भूखे-प्यासे नंगे पांव सड़कों पर चलते मजदूर और ये मजबूर सिस्टम

लॉकडाउन शुरू होने के बाद से लेकर अब तक सबसे भयावह जो तस्वीर है, वो है मजदूरों के पलायन की. ये मजदूर चले जा रहे हैं, बस चले जा रहे हैं, ट्रेनों के नीचे कट रहे हैं, सड़कों पर हादसों का शिकार हुए जा रहे हैं, भूख से तड़प रहें हैं कभी प्यास से बिलख रहें हैं. 

भूखे-प्यासे नंगे पांव सड़कों पर चलते मजदूर और ये मजबूर सिस्टम

सड़कों पर चलते मजदूर या नहरों में बहती लाशें! ये तुलना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन इन मजदूरों की बदकिस्मती देखिए कि ये कहने पर भी मजबूर होना पड़ रहा है.

पुलिसकर्मियों पर अक्सर ये आरोप लगते रहते हैं कि वो नदियों-नहरों में बहकर आने वाली लाशों को आगे धकेलकर दूसरे थाने के एरिया में डाल देते हैं. कुछ ऐसा ही सड़कों पर पैदल जाते इन मजदूरों के साथ भी हो रहा है.

लॉकडाउन शुरू होने के बाद से लेकर अब तक सबसे भयावह जो तस्वीर है, वो है मजदूरों के पलायन की. ये मजदूर चले जा रहे हैं, बस चले जा रहे हैं, ट्रेनों के नीचे कट रहे हैं, सड़कों पर हादसों का शिकार हुए जा रहे हैं, भूख से तड़प रहें हैं कभी प्यास से बिलख रहें हैं. असल में इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

ऐसा कैसे हो सकता है कि हजारों की संख्या में ये मजदूर निकले हुए हैं. कोई अपने बच्चें को सूटकेस पर लिटा कर ले जा रहा है, कोई कंधे पर बैठा कर तो कोई मजदूर खुद ही बैलगाड़ी का बैल बनकर खुद को तपती दोपहरी में घसीटे जा रहा है. लेकिन कोई इनको रोकने वाला नहीं, रोक रहे हैं तो सिर्फ राज्यों के बॉर्डर पर.

आपने यूपी के मथूरा की एक तस्वीर देखी होगी जब राजस्थान बॉर्डर से मजदूर यूपी बॉर्डर में घुस रहे थे तो पुलिसवाले आपस में ही भिड़ गए. ये कहते हुए कि इन मजदूरों को घुसने नहीं देंगे. मैं इसीलिए ये कह रहा हूं कि राज्य सरकारों के लिए ये मजदूर नहीं, नहरों में बहती लाशें हैं.

पुलिस के बारे में कहा जाता है और कई घटनाओं का मैं गवाह भी रहा हूं और कवरेज भी किया है कि पुलिसवाले कैसे काम करते हैं. यूपी में नहरों में बहकर आने वाली लाशों को रोका नहीं जाता था बल्कि आगे दिल्ली या हरियाणा की तरफ बहा दिया जाता था ताकि तफ्तीश ना करनी पड़े. ठीक इसी तरह थानों की सीमा पर भी होता है कि वारदात किस जगह हुई? ताकि थोड़ी सी भी गुंजाइश मिले तो मामला बगल वाले थाने में सरका दो.

इसी आधार पर मैं ये कह रहा हूं कि इन मजदूरों की असल में सुध लेने वाला कोई नहीं है. ये मजदूर जैसे भी साधन मिल रहा है, बस चले ज रहे हैं. टीवी/अखबारों/सोशल मीडिया में खबरें देख कुछ लोग (जिनमें कुछ अच्छे सरकारी अधिकारी भी हैं) इनकी सुध ले लेते हैं और मदद कर दे रहे हैं वरना तो सब ज्यादातर आगे बढ़ो की तर्ज पर इन्हें बढ़ाए दे रहे हैं. 

एक तस्वीर आप सब ने जरूर देखी होगी जिसमें एक आदमी रो रहा है और फोन पर बात कर रहा है. उस आदमी का नाम राम पुकार पंडित है. उसके एक साल के बेटे की मौत हो गई है, वो बस किसी तरह अपने बेटे का चेहरा आखिरी बार देख लेना चाहता था, और कोई साधन ना होने पर पैदल ही बिहार के बेगुसराय के लिए चल दिया. रोका कहां गया? दिल्ली गाजियाबाद बॉर्डर पर. तीन दिनों तक भटकते रहने के बाद किसी तरह मदद मिली और उसे मजदूरों के लिए जा रही ट्रेन में बैठाया गया और वो अपने घर पहुंचा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

सरकारों को ये समझना होगा कि ये गरीब मजदूर भी इसी देश का हिस्सा हैं और तरक्की में भागीदारी रखते हैं. खुद केंद्र सरकार ने आंकडा जारी कर बताया कि देश में करीब 8 करोड़ अप्रवासी मजदूर हैं जो एक राज्य से दूसरे राज्यों में काम करने जाते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओड़ीशा और मध्यप्रदेश से ज्यादातर ये मजदूर काम की तलाश में दूसरे राज्यों जैसे कि दिल्ली-एनसीआर, महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब जाते हैं. एक अनुमान के मुताबिक अकेले दिल्ली-एनसीआर में ही करीब 50 लाख मजदूर काम करते हैं जो देश की तरक्की में बराबर की भागीदारी निभाते हैं. सोचिये अगर ये वापस नहीं आए तो क्या होगा. पंजाब में जो मजदूर खेतों में काम करते हैं, फसल काटते हैं, फैक्ट्रियों में काम करते हैं वापिस नहीं आए तो क्या होगा?

आज जब मुसीबत का समय है तो इनकी तरफ से मुंह फेरने की बजाय इनका हाथ थामें और मदद कर इन्हें इनके घर तक पहुंचाने में मदद करें. क्योंकि जब भी लॉकडाउन खुलेगा तो सबसे पहले आपको इन्हीं सृजनकर्ता मजदूरों की जरूरत पड़ेगी. 

आखिर  में गोपाल दास नीरज की ये कविता
तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है
बाग के बाग को बीमार बना देती है
भूखे पेटों को देशभक्ति सिखाने वालों
भूख इंसान को गद्दार बना देती है...

(जितेंद्र शर्मा ZEE NEWS के Editor (Crime & Investigation) हैं)

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)