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मार्क्स @200: कितना प्रासंगिक है मार्क्सवाद?

जब तक मार्क्सवाद का भारतीयकरण और इसमें आमूलचूल परिवर्तन नहीं आएंगे तब तक इसका उत्थान संभव नहीं है.

मार्क्स @200: कितना प्रासंगिक है मार्क्सवाद?

कुछ दिन पहले जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, लेखक एवं इतिहासकार कार्ल मार्क्स की 200वीं सालगिरह थी. लेकिन प्रिंट मीडिया में कुछ लेख और विश्वविद्यालयों में एक-दो गोष्ठियों के अलावा और कहीं भी मार्क्स को उस तरह से याद नहीं किया गया, जैसा बीस-तीस साल पहले किया जाता था. एक ज़माने में सबसे ज्यादा प्रभावशाली और क्रांतिकारी मानी जाने वाली मार्क्सवादी विचारधारा आज भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर हाशिये पर है. मार्क्सवादी विचारधारा वाले दल राजनीतिक रूप में अब अपने सबसे निचले पायदान पर पहुंच चुके हैं और उबरने का कोई नाम नहीं ले रहे. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि लगभग पांच दशक तक दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाली और करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाली विचारधारा आज ऐतिहासिक पतन की कगार पर है? आइये समझते हैं.

यूरोप की औद्योगिक-क्रांति में मजदूरों का दमन होने लगा. अमानवीय परिस्तिथियों में उनको कोई अधिकार नहीं मिलता था और दिन में पंद्रह-सोलह घंटे काम करना पड़ता था, छुट्टी आदि का कोई प्रावधान नहीं था. इसी पूंजीवाद और मजदूरों के दमन के खिलाफ़ मार्क्स ने अपने लेखन से साम्यवादी विचारधारा को आगे बढ़ाया, जिसमें मज़दूर-एकता (workers-unity) और निजी-संपत्ति की समाप्ति (abolishion of private property) प्रमुख स्तम्भ थे. मार्क्स की ही विचारधारा से प्रभावित होकर 1917 में रूस में लेनिन ने अक्टूबर-क्रांति की और सोवियत संघ की स्थापना की. इसी तरह मार्क्स और लेनिन से प्रभावित होकर माओ ने चीन में क्रांति की और चीनी जनवादी गणतंत्र स्थापित किया. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पूंजीवादी अमरीका और साम्यवादी/समाजवादी सोवियत रूस हिटलर के नाज़ीवादी जर्मन के खिलाफ एक साथ तो लड़े, लेकिन युद्ध समाप्ति के तुरंत बाद ही दोनों एक दूसरे के घोर शत्रु हो गए और शीत युद्ध की शुरुआत हो गई जिसमें पूरी दुनिया दो वैचारिक खेमों में बंट गई.

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चार दशकों से अधिक चले इस युद्ध का अंत सोवियत संघ के विघटन के साथ हुआ, जिसने दुनिया के सामने मार्क्सवादी विचारधारा में निहित खामियों को सामने ला के रख दिया. पूंजीवाद के विकल्प के रूप में खड़ी हुई विचारधारा उसके के आगे इसलिए नहीं टिक पाई क्योंकि पूंजीवाद की तरह इसमें लचीलापन नहीं था. इसका एक अच्छा उदाहरण है. द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद जब भारी तबाही की मार झेल रहे पश्चिम यूरोपीय देशों में रोजगार और मंदी का भयावह संकट मंडराने लगा और मुक्त-बाज़ार अर्थव्यवस्था (फ्री मार्केट इकॉनमी) को अव्यावहारिक समझा जाने लगा तो पूंजीवादी व्यवस्था ने ही अपने आप को परिवर्तित कर के समाजवादी विचारधारा के कुछ गुणों को अपना के फिर से पूंजीवाद को खड़ा कर दिया और उन देशों में साम्यवाद को पनपने नहीं दिया. इसका श्रेय कहीं न कहीं ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन कींस को जाता है जिन्होंने कींसवादी अर्थव्यवस्था के माध्यम से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के अंतर्गत कल्याणकारी-राज्य की अवधारणा दी जिससे यूरोपीय देश मंदी और पुनर्निमाण के संकट से उबर कर फिर उठ खड़े हुए. 

मार्क्सवादी विचारधारा की प्रासंगिकता कितनी है इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आज शायद ही कोई देश मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार चलना चाहता है. शीत-युद्ध के दौरान मार्क्सवादी विचारधारा को लेकर चलने वाला सोवियत संघ पंद्रह राज्यों में विगठित हो गया. अपने आप को साम्यवादी कहने वाला चीन सबसे बड़े पूंजीवादी देश के रूप में उभरा है. चीन आज इतनी बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में इसलिए उभर पाया है क्योंकी माओ की मृत्यु के बाद देन जाओपिंग के नेतृत्व में उसने मार्क्सवादी विचारधारा को छोड़ कर मार्केट सोशलिज्म को अपना लिया. वहीं मार्क्सवादी विचारधारा को लेकर चलने वाला दक्षिण अमरीकी देश वेनेज़ुएला आज विशाल आर्थिक संकट से जूझ रहा है जहां सालाना महंगाई दर 15,657 प्रतिशत है और लोगों के पास ब्रेड खरीदने को भी पैसे नहीं है.

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वैश्वीकरण के कारण जिस तरह से प्रोडक्शन नेटवर्क में परिवर्तन आया और मज़दूर यूनियन का पतन होने लगा, मार्क्सवादी उसको समझने और उसके खिलाफ जवाबी प्रतिक्रिया देने में भी असफल साबित हुए. इसका कारण है कि उनकी सोच में कोई भी नयापन नहीं है और वो आज भी दुनिया को उसी चश्मे से देखते हैं जहां एक बुर्जवा वर्ग (अमीर, फैक्ट्री मालिक) है जो प्रोलितारियात (गरीब, फैक्ट्री कर्मचारी) वर्ग का शोषण कर रहा है. मार्क्सवादी इन सब के बीच नए मध्यम-वर्ग को अपने राजनीतिक-दर्शन और समझ में कहीं स्थापित ही नहीं कर पाए, क्योंकि उनकी परंपरागत समझ के विरुद्ध यह वर्ग न तो पूरी तरह से शोषणकर्ता वर्ग में फिट बैठता है और न शोषित में. 

भूमंडलीकरण के दौर में फिर जिस तरह से राजनीति का मध्यमवर्गीयकरण हुआ, उसमे मज़दूर एकता और वर्ग-संघर्ष की जगह समाप्त हो गई. आउटसोर्सिंग और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी क्रांति ने तो रही-सही कसर भी पूरी कर दी क्योंकी अब किसी एक वस्तु को बनाने के लिए कई देशों में उसका कुछ हिस्सा बनने लगे. इस व्यवस्था ने मज़दूर संघ स्थापित करने की संभावनाएं ही खत्म कर दी. मसलन किसी अमरीकी कंपनी के मोबाइल की चिप चीन में बन रही है, उसका सॉफ्टवेयर भारत में तैयार किया जा रहा है और उसको बेचा यूरोप में जा रहा है. ऐसे में इस कंपनी के लिए काम करने वाले मज़दूर अलग अलग देशों में है और दूसरे को जानते ही नहीं हैं और न कभी जान पाएंगे. तो यूनियन कहां से बनेगा?

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भारत में मार्क्सवाद
एक ज़माने में भारतीय राजनीति में वामपंथी दलों की तूती बोलती थी. फिर धीरे-धीरे उनका रुतबा कम होता गया और आज स्थिति यह है कि केरल को छोड़ कर वो कहीं भी सत्ता में नहीं हैं. लोकसभा में भी सभी वामपंथी दलों को मिलाकर केवल 11 सांसद हैं. भारत में मार्क्सवादी विचारधारा के पतन का कारण स्वयं उसकी रूढ़ीवादी और परिवर्तन-विरोधी सोच-प्रक्रिया रही. दरअसल, मार्क्सवादी विचारधारा कभी भी भारतीय परिस्थितियों में स्वयं को ढाल ही नहीं पाई. भारत जैसे देश में जहां शोषण का सबसे बड़ा कारण और माध्यम जाति-व्यवस्था है, ये लोग उसे छोड़ कर वर्ग-संघर्ष के मुद्दों में ही उलझे रह गए. इन्होंने लंबे समय तक जातिगत-शोषण को अनदेखा किया जिस कारण समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी आदि पार्टियों का उदय हुआ जो जातिगत-समस्याओं और शोषण को समझ पाई और इसके खिलाफ़ दलितों, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों की तथाकथित आवाज़ बन के उभरी. इसके अलावा वो मार्क्सवाद का अपना कोई भारतीय मॉडल ही नहीं ला पाए, और न ही कोई भारतीय आदर्श, जिससे लोगों को प्रेरणा मिले और वो उसे अपने बीच का ही कोई समझ कर उससे जुड़ सकें.

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भारतीय मार्क्सवादी बस मार्क्स, लेनिन, माओ, स्टालिन और एंजेल्स के विचारों की प्रशंसा में डूबे रहे. यहा तक की इनको अंबेडकर को भी अपने आदर्श के रूप में स्वीकार करने में कई दशक लग गए और वो भी तब किया जब आंबेडकर को वैश्विक रूप से सामाजिक-न्याय का सबसे बड़ा नेता माना जाने लगा, मार्क्स से भी ऊपर. आज भारत के कुछ विश्वविद्यालयों में और कुछ प्रकाशनों में ही मार्क्सवाद मजबूती से खड़ा है. अन्य जगह, विशेष रूप से भारतीय राजनीति में तो यह बस एक आलोचक बन के रह गया है जिसकी आधी राजनीतिक-गतिविधियां तो यह ही होती हैं कि मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खड़ा करने के लिया कांग्रेस के साथ जाएं या नहीं या मोदी सरकार को ‘फ़ासीवादी’ माना जाए या नहीं. इनकी सफ़लता छात्रसंघ-चुनाव जीतने तक ही सीमित हो चुकी है और इनका प्रभावक्षेत्र महज़ जंतर-मंतर, इंडिया हैबिटैट सेंटर और मीडिया स्टूडियो तक ही सिमट गया है. ऐसे में जब तक मार्क्सवाद का भारतीयकरण और इसमें आमूलचूल परिवर्तन नहीं आएंगे तब तक इसका उत्थान संभव नहीं है. केवल आलोचल बन के सत्ता नहीं हासिल की जा सकती, उसके लिए विकल्प बनने की आवश्यकता होती है. भारतीय संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझे बिना भारत में मार्क्सवाद कभी पुनःस्थापति नहीं हो सकता है.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में शोधार्थी हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)