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पर्यावरण-पर्यावरण रटते तोते और भविष्य कहती कहानी

पर्यावरण को लेकर पिछले तीन चार दशकों से खूब बातें हो रही हैं, कहीं कहीं कुछ स्तर पर काम भी हो रहा है लेकिन बातें लगातार हो रही है. इन बातों के बीच जिस तरह से हम प्रकृति को नुकसान पहुंचाए जा रहे हैं वो हमें इसी कहानी की याद दिलाता है.

पर्यावरण-पर्यावरण रटते तोते और भविष्य कहती कहानी

एक जंगल में एक तोता रहता था. उसके पिता जब मरने को हुए तो उन्होंने अपने बेटे तोते को जीवन का एक अहम सबक देने की सोची जिससे उसकी जिंदगी बची रहे. उन्होंने अपने बेटे तोते को अपने पास बुलाकर उसे कहा कि हमारी जिंदगी हमारे हाथ में है और हम ही उसे गंवा भी सकते हैं और बचा भी सकते हैं और अगर बचे रहना है तो मेरी कही बातें हमेशा याद रखना. “शिकारी जंगल में आता है, जाल बिछाता है, दाना डालता है, दाना मत चुगना, जाल में मत फंसना. ” ये बात समझ कर बाप तोते के प्राण पखेरू उड गए. बेटे तोते ने बाप तोते की बात को अच्छी तरह से रट लिया और वो अक्सर अपने बाप के कहे शब्दों को दोहराता रहता था. इसी तरह कई दिन बीत गए . एक दिन जंगल में तोते की आवाज आ रही थी वो लगातार बोले जा रहा था “शिकारी जंगल में आता है, जाल बिछाता है, दाना डालता है, दाना मत चुगना, जाल में मत फंसना.” और एक जाल में बैठे शिकारी के कंधे पर लद कर शहर की ओर जा रहा था.

पर्यावरण को लेकर पिछले तीन चार दशकों से खूब बातें हो रही हैं, कहीं कहीं कुछ स्तर पर काम भी हो रहा है लेकिन बातें लगातार हो रही है. इन बातों के बीच जिस तरह से हम प्रकृति को नुकसान पहुंचाए जा रहे हैं वो हमें इसी कहानी की याद दिलाता है.

दरअसल प्राकृतिक आपदाएं समय बता कर नहीं आती हैं हम उसकी तारीख तय नहीं कर सकते हैं लेकिन हम इंसानों ने इतना ज़रूर कर दिया है कि हमने उस समय को निश्चित कर लिया है जब धरती से इंसानी वजूद का खात्मा हो जाएगा. मौसम विभाग की चेतावनियों और मानसून के आंकलन की तरह ये वक्त दिनों मे तो नहीं लेकिन सालों में 20-25 साल इधर उधर हो सकता है लेकिन जिस तेजी के साथ हम पर्यावरण की अनदेखी कर रहे हैं और समझने को तैयार नहीं है उसे देखते हुए हम अपना भविष्य लगभग तय कर चुके हैं. हमारा पर्यावरण को लेकर रवैया ठीक उस दर्शक की तरह है जो मैदान में चल रहे क्रिकेट को देख भर रहा है उसका हिस्सा नहीं है इसलिए वो मैदान के बाहर बैठा आसानी से खेल पर टीका टिप्पणी करता रहता है. हम इंसान पर्यावरण को लेकर जिस तरह का रवैया अपनाए हुए है ऐसा लगता है जैसे हम धरती की नहीं किसी दूसरे ग्रह की बात कर रहे हैं. बस इसी तरह हम अपना भविष्य गुन रहे हैं.

इसी भविष्य की कहानी है माटी, मानुष, चून. 1974 की कहानी कहता ये उपन्यास फरक्का बांध के टूटने के साथ आई प्रलय के साथ शुरू होता है. और फिर गंगा पथ पर विकास दिखाते विनाश को खोल कर रख देती है. लेखक पत्रकार अभय मिश्र के इस उपन्यास को पढ़ते हुए हम एक अंजान डर के साये मे जाते जाते हैं.

इसे एक विस्तृत रिपोर्ताज की शक्ल लिए हुए उपन्यास के रूप में पढ़ा जाना चाहिए. लेखक ने जिस तरह से गंगा पथ के किनारे का बारीकी से शोध करके वर्तमान में जो हम कर रहे है उसके भविष्य के परिणामों की कल्पना की है वो किसी भी पर्यावरण की चिंता करने वालें के लिए जानकारी का सागर बन सकती है. साथ ही नई पीढ़ी को गंगा के बारे में वो जानकारी दे सकता है जो उन्हें आसानी से नहीं मिलती है.

मसलन आप्लावन नहर जैसे विषम शब्दों को उपन्यास में बेहद ही आसानी से समझाते हुए कहानी का किरदार कहता है ’ फरक्का बनने के बाद से प्रवाह का उलटना जल्दी –जल्दी होने लगा. पहले इस उलटे प्रवाह को उथली नहर बनाकर खेतों और तालाबों तक पहुंचाया जाता था, इसी उथली नहर को आप्लावन नहर कहते थे. इन्हीं आप्लावन नहरों के सहारे छोटी नदियां, पुराने नाले और तालाब लबालब भर जाते और बाढ़ खत्म होने के बाद भी खेतों को पानी देते और गंगा को रिचार्ज भी करते. आप्लावन नहरों की खूबी यह थी कि ये गहरी कम, चौड़ी ज्यादा थी. इस नाते बाढ़ का ऊपरी पानी ही लेकर चलती थी. इस ऊपरी पानी में घुली मिली मिट्टी तो होती थी, लेकिन मोटी रेत नहीं होती थी. इसलिए जहां ये पानी जाता वहां की ज़मीन को बेहतरीन बना देता.’

माटी,मानुष, चून की कहानी 1974 से शुरू होती है जब फरक्का बैराज के टूट कर बह जाने के बाद भयानक त्रासदी आती है और कई लोग अपनी जान गंवा बैठते है उसके बाद भारत की तरफ से होने वाली राजनीति, फरक्का बैराज त्रासदी को प्राकृतिक आपदा बताने की कोशिश, बाढ में बह कर बांग्लादेश पहुचं लोगों को दोनों ही देशों को स्वीकार ना करना और जिस गांव पर सबसे ज्यादा विपत्ति आती है वहां के बाशिंदों को इंसान से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठिये मान कर हाथ झाड़ना, उसके बाद बांग्लादेश का अतर्राष्ट्रीय अदालत में भारत को घसीटना और जांच के लिए आई पर्यावरणविद साक्षी की कहानी जैसे कई पुर्जे खुलते हैं. उपन्यास की शुरूआत में जिस तरह 108 गेटों वाले फरक्का बैराज के ज़मीन के अंदर मौजूद 109 नंबर गेट की जानकारी सामने आती है वो पाठकों के आंखे खोल देती है.

सच्चाई के साथ शोध करके उसे जिस तरह कहानी में पिरोया गया है उसे पढ़कर पाठक ना सिर्फ रोमांच से सिहरता है बल्कि साथ ही वो कई सारी जानकारियों को भी एकत्र करता जाता है.

गंगा के पथ पर बनारस से लेकर मालदा तक जिस तरह ज़मीन के नीचे का आर्सेनिक ऊपर आ रहा है वो बात अब किसी से छिपी नहीं है. जानकार ये भी जानते हैं कि जहर हमेशा से फूलों को रंग देता है यही वजह है कि फ्लॉवर ऑफ वैली के नाम से मशहूर पर्यटक स्थल में पाए जाने वाले ज्यादातर फूल ज़हरीले होते हैं. इसी जहर की बात को किताब में जिस विकास के साथ हो रहे विनाश के साथ दर्शाया गया है वो काफी सराहनीय है. मसलन कहानी में एक जगह सरकारी दफ्तर का एक नुमाइंदा जांच के लिए आई अधिकारी साक्षी को एक गुलाब का गुलदस्ता देता है, नायिका जिसकी सुंदरता की तारीफ किए बिना नहीं रह पाती है. उनकी तारीफ में सरकारी अधिकारी जवाब देता है, ‘बंगाल से लेकर बिहार-उत्तर प्रदेश की सीमा तक गंगा के किनारे इन गुलाबों की खेती होती है, सरकारी सहयोग के चलते गंगा पथ फूलों से लहलहा रहा है.’ खास बात ये है कि इन फूलो से नदारद खुशबू एक और सच को सामने लाकर खड़ा कर देता है कि किस तरह दूषित नदी का पानी ने फूलों से खुशबू छीन ली है.

आगे गंगा पथ के अंतिम पड़ाव यानि सुंदरबन में लगातार बढ़ रहे डेल्टा और लोगों के विस्थापन की विकरालता को बताते हुए कहानी में एक किसान का परिचय किया जाता है ‘ ये कलाम चौधरी हैं, एक समय में गोसाब में पचास बीघे के किसान थे. डेल्टा में पचास बीघे का मतलब कितना होता है यहां बैठे लोग आसानी से समझते ही होंगे, लेकिन आज यह एक फेरी लेकर लोगों को सजनाखली से गोसाबा पहुंचाते हैं चौधरी साहब की सारी ज़मीन आज डेल्टा का हिस्सा है, चौधरी साहब जैसे लोग नदी नियन्त्रण का अनिवार्य परिणाम हैं. ’

उपन्यास हमें बताता है कि दरअसल नदी वास्तव में हमारे पास समुद्र की अमानत है हमने पानी को उस तक पहुंचने से रोका और अमानत में खय़ानत की . गंगा-ब्रह्मपुत्र का पानी रोकने के कारण समुद्र अपने अधिकार को पाने के लिए जमीन की तरफ बढा, जो गंगासागर द्वीप 30 किलोमीटर लंबा और 16 किलोमीटर चौड़ा होता था, वो अब आधा भी नहीं बचा है.

विकास का शिकार होती नदी, मानव महत्वाकांक्षाओं का शिकार होती प्रकृति, बांध निर्माण से खत्म हो रही बायोडायर्वसिटी और अपने विनाश का अध्याय लिखने में अग्रसर स्वार्थी मानवजाति पर सवाल उठाती किताब दरअसल पर्यावरण को बचाए रखने के लिए और उसे समझने के लिए एक बेहद जरूरी और संदर्भ ग्रंथ के रूप में लिखा गया है. जिसमे बताया गया है कि नदी किसी एक की नहीं है बल्कि नदी हम सबकी है और जब तक हम ये मान कर उसे नियन्त्रित करना नहीं छोड़ेंगे तब तक हम विकास के नहीं विनाश के पथ पर ही चलते रहेंगे. कहानी मैं एक जगह नायिका सरकारी अधिकारी से पूछती है कि

‘आपको क्या लगता है बांग्लादेश पहले बना या गंगा पहले आयी’ इस अजीब से सवाल पर अधिकारी अचकचा गया. साक्षी ने दोबारा कहा- आपने जवाब नहीं दिया, पहले बांग्लादेश बना या पहले गंगा धरती पर आयी.

जी गंगा, मतलब गंगा पहले आयी. ‘तो आगे से याद रखियेगा, गंगा का पानी बांग्लादेश चला नहीं जाता है, गंगा बांग्लादेश बहती है, जैसे वो भारत में बहती है .’

जाने माने पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने कहा था कि प्रकृति का अपना कैलेंडर होता है औऱ कुछ सौ बरस में उसका पन्ना पलटता है . नदी को लेकर क्रांति एक भोली-भाली सोच है, इससे ज्यादा कुछ नहीं. वो कहते थे हम अपनी जीवनचर्या से धीरे-धीरे ही नदी को खत्म करते हैं और जीवनचर्या से धीरे-धीरे ही उसे बचा सकते हैं . उनके प्रकृति के कैलेंडर की बात ही इस उपन्यास की कथा का आधार है. जिसे पढा जाना और चर्चा होना बेहद ज़रूरी है. बाकि पर्यावरण पर्यावरण तो हम चिल्ला ही रहे हैं.

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और WaterAid India 'WASH Matters 2018' के फैलो हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)