close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

मां के हाथों के स्वेटर में जो बात थी वो फैशनेबल कोट में कहां...

जिनके पास मां 24 घंटे रहती है अमूनन उन बच्चों को उसके साथ होने की कद्र नहीं होती है, लेकिन घर से दूर रहने वाले लोग मां को कितना मिस करते हैं. ये वही जानते हैं और उनके सिवाय कोई भी इस दर्द को महसूस नहीं सकता है.

मां के हाथों के स्वेटर में जो बात थी वो फैशनेबल कोट में कहां...

घर से दूर होते हुए भी सुबह आंख खुलने के बाद ऑफिस की भागदौड़ के बीच अगर आज भी उस आवाज को जब तक सुन ना लूं, तब कानों और दिमाग को चैन नहीं पड़ता है. घर के काम, समाज की समस्या, परिवार की कलह के बाद भी उसके पास मेरी बातें सुनने और प्रॉब्लम को ठीक करने का समय ना जानें कहां से आ जाता है. वो कोई और नहीं मेरी मां है.

जिनके पास मां 24 घंटे रहती है अमूनन उन बच्चों को उसके साथ होने की कद्र नहीं होती है, लेकिन घर से दूर रहने वाले लोग मां को कितना मिस करते हैं. ये वही जानते हैं और उनके सिवाय कोई भी इस दर्द को महसूस नहीं सकता है. घर की सजावट, खानपान से लेकर रात की चाय के वक्त भी उनकी कमी खलती है. वैसे तो हर पल ही मां की कमी महसूस होती है, लेकिन सर्दियां आते ही ना जाने क्यों वो पास लगने लगती है. क्योंकि गर्मी, बरसात में मां की सिर्फ याद साथ होती है, लेकिन सर्दियों में उनके हाथों से बुने स्वेटर जब सीने से लगते हैं, तो उनकी गर्माहट के आगे बड़े से बड़े ब्रांड के स्वेटर भी फेल हो जाते हैं.

यह भी पढ़ें : स्त्री सशक्तिकरण का सबसे पुराना रूप है दुर्गा पूजा में कोठे की मिट्टी का प्रयोग

 

सर्दियों की धूप और मां
बचपन की यादों में अक्सर सबके साथ ही ऐसा होता होगा जब घर के सारे कामकाज निपटाने के बाद मां धूप में बैठकर उन दो लोहों के कांटों से ऊन के स्वेटर, मफ्लर और टोपियां बुना करती थीं. घर के पड़ोस में रहने वाली शर्मा आंटी मां कोई डिजाइन बताती थी, तो अग्रवाल आंटी मां से फंदे डलवाकर स्वेटर बुनना सिखती थी. आजकल के बड़े शहरों में लोगों के पास वक्त की कमी है, दीवार से दीवार लगे घरों में एक आदमी को दूसरे की सुध नहीं है, लेकिन छोटे शहरों में लोग पूरे मोहल्ले की खबर रखते थे. सर्दियों के मौसम में दोपहर की गुनगुनी धूप में बच्चे गलियों में खेला करते थे और मांएं खाट पर बैठकर ऊन को लपेटा करती थीं. 

हाथों की गर्माहट
बचपन में तो मां के हाथों से बने हुए स्वेटर, मफ्लर, स्काफ ही फैशन का साइन हुआ करते थे. बच्चों में अक्सर कॉम्पीटिशन चलता था कि किसकी मां ने किसके लिए किस डिजाइन का स्वेटर बुना है. पड़ोस में रहने वाले बच्चों से अक्सर मेरी बहस होती थी कि मेरी मां को ज्यादा अच्छा स्वेटर बनाना आता है. मां का स्वेटर जितना प्यार देता था, कभी भी उसको देखकर गुस्सा भी आता था. जब वो हम सबसे छुपकर देर रात पापा को स्वेटर पहनने के लिए बोलती थीं. पापा का तो समझ आता था, लेकिन दिन में मेरे लिए बुन रही हैं और शाम को जब उस स्वेटर की नपाई भाई के सीने के साथ होती थी, तो अक्सर मेरी नाराजगी बोल जाती थी. स्वेटर की कहानियों में कई ऐसे दौर आए जब मेरे लिए नहीं बनाया, ये मेरा फेवरेट कलर है भइया का नहीं बोलकर मैंने गुस्से में खाना नहीं खाया. मैं गुस्सा होती थी पर मां कहां मानने वाली होती है, एक सप्ताह बाद उसी कलर का कार्डिगन मेरे लिए बुना जाता था ताकि मेरे चेहरे पर मुस्कान कम न हो.

सर्दियां आने का रहता था इंतजार
पुराने दौर या यूं कहे कि कल ही तो बात थी जब सर्दियों के मौसम में एक पल्ला बुनने के बाद मां दूसरा बनाने के लिए गली में ऊन वाले के आने का इंतजार किया करती थी. घर के खर्च में से बचाए गए पैसों से ऊन ने उन गर्म कार्डिगन्स पर प्यार लुटाती थी. मां के  बनाए गए स्वेटर के साथ जितना प्यार हुआ करता था, उतना ही अत्याचार भी होता था. लड़ाई के दौरान खींचना, एक दूसरे को उसी स्वेटर से मारना, वो दौर ही अलग हुआ करता था. चाहे कुछ हो जाए वो स्वेटर और उसकी गर्माहट सालों साल चलती ही रहती थी. खास बात तो ये थी कि मां स्वेटर मेरे लिए बुनती थी, लेकिन उसे पहनता पूरा खानदान था. क्योंकि इस साल जो स्वेटर बना है वो आने वाले 2 सालों में छोटा हो जाएगा, तो चाचा जी के बच्चों के काम आएगा. चाचाजी के बच्चे बड़े होंगे तो बुआ के बच्चों को नंबर आएगा. 

फैशन को देखकर बदल गया मूड
वक्त के साथ सबकुछ बदल गया और न जाने कब उन पारंपरिक स्वेटर, स्कार्फ औऱ मोजों ने मां के हाथों की गर्माहट वाले कपड़ों की जगह ले ली. स्टाइल, फैशन, ऑफिस कल्चर के सामने हम नत्मस्तक होते गए और ट्रेंडिंग कार्डिंगन, स्टाइलिश मौजे और कोर्ट पहनने लगे. बड़े होने के बाद आज उस गर्माहट को दोबारा से महसूस करने का मन करता है. मां के उन एहसास को छूने का मन करता है, जो शून्य डिग्री पर भी गर्माहट का दामन नहीं छोड़ता था. दुनिया चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए मां की कमी को कोई भी शख्स पूरा नहीं कर सकता. सर्द रातों में उन गर्माहट भरे हाथों से सिर पर प्यार का एहसास आपको कोई नहीं दे सकता, क्योंकि मां सिर्फ मां, वो धरती पर भगवान है.

(लेखक जी हिंदी डिजिटल में कार्यरत हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)