प्रेमचंद: वे केवल लेखक नहीं एक सांस्कृतिक मशाल थे...

हमें इस बात पर गर्व करना चाहिए कि प्रेमचंद केवल हिंदी और हिंदुस्तान के ही महान लेखक नहीं हैं. उर्दू भाषी पाकिस्तान के भी हैं. आखिर वे कौन-से कारण हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में एक-दूसरे से त्रस्त देशों में प्रेमचंद उसी तरह स्वीकृत और मान्य हैं जिस तरह मीर-ग़ालिब और फैज या फिर मंटो.

प्रेमचंद: वे केवल लेखक नहीं एक सांस्कृतिक मशाल थे...

जिस तरह वाल्मिकी क्रौंच पक्षी की पीड़ा के कवि हुए उसी तरह हमारे अपने जमाने के कथाकार प्रेमचंद स्त्री, दलित और किसान की पीड़ा के रचनाकार. सेवासदन, निर्मला, ग़बन और गोदान जैसे उपन्यासों और बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, सद्गति, ठाकुर का कुआं, पूस की रात और कफ़न जैसी अनेक कहानियों में उन्होंने इन तीनों के ही दर्द को किसी ऐतिहासिक शिलालेख की तरह दर्ज़ कर दिया है.

आज तो लाखों किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, दैनिक अखबारों और मीडिया में स्त्रियों, मासूम और किशोर बच्चियों के साथ बलात्कार यहां तक कि सत्ता-राजनीति के आसपास और अन्त: प्रकोष्ठों में जवान और खूबसूरत स्त्रियों की हत्याएं बताती हैं कि पहले की तुलना में समाज और कितना बहशी हो चुका है.

आजादी की लड़ाई में हिंदू-मुसलमान साथ-साथ आए थे. कमल और रोटी के दो संयुक्त प्रतीकों को लेकर. अनके हिंदू-मुसलमान जिंदा रूप में जहां तहां पेड़ों की शाखाओं पर टांग दिए गए थे. बाद में इन्हीं का संयुक्त विराट दल लेकर अहिंसक राजनीति के प्रवर्तक गांधी आए और समाज की स्त्रियों को भी पुकार कर साथ ले लिया.

कहने की जरूरत नहीं कि गांधी की आधार सेना यही किसान और स्त्रियां थीं. प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी और कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान, सरोजनी नायडू कुछेक जाने-माने नाम हैं. जिंदगी की औसत उपलब्ध सुविधाओं को त्यागकर गांधी की जीवन-संगिनी कस्तूरबा की तरह ये सब और इन्हीं जैसी असंख्य आजादी के संघर्ष में कूद पड़ी थीं. पर आज मुख्यत: किसान और स्त्री सबसे अधिक अधिकार वंचित और उत्पीड़ित तबके हैं.

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प्रेमचंद को जानने वाले जानते हैं कि उनकी जो शुरुआती कहानी 'सोजे वतन' है, वह देश के प्रति लेखक के गहरे प्रेम में डूबकर कुर्बानियों की राह तक गई है. तब तक बिस्मिल, भगतसिंह, अशफ़ाकउल्ला खान और आजाद की शहादतें रंग नहीं लाई थीं. बिस्मिल ने तब तक सरफरोश तमन्नाओं की बात नहीं की थी. ये देश की तमाम उपस्थित जवानियों के बीच से उठकर देश की बलबलाहट से भरी जवानियों को शर्मिंदगी से बचा रही थीं. लेखक प्रेमचंद भी तब जवान थे. उनका यह लेखन तभी तो फूटा था. एक बेइंतहा दर्द लेकर. बस यह इस मायने में अन्य लेखकों से अलग था कि यह उनके जीवन-आचार की अभिव्यक्ति था.

वह स्कूली शिक्षा व्यवस्था की स्थाई नौकरी छोड़ के गांधी जी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े थे. वे कोरे कहानी लेखक नहीं थे. उन मूल्यों को जीते थे जो भविष्य में बनने वाले थे और जरूरी थे. आज के लेखकों और तब के लेखकों में एक बड़ा फर्क तो यह है कि उनके विचारों और जीवनाचारों में भिन्नता नहीं थीं. उनका जीवन ही उनका लेखन भी था. इस सूची में माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राजी, नवीन, अज्ञेय तो थे ही, हिंदी कवि भवानी प्रसाद मिश्र, नागार्जुन और रेणु भी थे. तभी तो इनके शब्दों में अर्थों की वह प्राण-प्रतिष्ठा संभव हो सकी, जो पाठकों की चेतना में पढ़ते ही जन्मने लगती है. इनमें अपने अत्याचार ग्रस्त देश और समाज की घनी वेदना और करुणा थी.

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प्रमाणित करने की जरूरत नहीं कि प्रेमचंद्र में यह पीड़ा और इसके पीछे काम करने वाली करुणा कैसी थी. वे कोई भावुक कथा लेखक नहीं थे. इसलिए उनके यहां पवित्र और सरल भावोच्छवास नहीं है. इसके विपरीत उन्हें पढ़ चुकने पर हमारी सहृदयता इन स्थितियों पर सोचने को मजबूर कर देती है कि ऐसा क्यों है. इसे बदलने के लिए हमें क्या-क्या करना चाहिए. प्रेमचंद अगर महान हैं तो इसलिए नहीं कि वे एक मंजे हुए कलासिद्ध कलाकार हैं. नहीं. वे एक सजग और जिम्मेदार लेखक हैं जिनका समर्पण उस समाज के प्रति है जिसने उन्हें संवदेना और भाषा दी है.

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उनको लेकर हम इस बहस में नहीं पड़ते कि वे आदर्शवादी हैं या यथार्थवादी, गांधीवादी हैं या मार्क्सवादी. मुझे लगता है इन बहसों को स्कूली प्राध्यापकों के लिए छोड़ देना चाहिए. हमारी मुख्य चिंता तो यह है कि अपने लेखन के मार्फत वे चाहते क्या थे?

एक खत के जवाब में उन्होंने लिखा, 'स्वराज और रोटी-दाल के साथ तोला भर घी. यही चाहिए मुझे. यह भी कि हमें इन राजनीतिज्ञों से तो कोई उम्मीद न रखनी चाहिए, बिलकुल बे-मसरफ लोग हैं... लेखकों को ही आगे आना पड़ेगा. और इसके लिए चाहिए सम्पूर्ण आत्मसमर्पण अपने लोक के प्रति.'

पर यह भी तो लिखा कि हमारे हृदयों पर महात्मा गांधी का एक छत्र सामाज्य है. हम उन पर गर्व करते हैं. अपने पत्र में एक युवा लेखक को समझाते हुए कहा कि लेखन के लिए तीन लक्ष्य जरूरी हैं- परिष्कृति, मनोरंजन और उद्घाटन. आग्रह यह भी कि लेखन का चरित्र मैसकुलिन होना चाहिए. उनकी निगाह में लेखक विचारों का आविष्कारक और उत्तेजक, और प्रचारक भी है. यह काम उसे ऐसी मिली-जुली भाषा में करना चाहिए जिसका लाभ दोनों यानी हिंदू-मुसलमान साथ-साथ उठा सकें.

हमें इस बात पर गर्व करना चाहिए कि प्रेमचंद केवल हिंदी और हिंदुस्तान के ही महान लेखक नहीं हैं. उर्दू भाषी पाकिस्तान के भी हैं. आखिर वे कौन-से कारण हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में एक-दूसरे से त्रस्त देशों में प्रेमचंद उसी तरह स्वीकृत और मान्य हैं जिस तरह मीर-ग़ालिब और फैज या फिर मंटो. इसका जवाब है उनके लेखन में हिंदू-मुसलमान जुम्मनशेख और अलगू चौधरी दोनों साथ-साथ हैं. दोनों के सपने, जीवन-मूल्य साझा हैं. बंटवारा अगर है तो गरीब-अमीर में, जमींदार और किसान में, पश्चिमदां आधुनिकों और देशी जीवन-आचारों और मूल्यों में. मंत्र कहानी में यह साफ साफ देखा और महसूस किया जा सकता है. परीक्षा कहानी में भी.

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प्रेमचंद जिस मैसकुलिन लेखन की बात करते हैं उसका मतलब है अंधेरे में और अन्याय को देखकर रोना नहीं, प्रतिशोध की ताकतों को एकत्र कर विरोध करना है. अपनी-अपनी आजादियों के लिए कीमतें तो चुकानी पड़ती हैं.

एक और पत्र में लिखते हैं, 'हमारा उद्देश्य जनमत को शिक्षित करना है. मेरा आदर्श समाज वह है जिसमें सबको समान अवसर मिले. विकास को छोड़कर और किस जरिए से हम इस मंजिल पर पहुंच सकते हैं. लोगों का चरित्र ही निर्णायक तत्व है. कोई समाज-व्यवस्था नहीं पनप सकती जब तक कि हम व्यक्तिश: उन्नत न हों. अन्यथा हम एक ऐसी तानाशाही पर पहुंचेंगे जिसमें रंच मात्र स्वाधीनता न हो.'

पंच-परमेश्वर, मंत्र, ईदगाह आदि कहानियों में उन्होंने जो कहना चाहा है, वह हमारे अपने कमाए लोकतंत्र से गायब हो रहा है. हल्कू और घीसू-माधव अपनी फसलों और मेहनताने को लेकर बुरी तरह आज भी त्रस्त हैं. इससे भी बुरी और दुखद बात यह कि न तो वे ठीक से संगठित हो पा रहे हैं, न उनके जन-प्रतिनिधि उनके प्रति कोई जिम्मेदारी निभा रहे हैं. पूंजी और सत्ता, दलाल और नौकरशाही चोली-दामन बने बैठे हें. तब प्रेमचंद के सपनों की हिफाज़त करने वाला कौन होगा?  

यह एक ऐतिहासिक और बड़ा सवाल है जो हिन्दुस्तान के लेखकों और बुद्धिजीवियों को अपने आपसे पूछना चाहिए. अन्यथा वे किस काम के लेखक और बुद्धिजीवी. निराश हम फिर भी नहीं हैं. किसान और स्त्री, दलित और आदिवासी को लेकर हमारे लेखक चिंतित और प्रश्नाकुल हैं. प्रेमचंद अगर अपनी चेतना में कहीं बचे रहेंगे तो इन्हीं लेखकों में.

वे केवल लेखक नहीं, सचमुच एक सांस्कृतिक मशाल थे.

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(डॉ. विजय बहादुर सिंह, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक हैं)
(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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