतौर संपादक इलाहाबाद से निकलने वाले साप्ताहिक भारत के अपने 28 नवंबर 1930 के संपादकीय ‘हिंदू- मुस्लिम एकता’ में लिख रहा था:

‘‘यदि हजारों वर्षों से एक साथ एक भावधारा और एक विचारधारा के संगम में निवास कर हमने एक-दूसरे को नहीं पहचाना तो हमारे मनुष्य होने में संदेह है. हम जिस ज्ञान की संपत्ति का गर्व करते हैं, जिस विश्वैक्य के आदर्श के लिए हमारी ख्याति है, वह हमारे किस मतलब की रही. यदि हम सहस्रों सैकड़ों वर्षो से एक साथ रहकर क्षुद्र स्वार्थ जन्य विभेद को नहीं मिटा सके तो हम व्यर्थ ही मनुष्य कहलाए. हमें एक साथ मिलकर रहना है सौ वर्ष नहीं, हजार वर्ष नहीं, अनंत वर्ष. हम झगड़ा करने के लिए नहीं पैदा हुए.’’

नंददुलारे वाजपेई रचनावली खंड 7, संपादक- विजय बहादुर सिंह
संयोग और सौभाग्य की बात यह कि इस लेख के लेखक को उस महान आचार्य का शिष्य बन पाने का अवसर मिला. इस संदर्भ में कहना चाहता हूं कि पराधीनता के दिनों में भी हमारी यह सोच अगर काम नहीं कर रही होती तो डॉ. इकबाल न तो राम पर लिख पाते न गुरु नानक पर, तराना ए हिंदी जैसी नज्मों का लिखा जाना तो और भी असंभव था. आज 2018 में जब हम कई एक बेहद कठिन चुनौतियों का अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर न चाहते हुए भी सामना कर रहे हैं, तब यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि हमारा सामूहिक विवेक (कलेक्टिव कॉन्साइंस) क्या रास्ता अपनाए.

कभी किसी विवेकी पुरुष ने कहा था कि व्यक्तियों और समाजों के पास जब कुछ करने को नहीं रह जाता, उनके सोचने और रचने की उर्वरता समाप्त हो जाती है, तब आपस में झगड़ना ही उनका सबसे खूबसूरत धंधा बन जाता है. ऐसे वक्तों में समाज और राष्ट्र के जीवन में उन व्यक्तियों की पहचान होती है जो लोक-विवेकी और प्रज्ञावान माने जाते हैं. कबीर हों या नानक, मीर हों या गालिब या फिर इकबाल, हमारे ऐसे ही रहनुमा हैं जिन्हें हम आज भी अपने से अलग नहीं कर पाए हैं. सवाल उठता है पर क्यों, वे कौन से कारण हैं जिनके चलते हम उन्हें भूल नहीं पाते और भूलना भी नहीं चाहते. इसका एक सीधा सरल और सपाट सा उत्तर है कि ये वे हैं जो इस चतुर चालाक, स्वार्थी दुनिया में रहकर भी अपने दिलों की भाषा को नहीं भूल पाते और जिनकी चेतना का तेज तमाम तरह की अधोगतियों और जटिल अंधेरों के बावजूद कभी मंद नहीं पड़ता. कवि या शायर अगर कैसे भी लोक-समाजों में यह काम कर पाते हैं तभी तो वे शायर कहे जाते हैं.

इसे अकेले इकबाल नहीं, शायरी की सारी कायनात जानती, महसूस करती और जीती है. वे अगर हमारी एक अनिवार्य जरूरत बनकर रहते हैं, तो कारण यही है कि कभी ऐसे अनुभवों और विचारों को तरजीह दे ही नहीं पाते जिनसे कोरी सफलताओं वाली दुनिया निभती है. अपनी और अपने समय के प्रति उनकी यह सच्चाई और ईमानदारी उन्हें प्रत्येक काल की मनुष्यता और समाज में महत्वपूर्ण बनाए रखती है. शायर इकबाल अगर आज भी हमारे लिए महत्वपूर्ण और स्मरणीय हैं तो इसीलिए. यह उन्हीं का तो एक शेर है:

अक्ल अय्यार है सौ भेष बदल लेती है

इश्क बेचारा न मुल्ला है न जाहिद न हकीम.

तब हमारे लिए फिर एक सुअवसर है कि हम अपने आप से पूछें कि उनके पास ऐसा क्या है जिसे हम अपने पास ही नहीं, अनिवार्यत: अपनी पहचान के रूप में हमेशा साथ रखना चाहते हैं. मेरी समझ में इकबाल से बात करने से पहले यह बातें जरूर हैं. इसमें क्या संदेह कि इकबाल का समूचा व्यक्तित्व एक पुरुष का या यों कहें मर्दाना व्यक्तित्व है. ऐसा न होता तो वह शाहीन (बाज) जैसा काव्य प्रतीक कभी न चुनते. क्योंकि उर्दू ही क्यों फारसी शायरी में भी बुलबुल जैसा प्यारा और कोमल प्रतीक बहुत आम है. फिर बुलबुल कोई आकाश का पक्षी नहीं है, घरों और बाग-बगीचों का परिंदा है, जबकि बाज तो समस्त पक्षि-जगत का बादशाह है. अपने एक शेर में वह लिखते भी हैं

एक तायरे लाहूती उस रिज्क से मौत अच्छी

जिस रिज्क से आती हो परवाज में कोताही.

माना कि ईश्वर की सत्ता तो अपनी जगह है पर तुम्हारी भी तो कोई सत्ता है न. निरंतर उड़ान भरने की इच्छा और सामर्थ्य ही तुम्हारे जीवन का सौंदर्य है. शायरी में इकबाल का यह आत्मविश्वास बेहद बुलंद है.

यहां पहुंचकर मैं यह सोचने पर मजबूर हो उठता हूं कि इकबाल कहीं मन ही मन मंसूर की तरह तो नहीं सोच रहे हैं. हिंदी दर्शन शास्त्र में वह अहम् ब्रह्मास्मि वाली बात तो कही गई है. यह भी उन्हीं इकबाल का कहना है:

खुदी को कर बुलंद इतना की हर तकदीर से पहले,

खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है.

एक और जगह उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर कह डाला:

‘खुदा हम दर तलाशें आदमे हस्त’ यानी मनुष्य वह जीव है कि ईश्वर भी उसका खोजी है. मानव गरिमा लेकर उनका यह आत्माभिमान उर्दू तो क्या समूची भारतीय शायरी में विरल है.

यह तो साफ समझ में आता है कि इकबाल एक पोएट फिलॉस्फर हैं. इस पर तो कोई विवाद शायद ही हो. विवाद इस पर भी नहीं है कि उनकी दिलचस्पियां सत्ता-राजनीति और राजनीति में भी कम नहीं हैं. वह गोलमेज कांफ्रेंस में गए ही थे. उनके राजनीतिक विचार क्या थे, क्या बने और बाद में क्या बनते गए, इस पर भी शायद ही किसी को शक हो. और आपत्ति भी क्यों होनी चाहिए. एक कवि और लेखक की नागरिक संवेदनशीलता भी होती है, नागरिकता और विभाजित मनुष्यता के बीच द्वंद्व की स्थिति जब पैदा हो जाए तब वह क्या फैसला ले- यह खास बात है. यहीं सवाल उठेगा कि वह संपूर्ण मानवता का शायर है या किसी जाति, धर्म या फिर विभाजित मानवता का.

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मानवता की मेरी धारणा और समझ वही है जो रामायण या महाभारत या मीर और गालिब की शायरी में निर्द्वद्व आग्रह के साथ मौजूद है. यानी वह इंसानी मूल्य जिनसे दुनिया राहत पाती है और रोज-रोज खूबसूरत होती चली जाती है. यहां हिंदू, ईसाई या इस्लाम जैसा कोई विभाजन नहीं है. शायरी का यही तो सौंदर्य है. वह निर्विवाद और निर्दोष मन की आवाज है. शायरी स्वार्थ और घृणा या फिर लोभ, लाभ और हानि के कारणों से फूटी आवाज नहीं है. वह अपने और पराए के बीच बंटी भाषा की चतुराई नहीं है. विपरीत इसके ब्रह्मांडीय अवचेतन की आवाज है. पर ऐसे भी कवि या शायर हुए हैं और होते हैं जो किन्हीं स्थितियों में यह आत्मसंयम और काव्य मर्यादा खो बैठते हैं. बगैर यह सोचे कि वे समूची सृष्टि की न जाने कितनी कोशिशों की सबसे खूबसूरत उपज हैं. संपूर्ण मानवता ही नहीं उन पर संपूर्ण चर-अचर की जिम्मेदारी है. इसलिए किसी कवि या शायर का पॉलिटिकल होना, उन खूबसूरत मानवीय मूल्यों का पक्षधर होना है जो सबसे ज्यादा न्यायसंगत और वरेण्य हों. अन्य मुहावरे में कहा जाए तो नैसर्गिक न्याय (नेचुरल जस्टिस) के अनुकूल हो. तथापि एक ऐसे मानव समाज की कल्पना जो अपने सुख भोग और विलासता के लिए अन्यों के अस्तित्व को क्षतिग्रस्त न करे बल्कि उनके स्वरूप और अस्तित्व की चिंता और रक्षा भी करे.

इस प्रसंग में मैं हिंदी के दो-एक बड़े लेखकों को याद करना चाहूंगा जैसे कि प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद. नि:संदेह प्रेमचंद करुणा के लेखक हैं. न्याय-अन्याय के प्रति बेहद संवेदनशील किंतु अन्यायीजनों के विरुद्ध सोचते और लिखते हुए भी यह मानते हैं कि दोष व्यक्तिश: इनका नहीं उस व्यवस्था का है, जिसने उनका मानस ऐसा बना दिया है. इसलिए उनकी कहानियों और उपन्यासों में किसी अत्याचारी सवर्ण या जमींदार की हत्या प्रदर्शित नहीं है. एक लेखक के तौर पर प्रेमचंद जानते हैं कि बच्चा न हिंदू होता है, न मुसलमान. और व्यवस्था के चलते वह अनजाने ही ऐसा होता जाता है. धर्म, राजनीति, समाज और वैचारिक सम्प्रदाय यह काम इतने कौशल से करते हैं कि वही बच्चा अपना सहज, स्वाभाविक अवचेतन भूलकर वह सब मानने और करने लगता है जिसे ये संस्थाएं सिखाना चाहती हैं. प्रश्न यह भी है कि क्या ये संस्थाएं इसीलिए बनाई गई हैं कि सहज स्वाभाविक, वृहतर अर्थों में नैतिक बोझ से सहज संपन्न जागरुकताएं हमसे छीन लें. हमें छोटे-छोटे संकरे खेमों में बांधकर उनके हवाले कर दें. लेकिन क्यों. पिछले जमानों में शायद संभव भी रहा हो पर आज तो यह कैसे भी संभव नहीं है. यह वैश्विक बोध का जमाना है. इसमें व्यक्ति और जातिबोध का मायने अगर बचता भी है तो ऐतिहासिक स्थितियां देर तक उसे बचने नहीं देंगी. अगर प्रेमचंद, मंटो या जयशंकर प्रसाद एक खूबसूरत दुनिया का सपना देखते हैं और तमाम तरह के शैतानीपन के खिलाफ गांधी की तरह सोचते और लिखते हैं तो क्या यह वृहतर इंसानी सोच नहीं है. शायर इकबाल भी यही थे.

इकबाल जैसे बड़े शायर और दार्शनिक रुझानों वाले व्यक्ति से तब हम क्यों और कैसे यह उम्मीद करें कि वे किसी जाति-धर्म और राजनीति के पैरोकार के रूप में भी अपनी पहचान रेखांकित करने की कोशिश करें. क्या इससे स्वंय कविता और कला की संस्कृति क्षतिग्रस्त नहीं होती. क्या इकबाल खुद को तब चौहद्दी या कहें पिंजरे में महदूद नहीं करते. उनको लेकर मेरे मन में एक बड़ा सवाल तो है ही. जानता हूं यह एक विवादास्पद सवाल है किंतु कवियों और लेखकों के लिए एक जरूरी सवाल भी है. कवि या लेखक अंतत: किसी सत्ता द्वारा स्थापित मूल्यों की सिफारिश या वकालत क्यों करें. उसका काम उदात्त मूल्यों की पैरवी करना है, जिनसे किसी सत्ता, राजनीति या धर्म की नहीं, संपूर्ण मानवता के हितों की रक्षा होती हो.

व्यवस्था और उससे जुड़े लोग तो धीरे-धीरे उनके मानस में जहर घोलते ही चलते हैं और वह अगर राजनीति या वैचारिक सम्प्रदायवाद के साथ रहे या गुलाम हो तब भी उसके लिए यह मुश्किल हो बैठता है. इकबाल बाद में अगर कुछ इधर-उधर हुए तो कारण यही है कि उन्हें परिस्थितियों ने मजबूरन सत्ता राजनीति में जाना पड़ा या कहें वह किन्हीं कारणों से ऐसे समय के शिकार हो गए. तब भी ढेर सारे इकबाल हमारे काम के हैं और हमें सोचने को बाध्य करते हैं.

आलोचक लोग उन्हें मुस्लिम नवजागरण के साथ जोड़ते हैं पर वहां भी वे असमंजस में फंसे हुए हैं. उनके एक तरफ हाली है तो दूसरी तरफ शिबली और बीच में खुद इकबाल लगभग बंटे हुए से. या कहें पारी-पारी से दोनों की ओर आते-जाते. ऐसा कैसे और क्यों कर हुआ यह बड़ा सवाल है. इस पर सोचने के लिए निश्चय ही सहानुभूति और पाक साफ दिल और दिमाग की जरूरत पड़ेगी. फिर भी इससे मुकरना कतई वाजिब न होगा.

अंतत: मेरा कहना यही है कि इकबाल जितनी दूर तक हमारे काम के हैं हम उनके वारिस के तौर पर उसे साधिकार लेते रहेंगे. वे हमारे आदरणीय पुरखे हैं और हम उनकी आदरणीयता को अपनी समृद्धि और उससे जुड़ी भावधारा को अपना गौरव मानते हैं.

(डॉ. विजय बहादुर सिंह, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक हैं)

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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