कोरोना काल में बच्चों के लालन-पालन के लिए ये बात है सबसे जरूरी

ध्यान रखें, इस दौरान पैरेंट्स की खुशी, घर में मौजूद दादा-दादी की खुशी या खिलखिलाहट उसके लालन-पालन में खाद का काम करेगा. आप मान सकते हैं कि इस कठिन समय में आप अपने बच्चे को वह सब कुछ दे सकते हैं, जो उसका हक है.

कोरोना काल में बच्चों के लालन-पालन के लिए ये बात है सबसे जरूरी

यंग पैरेंट हैं नमिता-अमित. इसी वर्ष मार्च में इस दंपत्ति के आंगन में पहली संतान का आगमन हुआ है. पिछले सप्ताह डिजिटल माध्यम से नमिता-अमित से मेरी मुलाकात हुई. वे बोले-सर, कोरोना काल न होता तो हम अपने बच्चे के साथ बाहर निकलते. पार्क-बाजार जाते. वह इस खूबसूरत, रंग-बिरंगी दुनिया को देखता. खुली हवा में नीले गगन तले सांस लेता.

हमें लगता है कि यह बच्चा मां के पेट में ही ज्यादा सुरक्षित था. कोरोना की वजह से उसका लालन-पालन उस तरीके से नहीं हो पा रहा है, जैसे होना चाहिए था. सामान्य दिन होता तो यही बच्चा दादा-दादी, नाना-नानी, बुआ-फूफा, मोहल्ले के चाचा-चाची, पड़ोस वाले भैया-भाभी की गोद में भी खेल चुका होता. लोगों का लाड़ पाकर यह और सेहतमंद होता. खुश रहता.

अभिमन्यु की कहानी
नमिता-अमित का सवाल था कि कोरोना काल में पैदा हुए बच्चों के माता-पिता कैसे करें अपने लाल-लाडली का लालन-पालन? इन दोनों को सुनते हुए काउंसलर के रूप में अचानक मेरे मन में भी अनेक सवाल, दृश्य उमड़ने-घुमड़ने लगे. मैंने खुद को सहज किया और अपनी बात रखी. मैंने नमिता-अमित को महाभारत के अभिमन्यु की कहानी सुनाई, जिसमें बताया गया है-गर्भ में पल रहे अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना इसलिए आ गया क्योंकि उनके पिता महावीर अर्जुन जब यह कहानी पत्नी को सुना रहे थे तो वह जाग रही थीं लेकिन जब चक्रव्यूह से निकलने की बात वे बयां कर रहे थे तो उनकी पत्नी की आंख लग गई थी.

अनजाने में मां से हुई एक मामूली चूक
उस समय की सीख अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसने में तो मददगार हुई लेकिन निकलते समय वे फंस गए क्योंकि उस समय मां को नींद आ गई थी. उसका खामियाजा अभिमन्यु को युवावस्था में चुकाना पड़ा. अनजाने में मां से हुई एक मामूली चूक की इतनी बड़ी सजा किसी मां को मिलने का कोई दूसरा मामला अब तक सामने नहीं है.

अभिमन्यु की घटना इस बात को पुख्ता करती है कि कोई भी बच्चा, मां के पेट से ही सीखना शुरू कर देता है. यहां वह कहावत भी गलत साबित होती है-जिसमें लोग कहते मिल जाते हैं-लगता है कि मां के पेट से ही सीखकर आए हैं. इस दुनिया में कदम रखने के साथ ही हम बच्चे के चेहरे पर अनेक मुद्राएं सहज देख सकते हैं. इन मुद्राओं की प्रेरणा और सीख मां का गर्भ ही तो होता है.

तकलीफ में बच्चा रोता है तो खुश होने पर मुस्कुराना नहीं भूलता. वही बच्चा भूख लगने पर पहले हाथ-पैर चलाता है और बात तब भी नहीं बनती तो रोना शुरू कर देता है. मां का ध्यान फिर भी नहीं गया तो चीखते हुए भी हम अपने बच्चों को आसानी से देखते हैं.

मतलब साफ है कि जिस बच्चे को हम मासूम समझकर अनसुना करते हैं, असल में वह केवल बोल नहीं पाता. बाकी चीजों की समझ उसे होती है. बस दुनियादारी की समझ नहीं होती. इसीलिए दादी-नानी, डॉक्टर दीदी, गर्भावस्था के दौरान हमेशा खुश रहने का सुझाव देती हैं. कोशिश की जाती है कि गर्भवती स्त्री को किसी भी तरह का तनाव न होने पाए क्योंकि इसका नकारात्मक असर मां-बच्चे, दोनों पर पड़ता ही है. यह वैज्ञानिक तौर पर स्थापित सच है.

कोरोना काल को अवसर के रूप में देखें
मैंने नमिता-अमित से जो कहा, वही यहां लिख रहा हूं. कोरोना काल को अवसर के रूप में देखें. बच्चे के सामने हर वह काम करें, जो आप उससे बड़े होने पर अपेक्षा करते हैं. चाहे घर में पूजा-पाठ की बात हो या परिवार  के बीच आपसी सहयोग की या फिर प्यार-मोहब्बत के साथ उठने-बैठने की. हंसने-खिलखिलाने का आपका प्रयास भी मासूम को प्रेरित करेगा. प्रयास करें कि उसके सामने कोई ऐसी गतिविधि न हो जो उसे असहज करे यानी आप उसके सामने असहज हों.

ध्यान रखें, इस दौरान पैरेंट्स की खुशी, घर में मौजूद दादा-दादी की खुशी या खिलखिलाहट उसके लालन-पालन में खाद का काम करेगा. आप मान सकते हैं कि इस कठिन समय में आप अपने बच्चे को वह सब कुछ दे सकते हैं, जो उसका हक है और मैं कतई भौतिकवादी युग में उपलब्ध सामान की बात नहीं कर रहा हूं.

आपका प्यार ही उसके लिए सबकुछ है
मैं आपके कीमती समय की बात कर रहा हूं. सामान्य दिन होता तो आप दफ्तर जाते, बाजार जाते, रिश्तेदारों के यहां भी जाते लेकिन हर उस जगह पर आपका बच्चा-बच्ची आपके साथ नहीं होते. अब जब आपको पैरेंट्स के रूप में कोरोना के सहारे मौका मिल गया है तो उसे उसका पूरा हक दें. हां, आपको ही इसे दादा-दादी, नाना-नानी, बुआ-फूफा, मोहल्ले के चाचा-चाची, पड़ोस वाले भैया-भाभी के बदले का प्यार देना है. समय सामान्य होने पर उनका प्यार हासिल कर लेगा यह मासूम. कोरोना का क्या है, आज आया है, कल चला भी जाएगा. लेकिन पैरेंट्स और इस मासूम के लिए आज का समय कभी नहीं आएगा. भरोसा करिए-आपका प्यार ही उसके लिए सबकुछ है.

(लेखक सीनियर जर्नलिस्ट, काउंसलर और लाइफ कोच हैं.)
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.)