सौ दिन हुए पूरे, अब है बदलाव की जरूरत

सौ दिन हुए पूरे, अब है बदलाव की जरूरत

 रतन मणि लाल

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बने 100 दिन पूरे हो गए. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजनीतिक परंपरा निभाते हुए अपने सौ दिन के कार्यकाल का लेखा जोखा दिया और उपलब्धियां गिनायीं. कुछ नए काम शुरू हुए, कुछ कमियां बाकी हैं, लेकिन सभी विपक्षी दलों ने इन उपलब्धियों को सिरे से नकार कर सरकार को अभी से "असफल'' बताया है. ये बात अलग है कि सौ दिनों का हिसाब देने का निर्णय भी सरकार का अपना ही था, किसी दल ने ऐसी कोई मांग कभी की नहीं थी. 

सही तो यह होगा कि भाजपा सरकार के पहले सौ दिन के काम की तुलना पिछली समाजवादी सरकार के शुरुआती सौ दिन के काम से की जाए. प्रदेश के लोग अभी भूले नहीं है कि 2012 के मार्च में सरकार बनने से पहले ही समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में खींच-तान शुरू हो गई थी. चुनाव के नतीजे 6 मार्च को आये थे और 12 को मुलायम सिंह यादव ने निर्णय लिया था कि अखिलेश यादव मुख्य मंत्री होंगे. इसके बाद एक वरिष्ठ नेता ने अखिलेश यादव के मातहत मंत्री बनने से मना कर दिया था और कई दिन उन्हें मनाने का सिलसिला चला. फिर 15 मार्च को हुए शपथ ग्रहण समारोह के बाद से ही सरकार में एक से अधिक सत्ता के केन्द्रों का उभरना शुरू हो गया जिनमे मुख्यमंत्री के अलावा मुलायम सिंह यादव स्वयं, दो वरिष्ठ मंत्री और एक अधिकारी शामिल थे. पार्टी के कुछ लोगों और समाज के एक विशेष वर्ग को भी जिस तरह से तरजीह दी जाने लगी थी और इस दिशा में सरकार का उद्देश्य स्पष्ट था. मुलायम सिंह यादव की हिदायतें संकेत देती थीं कि मुख्य मंत्री की अनुभवहीनता कहीं न कहीं सरकार के काम करने पर हावी थी.

मई-जून 2012 के महीनों में हुई अपराधिक घटनाओं में पुलिस कर्मियों पर हमला और हत्या, इलाहाबाद में बम विस्फोट में छः लोगों की मौत, लखनऊ में दिन-दहाड़े लूट व हत्याएं, बरेली में रेलवे स्टेशन पर पुलिस कांस्टेबल की हत्या और मथुरा के कोसी कलां में दंगों में चार लोगों की मौत शामिल है. प्रदेश में यह धारणा बनने लगी थी कि अपराधियों और अराजक तत्वों को कानून का कोई डर नहीं रह गया है. 

और अब, पांच साल बाद जब एक नई सरकार अपने सौ दिन पूरे कर चुकी है, तो अपराध और कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर विपक्षी दलों द्वारा सरकार और मुख्य मंत्री की कार्य शैली पर सवाल उठाए जा रहे हैं. हालांकि प्रदेश भाजपा के नेता यह मानते हैं कि कानून-व्यवस्था में और सुधार की जरुरत है और अभी स्थिति वैसी नहीं है जैसे होनी चाहिए, लेकिन वे केवल इसी एक बिंदु को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश पर सवाल उठाते हैं. पार्टी के प्रतिनिधि कहते हैं कि भाजपा की बड़ी जीत के चलते सपा समेत उसकी सहयोगी कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी राजनीतिक हाशिये पर जाने की कगार पर हैं, और केवल अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए ही योगी सरकार पर हमला बोलने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहीं हैं. 

पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता हरीश चन्द्र श्रीवास्तव कहते हैं कि योगी सरकार द्वारा विशेषकर किसानों के हित में लिए गए फैसले ही इतने व्यापक और महत्त्वपूर्ण हैं कि उनका असर कुछ ही महीनों में दिखने लगेगा. इन फैसलों में किसानों की क़र्ज़ माफ़ी, कृषि विकास केंद्र की स्थापना, पानी की कमी वाले इलाकों में तालाब खोदने के लिए अनुदान, आलू किसानों के लिए समर्थन मूल्य, गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान आदि प्रमुख हैं. साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में फर्जी प्रवेश रोकने और सरकारी विद्यालयों में कॉपी-किताब व ड्रेस देने के अतिरिक्त शिक्षकों के तबादलों को पूरी तरह से पारदर्शी और ऑनलाइन बनाने का महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया गया है. उनका मानना है कि ''इतने व्यापक निर्णयों के बारे में प्रतिक्रिया देने की बजाए सिर्फ कानून-व्यवस्था और अपराध के बारे में टिप्पणी करना विपक्षी दलों की नकारात्मकता और हताशा दिखाता है."
 
दूसरी ओर, पार्टी के अन्य सूत्र संकेत दे रहे हैं कि जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद सरकार और संगठन में बड़े फेर-बदल के संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. पार्टी के एक सूत्र के अनुसार स्वयं मुख्यमंत्री ने पहले ही संकेत दिए थे कि सौ दिनों के प्रदर्शन के बाद मंत्रियों और अधिकारियों के बारे में निर्णय लिए जा सकते हैं. कुछ अधिकारियों पर भरोसा किया गया लेकिन उनका प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है. ऐसे में कुछ बदलाव करना आवश्यक हो गया है." मुख्य सचिव के संभावित बदलाव और कई विभागाध्यक्षों के बदलने की ख़बरों से भी यही प्रतीत होता है. बड़े बहुमत से बनी सरकार से अपेक्षाएं भी बड़ी होती हैं, और ऐसे में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए बदलाव तो जरुरी होगा ही.

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं...)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)