पुलिस की एक गलती से कैसे 'शाहीनबाग' बन गया राजनीति का अखाड़ा !

मेरा सवाल सिर्फ ये है कि जिन मासूम बच्चों को संविधान बचाने के लिए तैयार किया है क्या उनके पिता संविधान के बारे में जानते है?

पुलिस की एक गलती से कैसे 'शाहीनबाग' बन गया राजनीति का अखाड़ा !

दिल्ली के साउथ ईस्ट डिस्ट्रिक्ट का एक छोटा सा शाहीनबाग इलाका कैसे पुलिस की एक छोटी सी लापरवाही की वजह से बड़ी परेशानी का सबब बन गया है. CAA और NRC के विरोध में दिल्ली से लेकर देश भर में हो रहे विरोध की चिंगारी शाहीनबाग में कैसे आग बनकर उभरेगी इसका उदाहरण आप नोएडा से दिल्ली जाने वाली 13 नंबर सड़क पर बड़े आराम से देख सकते है.

दरअसल  15 दिसंबर को लोग अपनी मांगों को लेकर इस सड़क पर बैठ गए थे, शुरुआत में पुलिस को लगा कि ये लोग थोड़ी देर सड़क पर बैठेंगें और बाद ने ठंड की वजह से वापस अपने घर चले जायेंगे, लिहाजा सड़क को शाहीनबाग जाने वाली पहली रेड लाइट से लेकर कालिन्दी कुंज एमसीडी टोल प्लाज़ा के पास तक दोनों तरफ से बंद कर दिया गया.

पुलिस को भले ही ये अपनी कामयाबी का फॉर्मूला लग रहा था, लेकिन असल मे ये पुलिस की सबसे बड़ी भूल थी, पुलिस ने बिना कोई अनुमान लगाए जो ये फैसला लिया, ये पुलिस के साथ साथ लाखों लोगों के लिए परेशानी की सबसे बड़ी वजह बन गई. प्रदर्शन कर रहे उन लोगों ने पुलिस द्वारा दी गई इस सड़क को ही अपने प्रदर्शन का अखाड़ा बना लिया, रातों रात टेंट लग गए, स्टेज बन कर तैयार हो गया, पोस्टर चिपक गए, सबके खाने के लिए बिरयानी आने लगी, चाय नाश्ते का इंतजाम भी कर दिया गया.

प्रदर्शन के शुरुआत में लगता था कि कड़ाके की ठंड की वजह से ये लोग ज्यादा दिनों तक सड़क पर नहीं टिकेंगे, लेकिन पुलिस की ये सोच गलत थी, दिन कब हफ़्ते से होकर महीने में तब्दील हो गए, पता ही नहीं चला,  इस दौरान प्रदर्शनकारियों के जोश में कोई कमी नहीं आई बल्कि रोजाना लाखों लोगों को होने वाली परेशानी की वजह से इनका छोटा सा प्रदर्शन अब इंटरनेशनल मीडिया की सुर्खियां बन गया था...सबसे दिलचस्प बात ये है कि बिना किसी नेतृत्व के शुरू हुए इस प्रदर्शन को अब आस पास से मदद भी मिलने लगी.

मीडिया में काम करने वाले लोगों ने उनको समझाया कि अगर कोई चैनल लाइव करने आता है तो उसको आने दो और लाइव अपनी आवाज़ दुनिया को सुनाओ, लेकिन अगर कुछ रिपोर्टर खासकर कुछ चुनिंदा नेशनल मीडिया के लोग अगर आते है तो उनके साथ हिंसक भी कर  सकते है. जिसका असर ये हुआ कि मीडिया के एक वर्ग में इनकी आवाज़ लगातार उठने लगी, आस-पास के मुस्लिम बहुल इलाकों से खाने-पीने की चीजें फ्री में आने लगी, मेडिकल बॉक्स रख दिया गया, महिला बच्चे समेत सैंकड़ो लोग रात दिन यहां प्रदर्शन पर बैठ गए, प्रदर्शन का रंग रूप पूरी तरह बदल गया था, क्योंकि प्रदर्शन किसी राजनीतिक पार्टी का नहीं बल्कि उसी इलाके के स्थानीय लोगों का था जिसको बाहरी लोगों ने भी सपोर्ट दे दिया था.

प्रदर्शन की जगह घर से ज्यादा दूर नहीं थी, लिहाजा घर और प्रदर्शन दोनों में समन्वय बैठाना कोई मुश्किल नहीं था, अब लोग घर के काम के साथ साथ अपनी आवाज़ भी बराबर उठा रहे थे, प्रदर्शन के नियम भी बन गए थे, कोई भी बाहरी व्यक्ति बिना तलाशी के स्टेज के पास तक नहीं जा सकता था, यहां तक कि किसी को भी गली में खड़े रहने की इजाज़त नहीं थी, मतलाब पुलिस का कोई भी आदमी खड़े होकर इलाके का जायज़ा ना ले सके ( हालांकि व्यवस्था ख़राब ना हो इसका मकसद ये भी हो सकता है) लेकिन इस पूरी वजह से दिल्ली और नोएडा के बीच की इस अहम रोड़ का ट्रैफिक दिल्ली नोएडा डायरेक्ट यानी डीएनडी की तरफ डाइवर्ट करना पड़ा....

....जिसका नतीजा ये हुआ कि उस रुट पर हर वक्त जाम रहने लगा, मिनटों के सफ़र को तय करने में घंटे लगने लगे, स्थानीय लोगों को जब परेशानी होने लगी तो वो खुद सड़को पर उतर आए लेकिन पुलिस के एक बार समझने पर मान गए और वापस अपने घर चले गए, पुलिस लगातार प्रदर्शनकारियों से धरना खत्म करने की अपील करती रही लेकिन अब गेंद पुलिस के पाले से बाहर थी, कुछ लोग रोड़ खुलवाने के लिए दिल्ली हाइकोर्ट गए तो हाइकोर्ट ने बिना कोई सटीक आदेश देते हुए गेंद वापस पुलिस के पाले में डाल दी.

हाइकोर्ट ने लोगों को हो रही परेशानी की वजह से रोड़ खुलवाने को तो बोल दिया लेकिन कानून व्यवस्था ना बिगड़े इसका भी ध्यान रखने को कहा. अब पुलिस को समझ नहीं आ रहा कि आखिर वो करे तो क्या करे, सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करने वाले इन लोगों को पूरा सेटअप लगाने का मौका भी उन्होंने ही दिया था.

अब इस सेटअप में जिस तरह की तस्वीर देखने को मिली उनको देखकर तो कोई भी इन लोगों पर सख़्त करवाई करने के आदेश नहीं दे सकता था. CAA, NPR और NRC को लेकर स्टेज से बिना ज्ञान के भाषण देने का सिलसिला शुरू हो गया, हाथों में तिरंगा, चेहरे पर तिरंगे का टैटू और बैक ग्राउंड में राष्ट्र भक्ति के गाने, छोटे बच्चों के हाथ मे संविधान बचने के पोस्टर के साथ नारे, लेकिन क्या इन मासूम बच्चों को पता है कि इस देश का संविधान क्या कहता है ?

मेरा सवाल सिर्फ ये है कि जिन मासूम बच्चों को संविधान बचाने के लिए तैयार किया है क्या उनके पिता संविधान के बारे में जानते है? आज पूरे दिन कवरेज के दौरान मैं सिर्फ एक ऐसे नेता का इंतजार करता रहा जो इन लोगों को CAA कानून की सही जानकारी देगा, लेकिन अफसोस ऐसा कुछ नहीं हुआ . आखिर में समझ आया कि इस देश की हालात इतनी बुरी क्यों है?

(लेखक ज़ी न्यूज़ के दिल्‍ली ब्‍यूरो में क्राइम रिपोर्टर हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)