जलो मत बराबरी करो

जलो मत बराबरी करो
डोकलाम में भारत की कूटनीतिक जीत, दोनों देश हटाएंगे अपनी-अपनी सेना (फाइल फोटो)

जयराम शुक्ल

चीन से अपन की तो पैदाइशी अदावत है. इधर मैं पैदा हो रहा था, उधर चीन बम बरसा रहा था. चीन के बमों का असर मेरे पैदा होने पर इसलिए पड़ा क्योंकि वो जगह जबलपुर में बम, गोला बनाने वाली फैक्ट्री के श्रमिकों की बस्ती थी. रात को ब्लैकाउट. वाहनों की हेडलाइट में काला कोलतार. मुझे ढिबरी की रोशनी में पैदा होना पड़ा. मेडिकल की मदद दूर दूर तक नहीं. कातिक की गुलाबी ठंड भर से ही मुझे निमोनिया हो गया. दाई..और पडोसी महिलाओं की चुटकबैदिया ने एक नन्हीं जान को शहीद होने से बचा लिया. युद्ध में सिर्फ़ सैनिक भर शहीद नहीं होते. और भी बहुत लोग होते हैंं जो अपंजीकृत ही रहे आते हैं. खैर फिर भी अब तक निमोनिया ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. साल में एक दो बार झटका मार ही देता है. न सर्दी देखता है न गर्मी. मुझे निमोनिया का अटैक कब आ जाएगा न डाक्टर जान पाए और न मैं. चीन का चरित्र भी निमोनिया जैसे ही है. विषाणु जब अनुकूल मौसम देखते हैं तो फेफड़े को जकड़ लेते हैंं. चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी ठीक निमोनिया के विषाणुओं जैसी ही है. अंदाजा नहीं लगा सकते देश के किस कोने में कब घुस आएगी.

डोकलम में ये सहमति बन गई कि दोनों देश की फौजें वापस होंगी तो अपने यहां सोशल मीडिया में जीत के जश्न के पटाखे फूटने लगे. वाह..वाह ऐतिहासिक कूटनीतिक विजय. हो सकता है कुछ उत्साही ..इस विजय. के लिए लख..लख बधाईयों वाला विग्यपन छपवा दें. खैर दुनिया के लिए चीन वैसेइ अबूझ है जैसे अपने लिए उसकी भाषा. उसकी चाल सन् 62 में समझ में आई जब नेहरू के साथ पंचशील का झूलाझूलते हुए चाऊ.एन.लाई, जोर जोर से चीखने लगे..हिन्दी चीनी भाई भाई. बीजिंग पहुंचे तो सांप की तरह पलटवार किया. सम्भलने का मौका ही नहीं दिया. अक्साई चिन के विशाल भू भाग में कब्जा कर लिया. इस बार भी चीन प्रमुख अपने प्रधानमंत्री के साथ साबरमती में झूलाझूला लौटकर बीजिंग पहुंचे तो पीएलए की आर्मी को अरुणाचल में घुसेड़ दिया. और फिर अब डोकलम में पहुंच कर चिकन नेक पकड़ ली. ये तो मोदी थे कि जवानों को डटे रहने को कहा और झापड़ युद्ध से लेकर एटमी युद्ध के लिए तैय्यार रखा. वरना नेहरू होते तो कह सकते थे कि भूटानइ को तो तंग कर रहा है अपना क्या? और वह चिकन नेक..की करी बनाकर खा चुका होता. अब जो डोकलम का नया घटनाक्रम है उसमें न हम जीते न वो हारा की स्थिति है. अब बैठे ठाले हम सर्जिकल स्ट्राइक की तरह डंका पीट दें की ऐतिहासिक कूटनीतिक विजय यह समयाचीन नहीं. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी घुसपैठ और हमले हो रहे हैं. इधर भी कोई गारंटी नहीं कि चीन कोई नई चाल नहीं चलेगा. सांप की पूंछ दबती है तो वह जरूर पलटवार करता है. ड्रैगन यानी अजदहा तो सांप का पुरखा है. चीन की हर युद्ध कला सांप की चाल से प्रेरित होती है. वह बीन बजाने वाले को भी डसने से नहीं छोड़ता. 

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बहरहाल मुद्दे की बात ये कि चीन से खतरा सैन्यमोर्चे में नहीं है. जब उसकी नजर में विश्व बाजार है तो भला क्यों लड़े झगड़ेगा. व्यापारी लड़ने की झंझट से दूर ही रहता है. किसी को ठिकाने लगाना है तो उसका मैंनेजर जा के किसी सूटर को सुपारी दे आता है. चीन के पास जब किराये का गुंडा पाकिस्तान है तो उसे फिकर किस बात की. यदि वह यूएनओ में लखवी, अजहर मसूद, हाफिज सईद की पैरवी करता है तो बिना विस्तार में जाए उसका मंतव्य समझ जाना चाहिए. सीमा पर पाकिस्तान की फौज और आतंकवादी, देश के भीतर माओवादी. उसका प्रहार अंदर और बाहर दोनों की ओर से है. वह दोनों को पाल रहा है और हम छोटीमोटी रूटीन की कूटनीतिक सफलताओं में खुश हो लेते हैंं.

चीन में एक बाबा हुए नाम था सुन त्जू ने बहुत पहले वहां के शासकों को मंत्र दिया था- युद्ध के बगैर ही शत्रु को हराना ही सबसे उत्तम कला है,यह कला आर्थिक ताकत से सथती है... चीन ने इस मंत्र को तावीज में मढ़ाकर रख लिया है. वह सोने के रथ पर सवार होकर दुनिया का बाजार लूटने निकल पड़ा है. हम उसकी पहली चपेट पर हैं. चीन 61अरब डालर का व्यापार भारत से करता है, उसके एवज में चीन से हमारा कारोबार महज 10 अरब डालर का है. वह हमसे बहुत आगे है. इलेक्ट्रॉनिक, कम्युनिकेशन के मामले में उसका कब्जा है. हर दस ब्रांड के मोबाइल्स में नौ ब्रांड उसके हैं. वह घर में घुसा है स्वाद में घुसा है हमारी आदतों में शामिल हो रहा है. इसलिए वह दंभ के साथ कहता है भारतीय भले ही कुछ बकें,हमारे बगैर रह नहीं सकते. बहिष्कार एक सांकेतिक तरीका हो सकता है. दीर्घकालिक तरीका परिष्कार है..हम अपने कुटीर उद्योगों का परिष्कार करके ही उसके मुकाबले खड़े हो सकते हैं. कोई और चारा नहीं सिवाए अपने उपभोक्ताओं को चीनी विकल्प उपलब्ध कराने के.  व्यापार बंद कर सकते नहीं क्योंकि विश्वव्यापार संगठन की शर्तो से बंधे हैं. मुझे ट्रकों के पीछे लिखा वो वाक्य हमेशा ही प्रेरित करता है..जलो मत बराबरी करो.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)