नामवर सिंह स्मृति: 'आलोचना वाद भी है, विवाद और संवाद भी'

यों तो हिंदी के प्राय: सभी बड़े लेखक और आलोचक गांवों से ही चलकर आए हैं पर रामविलास शर्मा और नामवर जी के बोल-व्यवहार और लहजे में गांव शायद ही कभी अनुपस्थित रहा हो.

नामवर सिंह स्मृति: 'आलोचना वाद भी है, विवाद और संवाद भी'

नामवर जी चले गए. उनके जाने से हिंदी आलोचना का असाधारण रूप से सबसे ज्यादा चर्चित और विवादास्पद साथ ही सबसे ज्यादा आकांक्षित और कान खड़े कर गौर से सुना जाने वाला बौद्धिक अब हमारे बीच नहीं रहा. यह शून्य एक चुनौती तो है.

बनारस के एक गांव जियनपुर के एक ठाकुर परिवार की साधारण गृहस्थी में पैदा होकर उन्होंने जैसी साधना की वह साधारण से असाधारण होने की ही साधना थी. बनारस उनका विद्या क्षेत्र भी था, गुरुपीठ भी. यह कम विलक्षण नहीं है कि उन्हें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्याचार्य और पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जैसे आचार्य अध्यापक मिले. बनारस में ही तो उन्हें कविवर त्रिलोचन शास्त्री भी मिले जिनकी संगति ने उन्हें शब्द के साथ-साथ गंगा की धारा की लहरों से क्रीड़ा करना भी सिखाया. घर, परिवार, आचार्य कुल और कवि-संगत ने नामवर जी को जितना बनाया उसे उन्होंने अपनी विद्या-साधना और विद्यान्तप से दोगुना कर समूची परंपरा को लौटाने और उसे पहले से अधिक समृद्ध करने का दायित्व निभाया.

यों तो हिंदी के प्राय: सभी बड़े लेखक और आलोचक गांवों से ही चलकर आए हैं पर रामविलास शर्मा और नामवर जी के बोल-व्यवहार और लहजे में गांव शायद ही कभी अनुपस्थित रहा हो. यह अलग बात है कि शास्त्र को भी इन्होंने उसी गहराई और सूक्ष्मता से ग्रहण करते हुए जो परिप्रेक्ष्य रखा वह हिंदी का एक बहुत ही सारगर्भित और दिलचस्प अध्याय है. उत्तेजनाकारी तो है ही. कविमित्र अष्टभुजा शुक्ल ने अभी-अभी बस्ती (उ. प्र.) से फोन करके कहा कि नामवर जी का जाना एक 'महाप्रस्थान' है. उन्होंने सबसे लंबा और सार्थक जीवन जिया उनकी यह दूसरी बात तो एकदम सच है.

महाप्रस्थान कहां तक है, यह कविमित्र ही जानें. सार्थक जीवन क्या है? शायद अपने आगे-पीछे ढेर सारे अर्थ छोड़कर जाना. नामवर जी ने निर्विवाद रूप से यह किया है. बहसों और विमर्शों के इतने सारे चौपाल रचकर वे गए हैं कि हिंदी पाठक और आलोचक भी अपनी योग्यता-प्रदर्शित करने के लिए उन चौपालों पर आवाजाही कर सकते हैं.

कितना विलक्षण है कि हिंदी का एक युवा आलोचक अपभ्रंश के अध्ययन से अपनी विद्या यात्रा की शुरुआत करता है किन्तु जल्दी ही छायावाद और समकालीन या एक अन्य अर्थ में प्रगतिवादी, प्रयोगवादी-नई कविता की प्रवृत्तियों के अध्ययन में लग जाता है. गांव से शहर आकर एक विद्या-व्यसनी युवा हिंदी अध्यापक का इतना आधुनिक और समकालीन होना हमें विस्मित भी करता है. खासतौर से उन कस्बाई और शहरी-जनों के लिए जो मानते हैं कि ये सब ठेकेदारियां तो उनकी अपनी हैं. पर वे न जानें यह क्यों भूल जाते हैं कि बलिया (यूपी) का एक और अध्यापक जो केवल अध्यापक नहीं था, 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में लिख चुका था, सत्य के लिए किसी से नहीं डरना- गुरु से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं, नामवर जी ने गुरु के इस मार्गदर्शक वाक्य को अपने पाथेय के रूप में साथ रख लिया था, इसलिए वे मानते थे कि आलोचक का काम प्रतिमानों का निर्धारीकरण है. समय-समय पर उन्होंने प्रतिमानों का निर्धारण भी किया. जैसे कि समकालीन कविता के संदर्भ में उन्होंने 'सपाटबयानी' की बात की. साथ ही 'सेंस ऑफ अर्जेंसी' यानी तत्कालिकता की मांग को समझना और उसका धर्म-निभाना. बाद में तो उनकी चर्चित किताब ही आ गई, 'कविता के नए प्रतिमान.'

सबसे ज्यादा विवाद उन्होंने अपनी पुस्तक 'दूसरी परंपरा की खोज' लिखकर खड़ा किया जिसने समान विचारधारा वाले महान आलोचक रामविलास शर्मा को सबसे ज्यादा आंदोलित और उद्वेलित किया. शर्मा जी ने अपनी पुरानी किताब की नई भूमिका लिखते हुए उनके तर्कों का खंडन किया. निश्चय ही इस विवाद में हिंदी के दो महान आलोचकों- आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के द्वारा भक्तिकालीन साहित्य के संदर्भ में उठाए गए कुछेक महत्वपूर्ण प्रश्न थे.

सत्तर के दशक में नामवर जी कविता का परिसर कुछेक दिनों के लिए छोड़ कहानी के नये आंदोलन के साथ आ खड़े हुए और अपनी प्रतिभा के आलोक से नए कहानीकारों के वैशिष्ट्य को रेखांकित किया. निश्चय ही इसमें कुछ न कुछ पॉलिटिक्स भी काम करती रही जिसके चलते नामवर जी की राय को कुछेक समान धर्माओं और कथा-प्रतिभाओं द्वारा संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा. तब भी 'कहानी: नयी कहानी' जैसी आलोचना कहानी-कला के इतिहास में अपनी जगह तो बना ही चुकी है.

माना जाता है कि एक बड़े आलोचक का एक काम तो अपने समय की विरल प्रतिभाओं की पहचान है. यदि वह इसमें चूकता है तो उसका व्यक्तित्व संदेहास्पद बन जाता है. पर नामवर जी कहां चूकने वाले थे. धूमिल जैसी काव्य प्रतिभाओं की चर्चा तो हिंदी संसार ने उन्हीं से सुनी. मुक्तिबोध को भी उन्होंने अपने लेखन में अपेक्षित महत्व दिया. निर्मल वर्मा जैसों को भी. यह और बात है कि संस्कृति, राजनीति, साहित्यिक राजनीति जैसे मुद्दों पर बाद में वे निर्मल वर्मा से असहमत रहे.

इसमें फिर भी कोई शक नहीं कि वे पहले ऐसे हिंदी आलोचक थे जिसने अपना कद ज़माने के बड़े लेखकों के बराबर बनाया और कभी-कभी तो उनसे बड़ा भी साबित किया. मैं इस बात को प्राय: महसूस करता रहा कि नामवर जी में आखिर वह कौन-सी बात है कि उनके सामने बड़े लेखकों की युति कम-सी क्यों पड़ जाती है.

अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि वे परम सहृदय थे. प्रत्येक नई बात और नए विचार को वे मुग्ध होकर मंजूर करते थे और मौका आने पर उसकी प्रशंसा भी करते थे. उनका सोचना और लिखना असाधारण है या बोलना या फिर दोनों- कहना फिलहाल तो कठिन है.

प्रगतिशील लेखक संघ ने उनके निर्माण में क्या भूमिका निभाई, साथ ही उन्हें चतुर्दिक से सुप्रतिष्ठित बनाए रखने में भी, यह सब तो करने वाले करेंगे ही, चाहे बाद में. फिर भी उनकी मेधाविता, गद्य शिल्प और विद्वत्ता को कैसे भी भुलाया नहीं जा सकेगा. बहुत कम लिखकर किन्तु सबसे ज्यादा बोलकर उन्होंने आलोचना का जो परिसर बनाया है, वह उनके परवर्तियों के लिए किसी मैदानी चुनौती से कम नहीं है. पश्चिम तो नहीं किंतु पूर्व या भारत की आलोचना में वे अपना जो स्थान अर्जित करके गए हैं, वह आने वाली पीढ़ियों तक मार्गदर्शन करता रहेगा. उन्होंने हमें सिखाया है कि आलोचक होने के लिए कितनी सारी कठिन साधना और तैयारियों की जरूरत पड़ती है.

(डॉ. विजय बहादुर सिंह, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक हैं)

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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