धारा 377: कानून बदल गया, क्या लोगों की सोच भी बदलेगी?

LGBTQ समुदाय को कानून से उनका हक तो मिल गया, लेकिन समाज से सम्मान पाने की लड़ाई अब शुरू हुई है. 

धारा 377: कानून बदल गया, क्या लोगों की सोच भी बदलेगी?
धारा 377 को कानून ने अपराध श्रेणी से बाहर कर दिया है.

हम जिस दुनिया में रहते हैं उसके कुछ नियम कायदे हैं, जिनसे सभी बंधे हुए हैं. लड़के की शादी और प्यार तो सिर्फ लड़की से ही हो सकता है. एक लड़का दूसरे लड़के से कैसे प्यार कर सकता है ये अनैतिक है, प्रकृति के खिलाफ है जैसी दलीलें देते लोग क्या सच में सेक्शन 377 का मतलब कभी समझ पाएंगे. गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया, जिसके बाद से LGBTQ समुदाय को उनके जीने के तरीके का मौलिक अधिकार मिला, लेकिन वहीं देश के एक बड़े तबके ने कोर्ट के इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया. अपने हक के लिए लड़ रहे LGBTQ समुदाय को कानून ने तो राहत दे दी, लेकिन क्या जिस समाज में उन्हें रहना है वो भी उन्हें खुले मन से स्वीकार कर रहा है! फैसला आने के बाद कुछ ऐसे रिएक्शन आए हैं, जिन्हें पढ़कर आपको अपने बीच के ही सभ्य लोगों की सोच पर दया आ जाएगी. LGBTQ समुदाय को कानून से उनका हक तो मिल गया, लेकिन समाज से सम्मान पाने की लड़ाई अब शुरू हुई है. 

फेसबुक पर वैसे तो कई अभद्र पोस्ट और स्टेट्स देखने को मिले, लेकिन एक फ्रेंड का लिखा पोस्ट पढ़कर मुझे गुस्सा आ गया. उसने अपनी वॉल पर गे कपल्स की एक सेक्स पोजिशन का मजाक उड़ाने की कोशिश की थी. मैंने जब उसे बोला कि तुम अभी एक स्टूडेंट हो और चीजों को समझकर बोलना सीखो तो उसका कहना था कि वो तो जी ऐसे ही लिखेगा, क्योंकि वो LGBTQ समुदाय का हिस्सा नहीं बनना चाहता. हिस्सा मतलब, लोगों को अभी तक ये ही समझ नहीं आ रहा कि ये लोग क्यों लड़ रहे थे, मुद्दा क्या है? लोगों के दिमाग में ये घूम रहा है कि उन्हें किसी समुदाय का हिस्सा बनने के लिए कहा जा रहा है. ऐसे लोगों को बता दूं कि ये हक और सम्मान की लड़ाई थी. सम्मान देने की बात आते ही हमारा समाज सेलेक्टिव हो जाता है और यही वजह है कि लोगों को सड़कों पर आकर अपनी आवाज उठानी पड़ती है. 

इसी कड़ी में योग गुरु रामदेव ने इसे मानसिक बीमारी बताते हुए इसे जड़ से खत्म करने की बात कही थी. दूसरी तरफ बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने धारा 377 पर कहा कि किसी की निजी जिंदगी में क्या हो रहा इसे जानने का किसी को कोई हक नहीं, न ही उन्हें सजा देनी चाहिए. वहीं स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करते हुए समलैंगिकता को एक जेनेटिक डिसॉर्डर बताया. इतना ही नहीं कई लोगों का ये भी कहना है कि इस लॉ को एक साजिश के तहत पास किया गया है. कुछ विदेशी ताकतें नहीं चाहती कि भारत में औरत और मर्द के रिश्ते बेहतर बने रहे और उनकी संख्या बढ़े. 

वहीं, ज्यादातर लोगों ने तर्क दिया कि LGBTQ समुदाय के लोग मानसिक रूप से बीमार हैं और उनका रिश्ता अप्राकृतिक है. ऐसे लोगों को बता दूं कि मानसिक रोग के विशेषज्ञ भी इस बात को साफ कर चुके हैं कि ये एक शारीरिक स्थिति है जो नेचुरली ऐसी ही है. अब प्रकृति ने जिस व्यक्ति को ऐसा बनाकर ही पैदा किया है वो कैसे अप्राकृतिक हो सकता है. और यहां पर एक बात साफ कर दूं कि धारा 377 के तहत दो लोगों की सहमति से बने रिश्तों को कानून ने अपराध श्रेणी से बाहर किया है. बच्चों के साथ शोषण, जानवरों के साथ किया गया सेक्स अभी भी अपराध ही है. कोर्ट ने अपनी बात साफ करते हुए कहा है कि ये किसी की पर्सनल च्वाइस है और उसके निजी फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए.

क्या है धारा-377
आईपीसी की धारा-377 के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाता है तो उसे उम्रकैद या जुर्माने के साथ दस साल तक की कैद हो सकती है. आईपीसी की ये धारा लगभग 158 साल पुरानी है. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे में रखने वाली धारा 377 के हिस्से को तर्कहीन, सरासर गलत मनमाना. कोर्ट ने कहा कि इसका बचाव नहीं किया जा सकता है. लेकिन पशुओं ओर बच्चों से संबंधित अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने को अपराध की श्रेणी में रखने वाले प्रावधान बने रहेंगे और अपराधियों को दंडित किया जाएगा.

(लेखिका ज़ी न्यूज़ डिजिटल से जुड़ी हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)