Analysis : गुजरात चुनाव में क्या सचमुच पहले से बेहतर है कांग्रेस का प्रदर्शन?

भाजपा के लिहाज से भी देखें तो इस बार गुजरात में उसने हिंदू-मुसलमान या पाकिस्तान के कोण से प्रचार करने में देर लगाई. पहले चरण के चुनाव के बाद ही उसने इस मुद्दे को बढ़ाया.

Analysis : गुजरात चुनाव में क्या सचमुच पहले से बेहतर है कांग्रेस का प्रदर्शन?

गुजरात के नतीजों को लेकर यह संभावना बना दी गई थी कि भाजपा का धूम-धड़ाके से जीतना तय है. खुद भाजपा का आकलन यह था कि 150 सीटें जीतेगी. इससे यह दावा भी बनता था कि कांग्रेस 35 सीटों पर सिमट जाएगी. इस तरह का दावा सिर्फ भाजपा का ही नहीं रहा, बल्कि चुनाव सर्वेक्षण एजेंसियां भी आमतौर पर भाजपा को 130 लाती हुई बताती रहीं. कांग्रेसमुक्त नारा कारगर होता हुआ बताने के लिए भाजपा को कम से कम इतनी सीटें जरूरी थीं. अगर यह नहीं हुआ तो यह तो कहा ही जा सकता है कि कांग्रेस ने अंदेशे से बेहतर प्रदर्शन किया. कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के क्या-क्या कारण रहे, उसका फौरन ही तर्कपूर्ण विश्लेषण करना कठिन काम है. फिर भी फौरी तौर पर उन कारणों की तलाश करें, तो पांच बातें कही जा सकती हैं...

गुजरात की जनता कांग्रेसमुक्त नारे को सुनने को राजी नहीं
यहां पिछले चुनाव पर गौर करने की जरूरत पड़ेगी. सब तरह से भाजपा के लिए अनुकूल उस माहौल में भी भाजपा 119 सीटें ही जीत पाई थी. पिछले चुनाव में धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक कोई भी कारण भाजपा के प्रतिकूल नहीं था. दावा यह भी किया जाता है कि पाटीदार, एससी, एसटी यहां तक कि मुसलमानों का एक तबका आर्थिक कारणों से उसके साथ था. इस बार वे भी कम से कम आंशिक रूप से भाजपा के खिलाफ खड़े बताए जा रहे थे. तो फिर भाजपा के लिए पिछले चुनाव से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद किस आधार पर की जा रही थी, इसका कोई तुक बनता नहीं था. फिर भी तर्क पैदा किया गया. तर्क भी उप्र के चुनाव की नजीर दिखाकर पैदा किया गया. लेकिन गुजरात के नतीजों में वैसा नहीं दिखा. इस आधार पर कहा जा सकता है कि गुजरात की जनता कांग्रेसमुक्त नारा सुनने को राजी नहीं.

आर्थिक नीतियां
उप्र के चुनाव के नतीजों का एक विश्लेषण इस तरह किया गया कि जनता ने नोटबंदी से बर्बादी के आरोप को नकार दिया. लेकिन तब यह नहीं देखा गया कि उप्र के मुकाबले गुजरात ज्यादा व्यापारी और उद्योगपति किस्म का है. गुजरात के नतीजों का विश्लेषण करते समय यह जरूर देखा जाना चाहिए कि कांग्रेस ने गुजरात के छोटे कारोबारियों और व्यापारियों के दर्द को साझा करने में कितनी कामयाबी हासिल की.

भावनात्मक मुद्दों का जोर न पकड़ पाना
कांग्रेस की यह मुश्किल हमेशा से रही है कि वह हिंदू, मुसलमान जैसे भावनात्मक मुद्दे का काट कैसे करे. इस बार यह नई बात दिखी कि कांग्रेस ने बड़ी बुद्धिमानी से यह संदेश पहुंचा लिया कि वह हिंदू विरोधी नहीं है बल्कि उसने तो बड़ी आसानी से दिखा दिया कि कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व जन्मतः हिंदू ही है. गुजरात के बहाने यह पहली बार हुआ है कि हिंदू होना अनिवार्यतः मुसलमान विरोध नहीं है. इस बात ने गुजरात में कांग्रेस के प्रदर्शन पर कितना असर डाला इसे नापने का कोई उपकरण किसी के पास नहीं है. लेकिन विषयगत विश्लेषण से इसका अंदाजा जरूर लागया जा सकता है. भाजपा के लिहाज से भी देखें तो इस बार गुजरात में उसने हिंदू-मुसलमान या पाकिस्तान के कोण से प्रचार करने में देर लगाई. पहले चरण के चुनाव के बाद ही उसने इस मुद्दे को बढ़ाया. लेकिन तब तक वक्त गुजर चुका था. एक और गौरतलब बात थी कि कांग्रेस ने इसका ज्यादा प्रतिकार भी नहीं किया. राहुल गांधी तब तक अपने हिंदू होने का जिक्र कर चुके थे और इस तरह की दूसरी बातों पर उन्होंने ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं की. इससे हुआ यह कि बात आगे बढ़ ही नहीं पाई. गुजरात चुनाव में कांग्रेस की तरफ से प्रतिक्रिया की बजाए क्रिया पर ही ध्यान लगाने की प्रवृत्ति पहली बार दिखी और कारगर होती दिखी.

हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश का असर
चुनाव प्रचार के आखिरी दिन तक यह लगभग साबित कर दिया गया था कि हार्दिक पाटीदारों के एकछत्र नेता नहीं हैं. कड़वा और लेउआ के विभाजन के जरिए उन्हें बेअसर साबित किया गया था. इतना ही नहीं आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर यह तर्क दिया गया था कि पाटीदारों के आरक्षण की वकालत करके कांग्रेस ने एससी एसटी का साथ खो दिया. लेकिन अब जब चुनाव के नतीजे आ रहे हैं उससे एक बात कही जा सकती है कि पिछले चुनाव में जातिगत आधार पर जो जातियां एकतरफा भाजपा के साथ दिखीं थीं, उनके नेता कांग्रेस के साथ दिख रहे थे. पूरी तौर पर कांग्रेस के साथ न भी दिख रहे हों लेकिन इस बात से कौन नकार सकता है कि वे भाजपा के खिलाफ अपनी नाराजगी खुलेआम बोलकर जता रहे थे. गुजरात के नतीजों का एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि कांग्रेस की अपनी विरासत के मुताबिक सर्वजातीय समर्थन की फिर से कोशिश गुजरात से होती दिखी.