क्या इन दिनों ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं भगवान महावीर?: सुधीर जैन

क्या इन दिनों ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं भगवान महावीर?: सुधीर जैन

इस बार महावीर जयंती पर क्यों न जैन दर्शन के दो मुख्य सिद्धांतों की चर्चा कर ली जाए. ये दो अवधारणाएं हैं अनेकांत और स्याद्वाद. विश्व और खासतौर पर अपने देश के मौजूदा हालात देखें तो ये दोनों सिद्धांत कुछ ज्यादा ही प्रासंगिक हो गए हैं. 

क्या है अनेकांत
जैन दर्शन के इस सिद्धांत के मुताबिक दो या दो से ज्यादा विरोधी गुण एक साथ उपस्थित रह सकते हैं. इसमें एक और जटिल बात जोड़ी गई है कि ये विरोधी गुण एक ही समय में एक साथ हो सकते हैं. मसलन कोई व्यक्ति एक ही समय में ईमानदार और उसी समय साथ में बेईमान भी हो सकता है. कोई चीज़ एक ही समय में काली और साथ में सफेद भी हो सकती है. यह बात कोई ढ़ाई हजार साल तक दर्शन शास्त्र की एक अवधारणा के रूप् में ही रही. लेकिन पिछली सदी में जब भौतिकशास्त्र के वैज्ञानिकों ने परमाणु के नाभिक के चारों और चक्कर काटने वाले इलेक्ट्रॉन के व्यवहार को गौर से देखा तो पता चला कि यह ऐसा कण है जो पदार्थ भी है और ऊर्जा भी है. वरना उसके पहले तक भौतिकशास्त्र इलेक्ट्रॉन को ऊर्जा ही समझता था. उसके पहले तक भौतिक विज्ञानियों का यकीन था कि जो चीज़ ऊर्जा के रूप में है वह पदार्थ नहीं हो सकती. पदार्थ उसे माना जाता है जिसमें वज़न हो और जो जगह को घेरता हो. पिछली सदी में ही हमें पता चला कि इलेक्ट्रॉन का अपना वजन भी है और वह जगह भी घेरता है. जब हमें पता चला कि इलेक्ट्रॉन के ऊर्जा रूप के साथ-साथ एक ही समय में वह पदार्थ रूप में भी है तो हमें अपनी भारतीय चिंतन या दार्शनिक परंपरा के अनेकांत के सिद्धांत को प्रमेय बना लेना चाहिए था. लेकिन सुनने पढ़ने में नहीं आता कि जैन विद्वानों ने इसकी चर्चा एक भौतिक साक्ष्य के रूप में  की हो. हो सकता है यह इसलिए न हो पाया हो क्योंकि इधर जैन धर्म के प्रवक्ता ज्ञान क्षेत्र की बजाए अध्यात्म और उपासना या कर्मकांड की तरफ ज्यादा बढ़ चले हैं.

स्याद्वाद
आमतौर पर जैन अनुयायियों को अनेकांत की तरह ही स्याद्वाद भी उतनी ही जटिल अवधारणा लगती है. अव्वल तो जैन विद्वान सर्वसुलभ नहीं है और अगर कहीं हैं भी तो अपने कट्टर आग्रहों के कारण आधुनिक वैज्ञानिक शोध से उन्हें कुछ अरूचि सी है. जबकि जैन विद्वान होने के नाते उनके एकांगी होने की गुंजाइश ही नहीं बचनी चाहिए. किसी भी जैन विद्वान को अगर स्याद्वाद को परिभाषित करने का काम दिया जाए तो वह यही कहेगा कि स्याद्वाद कथन की प्रणाली का नाम है. खास तौर पर अनेकांतिक स्थितियों को किस तरह कहा जाए वह प्रणाली ही स्याद्वाद है. वैसे इस जैन सिद्धांत को भी पिछली सदी में भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में सापेक्षता के सिद्धांत के रूप में अनुमोदन मिली थी. लेकिन तब भी जैन आचार्यों और जैन विद्वानों ने जैन दर्शन के मुताबिक अपनी प्रतिस्थापना की चर्चा नहीं कर पाई थी.

मीडिया के लिए तो बड़े काम की हो सकती हैं दोनों बातें

मीडिया यानी पत्रकारिता में समाचार वाला जो हिस्सा जिस हालत में है सो तो है ही लेकिन विचार वाले हिस्से में एकांगी व्यवहार के आरोप ज्यादा लगने लगे हैं. अखबारों के आलेख हों या टीवी पर बहसें हों ठोक के अपनी बात कहते जाने और दूसरे की बात काटते जाने की प्रवृत्ति इतनी बढ़ती जा रही है कि यह पता ही नहीं चलता कि सही बात कौन सी है. कभी तो धर्मनिरपेक्षता सही लगती है और कभी सिर्फ अपने धर्म का पक्ष ही जायज़ दिखने लगता है. जबकि अनेकांत और स्याद्वाद के हिसाब से अगर बताया समझाया जाने लगे तो कम से कम हम इतना तो बता ही सकते हैं कि इस लिहाज से धर्मनिरपेक्षता सही है और इस लिहाज से सिर्फ हमारा अपना धर्म. बाकी सुनने समझने वाले अपना हिसाब लगा लें कि उनके लिए क्या ठीक है.

और क्या-क्या है इस मौके पर याद करने के लिए

जैन दर्शन अपने त्रिरत्नों में एक रत्न सम्यक ज्ञान को सबसे पहले रखता है. इसीलिए जैन दर्शन के पाठ में कार्य कारण संबध को बड़ी संजीदगी से समझा जाता है. यानी यह जाना जाता है कि किस प्रभाव का कारण क्या है या यों कहें कि इस कारण से क्या प्रभाव पड़ेगा. मसलन आमतौर अहिंसा परमो धर्मः सुनने को मिलता है. लेकिन जब इसके सही होने की पड़ताल होती है तो यह जाना जा सकता है कि हिंसा आखिर होती किस कारण से है. तब पता चलता है कि किसी चीज़ के पाने के लिए ही हिंसा होती है. जरूरत से ज्य़ादा चीज़े हासिल करने के लिए जैन दर्शन के पाठ में परिग्रह शब्द है. यानी कार्य कारण संबंध के लिहाज़ से जांचे तो हिंसा प्रभाव है और उसका कारण परिग्रह है. अब अगर अनुमान लगाएं कि तीर्थंकर महावीर अगर सुझाव देते तो वे अपरिग्रह परमो धर्मः कहते. विश्व की, खासतौर पर अपने देश की, मुख्य समस्याएं हिंसा, आर्थिक शोषण, जातिगत व धर्मगत भेदभाव और सुख के असमान वितरण जैसी समस्याओं के प्रतिकार करने के लिए क्या इन सारी समस्याओं का एक कारण परिग्रह को नहीं माना जाना चाहिए. कितना अच्छा हो कि इस तरह के गंभीर विमर्श की शुरुआत जैन अनुयायियों की तरफ से ही हो जाए. लेकिन ये काम शुरू तभी हो पाएगा जब वे आध्यात्मिक और उपासना वाले पूजा पाठ पर खर्च होने वाले समय और धन में कटौती करके जैन दर्शन के नैतिक भाग पर अपने संसाधनों का कुछ खर्च बढ़ाएंगे.  

(सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं )