Opinion: ‘सोवियत संघ के विघटन’ जैसा त्रिपुरा चुनाव परिणाम

त्रिपुरा में भाजपा की ऐतिहासिक जीत इस मायने में बेहद खास है कि जहां पिछले विधानसभा चुनावों में पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी. वहीं अब पार्टी के ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के सपने को भी एक नयी उड़ान मिली है क्योंकि रुझानों के अनुसार कांग्रेस का त्रिपुरा में खाता भी नहीं खुल पाया है.

Opinion: ‘सोवियत संघ के विघटन’ जैसा त्रिपुरा चुनाव परिणाम

सामान्य रूप से दिल्ली-केन्द्रित मीडिया पूर्वोत्तर की घटनाओं को कवर करने को लेकर उदासीन रहता है. पूर्वोत्तर स्थित राज्यों के विधानसभा चुनावों को शायद ही कभी इतना कवरेज मिला होगा और इतनी दिलचस्पी से देखा गया होगा जितना कि आज देखा जा रहा है. त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के चुनावों के नतीजे चौंकाने वाले आ रहे हैं. मेघालय में जहां एक तरफ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी बढ़त बनाए हुए है, वहीं त्रिपुरा और नागालैंड में भगवा सरकार बनती हुई दिख रही है. इनमे से सबसे बड़ी खबर त्रिपुरा में भाजपा की ऐतिहासिक जीत को लेकर है जहां पिछले विधानसभा चुनावों में पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी. पार्टी के ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के सपने को भी एक नयी उड़ान मिली है क्योंकि रुझानों के अनुसार कांग्रेस का त्रिपुरा में खाता भी नहीं खुल पाया है.

त्रिपुरा चुनाव में पहली बार दक्षिणपंथी भाजपा और वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीएम) आमने-सामने थीं. इसके पहले वैचारिक रूप से एक-दूसरे की परस्पर विरोधी लेफ्ट और राइट का मुकाबला केवल जेएनयू एवं कुछ और विश्वविद्यालयों में ही देखने को मिलता था. त्रिपुरा में पिछले 25 साल से लेफ्ट पार्टी की सरकार है और पिछले 20 साल से माणिक सरकार त्रिपुरा के मुख्‍यमंत्री हैं. दो साल पहले जब भाजपा ने चुनाव की तैयारियां शुरू कीं तब पार्टी के पास न तो लोकप्रीय नेता था और न ही सीपीएम जैसा संगठन और काडर जो गांव-गांव तक जाकर भाजपा का विस्तार कर सके. ऐसे में भाजपा का त्रिपुरा फ़तह कर लेना किसी चमत्कार से कम नहीं. लेकिन इस चमत्कार के पीछे कुछ महत्वपूर्ण कारण हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है.

1. प्रधानमंत्री मोदी का व्यक्तित्व
2014 से ही केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्वोत्तर के विकास को लेकर अपनी सरकार की प्रतिबद्धता ज़ाहिर कर दी थी. इसीलिए केंद्र के एक मंत्री को हर पन्द्रा दिन में एक बार पूर्वोत्तर का दौरा करना पड़ता था. स्वयं प्रधानमंत्री मोदी काफी बार वहां गए जिससे वहां की जनता में यह विश्वास पहुंचा की दिल्ली अब उन पर ध्यान दे रही है. और इस चुनाव में मोदी ने चार रैलियाँ भी की जिनमे भारी संख्या देखने को मिली. त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार के समकक्ष किसी स्थानीय लोकप्रिय भाजपा नेता के अभाव में मोदी ने पूरे चुनाव को माणिक बनाम मोदी में परिवर्तित कर के माणिक सरकार के खिलाफ जो दांव खेला उसका जवाब माणिक सरकार के पास नहीं था.

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पीएम मोदी ने त्रिपुरा में 'चलो पलटाई' (चलो करते हैं बदलाव) का नारा दिया था, जिसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव जनता पर बहुत अधिक पड़ा. माणिक सरकार की साफ़ छवि मोदी के बेदाग़ और इमानदार छवि के आगे फ़ीकी पड़ गई थी. मोदी ने जनता तक यह बात पहुंचाने की कोशिश की कि माणिक सरकार केंद्र की कल्याणकारी नीतियों को राज्य में ठीक तरह से लागू नहीं कर रही है.

2. अमित शाह की रणनीति
माजूदा समय के चाणक्य के रूप में उभरे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी. उन्होंने रणनीति तैयार की जिसके तहत पार्टी ने अन्य दलों से आए हुए नेताओं और विधायकों को भाजपा में शामिल करना चालू कर दिया था. हालाँकि इसको लेकर स्थानीय स्तर पर कुछ विरोध भी हुआ लेकिन अमित शाह ने उन सभी को दरकिनार कर के हर जिताऊ प्रत्याशी को पार्टी में शामिल कर के सीपीएम के सामने एक मज़बूत विपक्ष पैदा किया. इनमें कांग्रेस के वो नेता भी शामिल थे जिनकी राजनीति का आधार ही ‘वामपंथ-विरोध’ से उत्पन्न हुआ था और जो 2014 के बाद से दिल्ली में कांग्रेस की सीपीएम से बढ़ी हुई निकटता को लेकर स्वयं को असहज महसूस कर रहे थे. ऐसे में शाह ने वामपंथी सरकार के ऊपर लगातार कड़े हमले करके त्रिपुरा में उन नेताओं के लिए ‘वामपंथ-विरोधी’ राजनीति की जगह भाजपा में खोल दी थी. भाजपा महासचिव राम माधव एवं असम के शक्तिशाली मंत्री हेमंता बिस्वा सरमा को अमित शाह ने विशेष रूप से इस काम के लिए चुना क्योंकि दोनों के पास ही अन्य दलों के नेताओं से संपर्क बनाने का और उनको पार्टी में शामिल करने का लम्बा अनुभव रहा है.

3. सुनील देवधर का ग्राउंड मैनेजमेंट
भाजपा ने त्रिपुरा के लिए संघ के प्रचारक सुनील देवधर को भेजा था जो लम्बे समय तक पूर्वोत्तर में प्रवास कर रहे थे. देवधर ने सबसे पहले उन नेताओं का कद छोटा किया जो तथाकथित रूप से माणिक सरकार के प्रति नर्म रुख अपनाते थे. उन्होंने राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी और ख़राब कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाया और इसके खिलाफ़ कई आन्दोलन किये, जिससे जनता में यह सन्देश गया कि राज्य में सीपीएम के खिलाफ अगर कोई खड़ा है तो वो भाजपा ही है. इस दौरान अन्य कोई भी विपक्षी दल इतना आक्रामक नहीं दिखा. देवधर ने प्रदेश अध्यक्ष बिप्लब देव के साथ मिलकर समाज के हर वर्ग तक भाजपा की विचारधारा को पहुंचाया और उनसे समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया. उन्होंने IPFT (इंडीजेनस पीपुल्स फ्रंट आफ त्रिपुरा) के साथ गठबंधन करके पार्टी को जनजातीय समुदायों का भी समर्थन दिलवाया. देवधर ने राष्ट्रीय मुद्दों पर भी माणिक सरकार को घेरा और माणिक सरकार के ऊपर राष्ट्रविरोधी विचारधारा के समर्थन का आरोप लगाया जिससे यह लड़ाई तथाकथित रूप से ‘नेशनल बनाम एंटी-नेशनल’ की भी बन गई. पूरे कैंपेन में उन्होंने रोज़गार, विकास और क़ानून-व्यवस्था को केंद्र में रखा और चुनाव को किसी अन्य विवादित मुद्दे की तरफ़ भटकने नहीं दिया. लेफ्ट के ऊपर आरोप लगते थे कि लेफ्ट की सरकार ने पार्टी के काडर और अपने लोगों को फायदा पहुंचाया है और पूरे सरकारी तंत्र में अपने लोगों को बैठाकर लूट मचाई जा रही है. यहां तक कि गरीबों के दैनिक रोज़गार के लिए बनाई गई नरेगा जैसी योजना की दिहाड़ी का भी हिस्सा पार्टी को देना पड़ता था’. देवधर ने लोगों को यही विश्वास दिलाया कि भाजपा यदि सत्ता में आती है तो यह संरक्षण की राजनीति बिलकुल बंद होगी और जनता की कमाई का हिस्सा पार्टी के काडर और नेताओं को नहीं देने दिया जाएगा.

त्रिपुरा में हार के साथ ही वामपंथी दलों के ऊपर अस्तित्व बचाने का गहरा संकट आ गया है. एक ज़माने में भारतीय राजनीति का मज़बूत स्तम्भ मानी जाने वाली वामपंथी पार्टियां सही नेताओं और नीतियों के आभाव में आज हाशिये पर चली गई हैं. बंगाल में ख़त्म होने के बाद और त्रिपुरा हारने के बाद महज़ केरल ही ऐसा राज्य है जहां वामपंथी दलों की सरकार है और जहां उनका जनाधार शेष है. लेकिन जिस गति और उर्जा से भाजपा एक के बाद एक किला फ़तह कर रही है उससे सीपीएम को केरल को लेकर निश्चिंत नहीं रहना चाहिए. भाजपा अध्यक्ष शाह पहले ही केरल को लेकर अपनी मंशा ज़ाहिर कर चुके हैं. देखना है कि क्या वो वहां भी त्रिपुरा जैसा कोई चमत्कार करने में सफल हो पाते है. लेकिन देखा जाए तो त्रिपुरा चुनाव परिणाम वामपंथियों के लिए सोवियत संघ के विघटन जैसा है जिसमें उनके सबसे लोकप्रिय चेहरे माणिक सरकार के नेतृत्व के बावजूद दक्षिणपंथी विचारधारा से उनकी हार हो गई.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में शोधार्थी हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)