पुलिस ने 60 मिनट में ही दे दी थी जेएनयू को 'दंगाईयों से आजादी', ये है उस एक घंटे का सच

मैं किसी तरह कैमरामैन को बाहर छोड़ जेएनयू के अंदर पहुंचा. मैंने देखा कि इंस्पेक्टर ऋतुराज अपने स्टाफ के साथ पेरियर हॉस्टल से लौटे हैं. 

पुलिस ने 60 मिनट में ही दे दी थी जेएनयू को 'दंगाईयों से आजादी', ये है उस एक घंटे का सच

नए साल के पहले हफ्ते में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में जो हुआ वो जेएनयू के इतिहास में कभी नहीं हुआ था. 6 जनवरी को जेएनयू कैंपस में दोपहर करीब 3:45 पर वसंत कुंज नार्थ थाने के एसएचओ ऋतुराज को जानकारी मिली कि जेएनयू में पेरियर होस्टल के बाहर कुछ अज्ञात लोग इकट्ठा हो कर तोड़फोड़ और मारपीट कर रहे हैं. जेएनयू में लेफ्ट और राइट विंग के बीच हुए झगड़े की खबर मुझे भी मिली. मैं फौरन अपनी कैमरा टीम के साथ जेएनयू पहुंच गया तो देखा जेएनयू गेट के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है, गेट को अंदर से बंद किया हुआ था. मैं किसी तरह कैमरामैन को बाहर छोड़ जेएनयू के अंदर पहुंचा. मैंने देखा कि इंस्पेक्टर ऋतुराज अपने स्टाफ के साथ पेरियर हॉस्टल से लौटे हैं. 

उनसे मैंने जब जेएनयू के हालात के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि करीब 40-50 अनजान लड़के हॉस्टल के बाहर खड़े थे जिनमें से कुछ के हाथों में डंडे और रॉड भी थी. उनमें से कुछ ने अपने चेहरे को रुमाल और मफलर से ढका हुआ था. ये लोग कुछ छात्रों के साथ मारपीट और तोड़फोड़ कर रहे थे. पुलिस को देखकर सभी हुड़दंगी वहां से भाग गए लेकिन थोड़ी देर बाद ही कॉल मिली कि अब वो छात्र किसी दूसरी जगह पर छात्रों के साथ मारपीट कर रहे हैं. मौके की नजाकत को समझते हुए फौरन इस बात की जानकारी जॉइंट कमिश्नर आनंद मोहन और डीसीपी देवेंद्र आर्या को दी गई.

जेएनयू प्रशासन ने पुलिस से सहायता मांगी और कैंपस में शांति व्यवस्ता बनाए रखने को कहा. पुलिस ने पहले सादे कपड़ों में कुछ पुलिस वालों को भेजा लेकिन हालात काबू नहीं हो रहे थे. पेरियार हॉस्टल के बाद खबर मिली कि ये उपद्रवी माहीं मांडी हॉस्टल में घुस गए हैं. पुलिस लगातार छात्रों से शांति बनाए रखने की अपील करने लगी. लेकिन एक के बाद एक पीसीआर कॉल मिलने लगे कि छात्रों के साथ मारपीट की जा रही है. तब तक जेएनयू के गेट के पास बने सिक्योरिटी रूम में जॉइंट कमिश्नर आनंद मोहन और डीसीपी आ चुके थे. उन्होंने नई दिल्ली रेंज के ज्यादातर एसएचओ और एसीपी के साथ भारी पुलिस फ़ोर्स को बुला लिया था. महिला पुलिस कर्मियों को सादी वर्दी में बुलाया था काफी पुलिसवाले भी सदी वर्दी में थे. 

इसी बीच शाम के 7 बजे खबर आई कि हुड़दंगी साबरमती हॉस्टल में घुस गए हैं. तो पहले से अंदर मौजूद पुलिस जैसे ही साबरमती हॉस्टल पहुंची पुलिस को देख दंगाई भाग गए उसके बाद जॉइंट कमिश्नर ने ऑर्डर दिया कि जेएनयू के अंदर मौजूद उपद्रवियों को पकड़ो. डीसीपी देवेंद्र आर्या की अगुवाई में एसएचओ ऋतुराज एसीपी रमेश ककड़, और 40-50 पुलिस वाले जेएनयू के अंदर तलाशी अभियान चलाने लगे. डीसीपी ने जींस के ऊपर स्वेटशर्ट पहनी हुई थी. सिर पर क्रिकेट हैलमेट पहना हुआ था और हाथ मे लिया हुआ था डंडा. उसी तरह से इंस्पेक्टर ऋतुराज ने भी हैलमेट के साथ हाथ मे पुलिस का डंडा थामा हुआ था. बाकी ज्यादातर पुलिसवालों के सिर में हैलमेट और हाथ में डंडे थे. जिन पुलिस वालों के पास डंडा नहीं था उन्होंने आस-पास के पेड़ों से मोटी टहनियां तोड़ ली थीं. 

पुलिस की इन तैयारियों को देखकर मुझे अंदाजा हो गया था कि पुलिस अब एक्शन के मोड में आ गई है. अब सबसे पहले पुलिस को तलाश थी उन उपद्रवियों की जिन्होंने जेएनयू की आबोहवा में हिंसा घोल दी थी. सभी पुलिस वालों ने तेजी से साबरमती हॉस्टल की तरफ रुख किया बिना चैनल आईडी के मैं भी पुलिस वाला बन कर उनके साथ-साथ चलने लगा क्योंकि मुझे जॉइंट कमिश्नर और डीसीपी से काफी देर तक बात करते हुए बाकी पुलिसवालों ने देखा था तो सभी मुझे भी पुलिस अधिकारी ही समझ रहे थे. कुछ पुलिसवालों ने तो मुझे चलते वक़्त हैलमेट पहने की भी पेशकश कर डाली. अब हम लोग तेज कदमों से जेएनयू के अंदर की तरफ बढ़ रहे थे तभी रास्ते में जेएनयू के मेन गेट की तरफ आते हुए दो लड़के दिखे जिन्होंने मुहं पर मफलर डाला हुआ था. उन्होंने पुलिस को देखकर 'दिल्ली पुलिस गो बैक' बोला ही था कि पुलिस का एक डंडा उनकी टांगों पर जैसे ही पड़ा वो चीखते हुए वापस जेएनयू के अंदर भागने लगे.

कुछ पुलिसवाले उनके पीछे दौड़े लेकिन डंडा लगते ही उनके भागने की रफ्तार इतनी ज्यादा थी कि अगर इस तरह वो किसी रेस में भागते तो पक्का गोल्ड मैडल लेकर आते. उसके बाद एडमिन ब्लॉक की तरफ जाने वाले रास्ते के टी पॉइंट पर तीन लड़के पुलिस के आते हुए का मोबाइल वीडियो बनाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन जैसे ही पुलिस को दौड़कर अपनी तरफ आते हुए देखा तीनों गोली की रफ्तार से अपने हॉस्टल की तरफ भागे. अब पुलिस साबरमती हॉस्टल की तरफ बढ़ रही थी तो रास्ते मे देखा कि उपद्रवियों ने तीन गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए थे. पुलिस के साथ मौजूद वीडियोग्राफर ने उन गाड़ियों की तस्वीरें रिकॉर्ड की अब पुलिस साबरमती हॉस्टल के बाहर खड़ी थी.हमने देखा कि कुछ लड़कियां डरी सहमी खड़ी थीं पुलिस को देखते ही वो पुलिस पर ही देर से आने को लेकर चिल्लाने लगीं.

हॉस्टल की खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे. सभी पुलिस वाले बाहर ही रुक गए. महिला पुलिसकर्मियों को अंदर जाने का आदेश डीसीपी ने दिया. कुछ महिला पुलिसकर्मी अंदर गईं और थोड़ी देर बाद ही वापस आ गईं. अंदर उन्हें कोई नहीं मिला. हॉस्टल में हुई तोड़फोड़ की वीडियोग्राफी करवाई गई. अब पुलिस का दस्ता कावेरी और पेरियार हॉस्टल की तरफ बढ़ने लगा और मैं उनके साथ. रास्ते मे पुलिस ने देखा कि एक लड़का-लड़की एकांत में गाड़ी में बैठे हैं पुलिस ने देखा और उनको अपने-अपने हॉस्टल जाने को बोला तो लड़की ने पुलिस को बड़ी अजीब नजरों से देखा. जाहिर है खुलापन जेएनयू के कल्चर में है कोई किसी की जिंदगी मे दखल दे ये जेएनयू वालों को बर्दाश्त नहीं है. लेकिन आज तो पुलिस फुल एक्शन में थी, लड़कीं को महिला पुलिसकर्मी ने पता नहीं क्या कहा! मैं सुन नहीं पाया लेकिन उसके बाद दोनों शरीफ बच्चों की तरह चुपचाप वहां से चले गए. अब पुलिस उपद्रवियों की तलाश में सुनसान घने पेड़ और झाड़ियों के बीच जा रही थी. जहां एक दम घुप अंधेरा था रौशनी बिल्कुल भी नहीं थी. आगे कुछ भी नहीं दिख रहा था तो वीडियोग्राफी वाले को आगे बुलाया और कैमरे की माउंट लाइट जलाने को बोला गया. 

मैंने अपने मोबाइल की लाइट जला ली थी. अंदर कोई नहीं मिला और हम लोग वापस आ गए. अब हम एडमिन ब्लॉक के पास वाली सीआईएस बिल्डिंग के पास पहुंचे जहां से सारा विवाद शुरू हुआ था. वहां पर भी ढूंढने पर कोई छात्र नहीं दिखा. फिर किसी ने बताया कि एक हॉस्टल में कुछ गतिविधि दिख रही है. हम लोग फौरन वहां पहुंचे सामने दो तीन लड़कियां खड़ी थीं डीसीपी ने आदेश दिया कि कुछ महिला पुलिसकर्मी अंदर जाएंगी और जो भी अंदर छुप कर बैठे हैं उन्हें बाहर निकालो. जैसे ही 5 से 6 महिला पुलिसकर्मी होस्टल के अंदर दाखिल हुए दो लड़के बाहर की तरफ भागने लगे. कुछ पुलिसवाले डंडे लेकर उनके पीछे भागने लगे एक को तो पुलिस ने पकड़ लिया क्योंकि भागने के सारे रास्तों पर पुलिसवाले थे वो अपने आप को जेएनयू के स्टूडेंट बताने लगा. जबकि दूसरा अपने आप को घिरा देख अचानक से रुक गया. पुलिस से खुद को पीटने को कहने लगा. उसकी हिम्मत देख एक पुलिस वाला उसको लाठी मारने ही वाला था कि डीसीपी ने रोक दिया और छात्र को फौरन निकल जाने को बोला. उसके जाते ही डीसीपी देवेंद्र आर्या ने सभी पुलिसवालों को सख्त हिदायद दी कि "सभी एक बात का ध्यान रखें कि सिर्फ उपद्रवियों पर ही लाठी चलानी है वो भी कमर के नीचे कोई किसी भी छात्र पर बल प्रयोग नहीं करेगा".

अब हम लोग कैंपस के अंदर सड़कों पर पैदल मार्च कर रहे थे ग्रुप में अगर कुछ लड़के दिख जाते तो पुलिसवाले सभी को दौड़ा देते थोड़ी देर बाद जेएनयू की उन सड़को पर कोई नहीं दिख रहा था जो सड़कें चौबीस घंटे छात्रों से गुलज़ार रहती थीं. अब हम वापस लौट रहे थे बीच में एक दो उन लड़कों को लाठी जरूर पड़ी जो बाहरी थे जिनके कोई लेना देना जेएनयू से नहीं था. वापस लौटते वक्त पुलिस ने अपनी सारी सरकारी लाठी एक सफेद रंग की स्विफ्ट डिजायर कार में डाल दी और पेड़ों से तोड़ी गई डंडी वहीं झाड़ियों में फेंक दी. 8 बजकर 20 मिनट में हम सब वापस जेएनयू के मैन गेट पर आ गए थे. गेट बंद था पहले मीडिया की तरफ से सिर्फ मैं था अब तमाम इलैक्ट्रोनिक मीडिया के कैमरे वापस आते समय मेरी तरफ थे. अभी भी सिर्फ मैं जेएनयू के गेट के अंदर था जबकि बाकी चैनल के रिपोर्टर गेट के बाहर. मुझे तेजी से गेट की तरफ बढ़ता देख कुछ पुलिसवाले मुझे सम्मान देने के लिए सावधान की मुद्रा में आ गए लेकिन चैनल से लगातार फोन आ रहा था लाइव के लिए लिहाजा मैंने बोला गेट खोलो तो बिना कोई सवाल किए गेट खोल दिया. सब मुझे ही देख रहे थे अब मैं भी अपने चैनल माइक थामे रिपोर्ट्स की उस भीड़ का हिस्सा बन गया था. 

(लेखक ज़ी न्यूज़ के दिल्‍ली ब्‍यूरो में क्राइम रिपोर्टर हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)