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जम्मू कश्मीरः क्या परिसीमन से बदलेगी रियासत की सियासी तस्वीर?

अब फिर से परिसीमन के प्रयास किये जाने की बात चल रही है. जम्मू की राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि नए सिरे से परिसीमन होने से राज्य में राजनीतिक असंतुलन खत्म होगा. कश्मीर में 346 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक विधानसभा है, जबकि जम्मू में 710 वर्ग किलोमीटर पर एक विधानसभा.

जम्मू कश्मीरः क्या परिसीमन से बदलेगी रियासत की सियासी तस्वीर?

गृह मंत्री बनने के बाद से ही अमित शाह कश्मीर को लेकर लगातार बैठक पर बैठक किये जा रहे हैं. इस बाबत उन्होंने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से भी मुलाकात की. ख़बरों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों के परिसीमन के लिए आयोग बनाने पर विचार किया जा रहा है. जम्मू कश्मीर में इसके पहले 1995 में परिसीमन किया गया था. उसी साल राज्यपाल जगमोहन के आदेश पर रियासत में 87 सीटों का गठन किया गया था जिसमें 46 सीटें कश्मीर डिविजन को 37 सीटें जम्मू को और 4 सीटें लद्दाख डिविजन को दी गईं थीं. 

जम्मू-कश्मीर की दो बड़ी क्षेत्रिय पार्टियां नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी नहीं चाहती कि राज्य में परिसीमन हो इसके लिए नेशनल कान्फ्रेंस ने साल 2002 में ही बड़ी चालाकी से खांका तैयार कर लिया था. दरअसल जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान है. इस संविधान के अनुसार हर 10 साल बाद निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया जाना चाहिए. ऐसे में साल 1995 के बाद रियासत में सीटों का परिसीमन 2005 में होना था लेकिन राज्य में 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला की नेशनल कान्फ्रेंस सरकार ने इस पर 2026 तक रोक लगा दी थी. अब्दुल्ला सरकार ने जे एंड के जन प्रतिनिधित्व कानून यानी (J&K REPRESENTATION OF THE PEOPLE ACT,1957) और जम्मू-कश्मीर के संविधान में बदलाव करते हुए यह फैसला लिया था. उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसले को सही ठहराया था. 

अब फिर से परिसीमन के प्रयास किये जाने की बात चल रही है. जम्मू की राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि नए सिरे से परिसीमन होने से राज्य में राजनीतिक असंतुलन खत्म होगा. कश्मीर में 346 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक विधानसभा है, जबकि जम्मू में 710 वर्ग किलोमीटर पर एक विधानसभा. 

2011 की जनगणना के अनुसार जम्मू संभाग की आबादी 53,78,538 है, जो राज्य की 42.89 प्रतिशत आबादी है. जम्मू संभाग 26,293 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है यानी राज्य का 25.93 प्रतिशत क्षेत्रफल जम्मू संभाग के अंतर्गत आता है. यहां विधानसभा की कुल 37 सीटें हैं. कश्मीर की आबादी 68,88,475 है, जो राज्य की आबादी का 54.93 फीसदी हिस्सा है. कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल 15,948 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के क्षेत्रफल का 15.73 प्रतिशत है. यहां से कुल 46 विधायक चुने जाते हैं. राज्य के 58.33 फीसदी (59146 वर्ग किमी) क्षेत्रफल वाले लद्दाख संभाग में केवल चार विधानसभा सीटें हैं. अगर क्षेत्रफल और मतदाता के आधार पर परिसीमन किया गया तो जम्मू और लद्दाख क्षेत्र मिलाकर 15 से 17 सीटें तक बढ़ सकती हैं. जिसका रियासत की सियासत पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है.

 इसके अलावा पीओके की 24 सीटों पर भी चुनाव कराने की तैयारी की जा रही है. आपको बता दें कि जम्मू-कश्मीर में कुल 111 सीटें हैं लेकिन 24 खाली हैं. दरअसल ये सीटें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में है. जिन्हें जम्मू-कश्मीर के संविधान के सेक्शन 47 के मुताबिक खाली छोड़ा गया है.  बाकी 87 सीटों पर चुनाव होता है. 

भाजपा सरकार विस्थापित कश्मीरी पंडितों के तर्ज पर पीओके के उन लोगों के लिए चुनाव की व्यवस्था करवाने की सोच रही है जो पीओके से राज्य के दूसरे हिस्सों  में आकर बस गए हैं. जम्मू कश्मीर में धारा 370 और 35A लगने के बाद चुनावों की शुरुआत तो हुई लेकिन इनमें पीओके में रहने वालों का कोई प्रतिनिधित्व शामिल नहीं हो पाया. क्योंकि पीओके की 24 सीटों पर पाकिस्तान और चीन ने  कब्जा कर लिया था. बाद में पीओके में रहने वाले लोग हिंसा से बचने के लिए घाटी में आकर रहने लगे. अब वे अपने अधिकारों के लिए लगातार अपने बीच के लोगों में से कुछ लोगों का प्रतिनिधित्व मांगते हैं. जानकारी के अनुसार बीजेपी इसके लिए एक प्लान लेकर आ रही है.

विस्थापित कश्मीरी पंडित एम फॉर्म के जरिये भारत के किसी अन्य क्षेत्र में रहते हुए अपना वोट दे सकते हैं. इसी तरह की व्यवस्था पीओके के विस्थापितों के लिए भी की जा सकती है. इस तरह की व्यवस्था में भारत में रह रहे पीओके से आए लोगों को अपने विधानसभा क्षेत्रों के नाम लिखते हुए चुनाव में शामिल होने की छूट मिल सकती है.  वे अपने एम फॉर्म में अपने पीओके वाले विधानसभा क्षेत्र की जानकारी देकर  वोटिंग में शामिल हो सकते हैं.  एम फॉर्म एक विस्तृत फॉर्म होता है जिसमें अपने निवास और नागरिकता को लेकर व्यापक साक्ष्य देने होते हैं.

(लेखक ज़ी सलाम से जुड़े हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)