#NirbhayaNyayDiwas: निर्भया के आखिरी शब्द...उन दरिंदों को मत छोड़ना, मां ने गांठ बांध ली

हमें अंदाजा हो रहा था कि यह खबर देश को बदल देगी और आपने सड़कों पर देखा होगा कि इस खबर ने किस तरह देश को बदलकर रख दिया. 

#NirbhayaNyayDiwas: निर्भया के आखिरी शब्द...उन दरिंदों को मत छोड़ना, मां ने गांठ बांध ली

16 और 17 दिसंबर 2012 के बीच की रात थी मीडिया में एक गैंग रेप की खबर आई, बाकी दूसरी खबरों की तरह नाइट रिपोर्टर्स दौड़े सुबह 7:00 बजे सुबह के सभी रिपोर्टर दौड़े...हेल्थ रिपोर्टर होने के नाते मैं भी सफदरजंग अस्पताल पहुंची जहां निर्भया को लाया गया था. मन में आया एक और दर्दनाक हादसा हो गया है. लेकिन जैसे-जैसे खबर बाहर आने लगी जैसे-जैसे हमने डॉक्टरों से बात की अपने सूत्रों से बात की तो हमें समझ में आया कि यह एक और दर्दनाक हादसा नहीं है.

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सफदरजंग अस्पताल के गायनी वार्ड में निर्भया को सबसे पहले देखने वाली डॉक्टर रश्मि आहूजा थीं. उन्होंने बताया कि निर्भया के शरीर का ऐसा कोई हिस्सा नहीं था, जहां घाव के गहरे निशान नहीं थे. जगह-जगह से खून बह रहा था. नीचे का हिस्सा एक हो गया था. निर्भया दर्द में थी ठंड से कांप रही थी. ब्लड प्रेशर लो था लेकिन इसके बावजूद निर्भया ने डॉक्टर को एक-एक बात बताई. उसने बताया कि साकेत के सिलेक्ट सिटी वॉक मॉल से लेकर महिपालपुर से फेंके जाने तक उसके साथ क्या-क्या हुआ. उसे जितने लोगों के नाम याद थे, उसने वो नाम बताए. उसके साथ किस तरह की जबरदस्ती हुई, वह बताया. कहां-कहां उसे दर्द हो रहा है, वह बताया. अपना नाम बताया. अपनी पहचान बताई.

इतना ही नहीं, डॉक्टर ने इस बात के लिए निर्भया की तारीफ की कि इतनी बुरी हालत में भी निर्भया ने सैंपल देने के लिए अपनी अनुमति दी. ज्यादातर रेप के मामलों में लड़कियां सहयोग नहीं कर पातीं. सैंपल देने के लिए अनुमति नहीं देतीं और यहीं से केस के कमजोर होने की शुरुआत हो जाती है. 

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हमें अंदाजा हो रहा था कि यह खबर देश को बदल देगी. आपने सड़कों पर देखा होगा कि इस खबर ने किस तरह देश को बदलकर रख दिया. दिल्ली से लेकर देश की हर गली तक लोग सड़कों पर उतरे, मोमबत्तियां लेकर उतरे, मशालें लेकर उतरे, वॉटर कैनंस खाई, डंडे खाए लेकिन निर्भया के लिए इंसाफ मांगते रहे. अस्पताल में दो हफ्ते से ज्यादा तक लड़ाई लड़ने के बाद निर्भया को तो बचाया नहीं जा सका लेकिन निर्भया ने की मां मां से जो आखिरी शब्द कहे थे, वह थे- मां उन दरिंदों को मत छोड़ना. उसे निर्भया की मां ने गांठ बांध लिया. 7 साल तक देश की हर अदालत में लड़ाई लड़ी गई. निर्भया के दोषियों के वकीलों ने हर पैंतरा आजमाया. अंतरराष्ट्रीय अदालत तक चले गए लेकिन 20 मार्च 2020 का सूरज आखिरकार इंसाफ लेकर आया.  

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अदालती प्रक्रिया पर सवाल भी उठते रहेंगे कि फास्ट ट्रैक कोर्ट बनने के बाद भी 7 साल लग क्यों? एक ऐसे मामले में जिसके सबूत पुख्ता थे, जिसमें निर्भया का दोस्त चश्मदीद था. ऐसे मामले में जहां दोषियों ने अपना गुनाह कुबूल कर लिया था. एक ऐसे मामले में जो‌ कल्पना से परे बर्बर था. लेकिन आज एक बार फिर से देश की हर लड़की में उम्मीद जगी है कि अगर मैं डटी रही, अगर मैं खड़ी रही, अगर मैं लड़ती रही तो देर से ही सही लेकिन मुझे इंसाफ मिलेगा. आज का सूरज निर्भया के नाम है.  

न जाने तुमने दूसरा जन्म ले लिया या अब तक इंसाफ के लिए रुकी थी? 
टीस तो उठी होगी मन में कि इतनी देर लग गई? 
सिसकी होगी जब कोर्ट में एक के बाद एक दांव चले जा रहे थे?
मां की चीखें सुनकर, पिता के आंसू देखकर कलेजा रोज फटता रहा होगा?
वकील की दलीलों से हौसला भी टूटा होगा लेकिन 7 साल की देरी से ही सही, इंसाफ मिला है.

(लेखिका: पूजा मक्कड़ Zee News की दिल्ली ब्यूरो चीफ हैं) 

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)