मिडिल ईस्ट में अनिश्चितता बढ़ाता है बड़ी ताकतों का नाजुक गठजोड़

सच्चाई ये है कि राष्ट्रपति रिसेप तईप एर्दोगन, व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनी जैसे व्यक्ति उस नई दुनिया व्यवस्था में एक जैसे हैं, जहां लोकतंत्र और कानून का राज नहीं चलता. 

मिडिल ईस्ट में अनिश्चितता बढ़ाता है बड़ी ताकतों का नाजुक गठजोड़

तुर्की-रूसी संबंध एक नई विश्व व्यवस्था के नाजुक गठबंधनों के प्रबंधन को समझने का विषय है, जो बारूद के कई डिब्बों से भरा हुआ है और किसी भी समय उड़ सकता है.रूस और चीन, रूस और ईरान, तुर्की और ईरान और तुर्की और चीन के बीच संबंधों की तरह ही, तुर्की-रूसी गठजोड़ इस तथ्य के बावजूद नाजुक हैं कि वे पश्चिमी धारणाओं के उलट, केवल मौकापरस्त नहीं हैं और थोड़े समय के लिए साझा हितों पर टिके हैं, बल्कि साझा मूल्यों के आधार पर भी बने हैं.

सच्चाई ये है कि राष्ट्रपति रिसेप तईप एर्दोगन, व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनी जैसे व्यक्ति उस नई दुनिया व्यवस्था में एक जैसे हैं, जहां लोकतंत्र और कानून का राज नहीं चलता, मानव और अल्पसंख्यक अधिकारों की अवहेलना होती है, शान दिखाई जाती है, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किया जाता है, और जहां जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाला तरीका चलता है.

हालांकि, जिस आधार पर ये गठजोड़ बना है, वो तुर्की और रूस को लीबिया और सीरिया में टकरावों के विपरीत पक्षों को खत्म करने से रोकने के लिए नाकाफी है. इसमें संदेह है कि इससे ईरान और रूस के बीच कैस्पियन सागर में दुश्मनी और रूस की लंबे समय से चली आ रही अनिच्छा खत्म हो जाएगी जिसके बाद वो ईरान को एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम बेच देगा, जो ईरान के लिए बेहद जरूरी है.

इसी तरह, सीरिया में, जहां रूस और ईरान, राष्ट्रपति बशर अल-असद को सैन्य जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाने के बाद पुनर्निर्माण के आर्थिक लाभ उठाने की उम्मीद कर रहे हैं, शक्ति का संतुलन नाटकीय रूप से बदल सकता है, अगर चीन युद्ध में बर्बाद इस देश में निवेश करने का मन बनाता है. रूस और ईरान दोनों के पास इतना पैसा नहीं है कि वो चीन का मुकाबला कर सकें.

अब तक, तुर्की, रूस, चीन और ईरान ये सुनिश्चित करने में माहिर रहे हैं कि मतभेद बेकाबू न हों. सवाल ये है कि क्या संभावित विस्फोटों को रोकने के लिए अस्थायी प्रबंधन टिकाऊ है. लीबिया में, तुर्की ने अस्थायी रूप से ड्रोन ऑपरेशन्स को रोक दिया, ताकि रूसी सैनिक उन इलाकों से जा सकें, जिन पर तुर्की समर्थित, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त इस्लामिक गवर्नमेंट ऑफ नेशनल एकॉर्ड (GNA) ने कब्जा कर लिया, जो कि तुर्की के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर से मुमकिन हुआ, जिसने रूस के एंटी डिफेंस मिसाइल सिस्टम को निशाना बनाकर खत्म कर दिया. जिसका इस्तेमाल स्वयं-नियुक्त फील्ड मार्शल खलीफा हफ्तार की अगुवाई में मॉस्को समर्थित विद्रोही कर रहे थे.

सीरिया में, रूस और तुर्की ने विद्रोहियों के आखिरी बचे गढ़ इदलिब में एक असहज युद्धविराम और सुरक्षा व्यवस्था पर बातचीत की है, उन झड़पों के बाद जिसमें तुर्की ने अल-असद की रूसी और ईरानी समर्थित सेनाओं पर गंभीर चोट की थी.

बैंड एड सॉल्यूशन्स फौरी तौर पर आर्थिक हितों और भू-राजनीतिक लक्ष्यों को तो पूरा कर सकते हैं, लेकिन चार शक्तियों की अलग अलग दीर्घकालिक आधिपत्य पाने की महत्वाकांक्षाओं को छिपा नहीं सकते.

"[लीबिया में] तुर्की क्या कर रहा है?" राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन की सुरक्षा और विदेश नीति बोर्ड के सदस्य मेसुत हक्की कासिन ने पूछा. “कारण ये है कि भूमध्य और काला सागर के जलडमरूमध्य में प्रभुत्व और नियंत्रण स्थापित करने के बाद ओटोमांस ने मिस्र पर विजय हासिल की. ऐतिहासिक और राजनीतिक कारणों से तुर्की लीबिया में है.”

मध्य एशिया में सत्ता के संतुलन में बदलाव से स्पष्ट है कि हितों की लड़ाई केवल युद्ध के मैदान पर नहीं होती है. वे हथियारों की बिक्री में प्रतिस्पर्धा में भी साफ दिखाई देती है. लीबिया और सीरिया में तुर्की ड्रोन के भरोसेमंद प्रदर्शन ने तुर्की में बने मानव रहित एयरक्राफ्ट और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम की मांग को बढ़ाया है और रूस के एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम पर भरोसे को कम किया है.

बायरक्तर टीबी-2 और एंका-एस नाम के तुर्की के ड्रोन्स ने इस साल की शुरुआत में उत्तरी सीरिया में रूसी समर्थित सीरियाई सैन्य इकाइयों को नष्ट कर दिया, जबकि उन्होंने रूस की पैंटसर और बूक सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम का इस्तेमाल किया था. इसी तरह का दृश्य पश्चिमी लीबिया में हफ्तार की सेना की हार में देखा गया था. लीबिया और सीरिया में हितों में टकराव और महामारी के कारण देश में आर्थिक तंगी ने एर्दोगन को अमेरिका के साथ संबंधों को सुधारने और राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को फिर से संवारने के लिए राजी कर लिया, साथ ही रूस के साथ अपने रिश्तों में गरमाहट पैदा की. 

हाल ही में, तुर्की के सरकारी गैस ग्रिड ऑपरेटर बोटास ने अजरबैजान में अर्मेनियन एनक्लेव नखिचवन में एक पाइपलाइन बिछाने के लिए एक टेंडर खोला. इस पाइपलाइन से अजरबैजान को ईरान से आयात कम करने में मदद मिलेगी. तुर्की व्यापार समुदाय के लिए अमेरिका में लॉबिस्ट लुइसियाना एनर्जी कंपनी के प्रस्ताव का समर्थन कर इसको भुनाने की कोशिश में लगे हैं, जिसमें तुर्की को LNG टर्मिनल्स, गैस पाइपलाइन और स्टोरेज सुविधाओं के लिए लंबे समय तक, सुरक्षित और उचित कीमत पर पहुंच प्रदान करने की बात है. ऐसा होने से देश की रूस और ईरान से आयात पर निर्भरता कम हो जाएगी.

एर्दोगन और उनके ऊर्जा मंत्री, फतिह डोनमेज़ ने तुर्की के ऊर्जा आयात में विविधता की धारणा को आगे बढ़ाया है. तुर्की के अनुभवी पत्रकार केंगिज कैंडर के मुताबिक, “सीरिया से लीबिया तक, काला सागर से भूमध्य सागर तक, एर्दोगन को अब अहसास हुआ है कि तुर्की को कुछ महीने पहले की तुलना में अब राजनीतिक और रणनीतिक रूप से अमेरिका की ज्यादा जरूरत है. उन्होंने अनुभव से सीखा कि ट्रम्प को अपना निजी दोस्त बनाकर संयुक्त राज्य अमेरिका में जाना किसी भी अन्य तरीके से आसान है.” 

एर्दोगन ट्रम्प से सीधे बात करने और जो चाहते हैं, उसे पाने के लिए अपने पहले के अनुभव पर भरोसा कर रहे हैं वो भी पेंटागन के विरोध के बावजूद जैसा कि हाल में तुर्की के सीरिया में हस्तक्षेप के दौरान हुआ था. एर्दोगन ने एक टेलीविजन इंटरव्यू के दौरान 9 जून को फोन पर बात करते हुए कहा, "सच कहूं तो, आज रात हमारी बातचीत के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका और तुर्की के बीच एक नया युग शुरू हो सकता है."

एर्दोगन का नजरिया ईरान के लिए आसान नहीं है जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका में बिल्कुल विश्वास नहीं रखता, लेकिन ये निश्चित रूप से कई यूरोपियन नेताओं और राजनेताओं की रूस के बारे में सोच को बतलाता है. इसमें कोई शक नहीं, ये भी एक विकल्प है कि पुतिन ने इसकी अनदेखी नहीं की है. 

चीन, रूस, तुर्की और ईरान के बीच रिश्तों का जाल भयानक नजर आ सकता है लेकिन तुर्की-रूसी संबंधों की जटिलता से पता चलता है कि वे किसी भी देश को स्वीकार करने के लिए तैयार होने की तुलना में अधिक तेजी से बनाए जा सकते हैं.

कहते हैं, जब तक कोई कार्यक्रम पूरा नहीं हो जाता, तब तक उसके नतीजे को लेकर अटकलें लगाना ठीक नहीं है, और इस बात पर खाड़ी और मध्य पूर्व के नेताओं को संदेह नहीं है. 
 
(लेखक: जेम्स एम. डोर्से एक अवार्ड विजेता पत्रकार और विदेशी मामलों के टिप्पणीकार हैं जिन्होंने तीन दशकों से अधिक समय से दुनियाभर में जातीय, धार्मिक संघर्ष और आतंकवाद को कवर किया है.)

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)