सपा-बसपा गठबंधन : दूरियां कम करने की इच्छा, लेकिन 'ईगो' का क्या होगा?

अखिलेश भले ही अपनी ओर से सपा और बसपा के बीच दूरियां कम करने के इच्छुक हों, लेकिन ऐसे गठबंधन का नेतृत्त्व वे खुद ही करना चाहेंगे इसमें किसी को संदेह नहीं है.

सपा-बसपा गठबंधन : दूरियां कम करने की इच्छा, लेकिन 'ईगो' का क्या होगा?

क्या उत्तरप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का तथाकथित सहयोग वास्तव में भारतीय जनता पार्टी के पतन का कारण बन सकता है? जहां सपा और बसपा समेत कुछ छोटे दल ऐसी भविष्यवाणी कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस की ओर से प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर का कहना है कि यह ‘लालच और स्वार्थ’ का गठबंधन है. पहले ऐसा माना जा रहा था कि यह बसपा प्रमुख मायावती की ओर से एक सोचा-समझा कदम था जिसके सहारे वे अपने लिए राज्यसभा में स्थान सुनिश्चित कर सकें, लेकिन औरैय्या के भीमराव आंबेडकर को अपनी पार्टी की ओर से राज्यसभा का प्रत्याशी नामांकित कर उन्होंने इस संभावना को ख़ारिज कर दिया. तो आखिर इन दो प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के साथ आने के पीछे सिर्फ फूलपुर और गोरखपुर के लोकसभा उपचुनाव हैं?

इसका जवाब आंकड़ों के खेल से ज्यादा प्रदेश में सामाजिक और जातिगत रिश्तों को नजदीकी से देखने पर मिलता है. वर्ष 1994 में ये दोनों दल उस समय भाजपा के खिलाफ एकजुट हुए थे लेकिन सपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा बसपा के समर्थकों को स्वीकार न कर पाने के कारण बहुत जल्द यह साथ बिखर गया. उत्तरप्रदेश में यह सार्वजनिक जानकारी है कि जून 1995 में लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती पर हुए हमले के सिलसिले में तत्कालीन सपा के किसी भी नेता को किसी प्रकार की कोई ग्लानि नहीं थी. इस घटना के बाद सालों तक दोनों दलों के नेताओं के एक-दूसरे के सामने आने से ही तनाव बढ़ जाता था. मायावती ने सपा और इसके नेताओं को जिस तरह से अपशब्द कहे थे वह अप्रत्याशित था.

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लेकिन अब इन दोनों दलों में ही इतना सामर्थ्य नहीं है कि वे अकेले दम पर भाजपा को टक्कर दे सकें. जहां बसपा के सामने अस्तित्व का संकट है, वहीं सपा को यह स्थापित करना है कि वह भाजपा को हिलाने का दम रखती है. जहां सपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का साथ लेकर उस पार्टी को भी आजमा लिया, वहीं मायावती के ऊपर गंभीर आरोप लगा पर पार्टी छोड़ने वाले मायावती के पूर्व विश्वासपात्र नसीमुद्दीन सिद्दीकी को कांग्रेस में जगह मिलने के बाद बसपा और कांग्रेस के बीच किसी भी तरह के सहयोग की संभावना समाप्त हो गई. ऐसे में बसपा और सपा के पास एक-दूसरे का साथ देने के अलावा कोई रास्ता था ही नहीं.

इस बात की संभावना है कि सपा और कुछ अन्य के समर्थन से बसपा की ओर से आंबेडकर राज्यसभा पहुंच जाएं. यह भी हो सकता है कि इसके बदले में बसपा का समर्थन विधान परिषद में सपा को मिले, और आगामी कुछ महीनों में ये दोनों दल भाजपा और प्रदेश की योगी सरकार के खिलाफ संयुक्त विरोध प्रदर्शन में शामिल रहें. लेकिन इससे प्रदेश में दलित-पिछड़ा वर्ग एकता का नया अध्याय शुरू होगा इसकी उम्मीद कम है, क्योंकि दोनों ही दल अपने परंपरागत वोट बैंक से बाहर किसी प्रकार का उत्साहवर्धक संदेश देने में असफल रहे हैं. जिस तरह से पहले यह खबरें आईं कि राज्यसभा के लिए मायावती स्वयं या उनके भाई आनंद कुमार प्रत्याशी हो सकते हैं, और फिर अचानक मायावती ने इन ख़बरों को ‘भाजपा का मिथ्या प्रचार’ बताते हुए आंबेडकर के नाम की घोषणा की, वह बसपा की जानी-पहचानी रणनीति है. एक तो इस पार्टी में किसी प्रकार की अधिकारिक घोषणा किए जाने का कोई प्रचलन नहीं है, कोई पार्टी प्रवक्ता ऐसी सूचना देने के लिए अधिकृत नहीं है, सिर्फ अटकलों के अधर पर मीडिया में ख़बरें आती हैं, और ख़बरें आ जाने पर उस पर हुई प्रतिक्रिया को देखने के बाद ही मायावती अपनी ओर से घोषणा करती हैं. खुद अपने को और अपने भाई को राज्यसभा न भेजकर मायावती ने अपने समर्थकों के बीच यही संदेश देने की कोशिश की है कि वे किसी भी पद की लालसा से ऊपर हैं– इसे वास्तव में उन आरोपों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए कि पार्टी में चुनाव टिकट बेचे जाते हैं.

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जहां तक सपा का सवाल है, अभी भी इस पार्टी में पारिवारिक अंतर्विरोध शांत नहीं हुआ है. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह शिवपाल यादव अलग पड़ गए और मुलायम सिंह यादव शांत पड़ गए, उससे यह नहीं समझा जाना चाहिए कि अखिलेश यादव सर्वशक्तिमान हो गए हैं. उनकी पार्टी में अभी भी ऐसे तत्व मौजूद हैं जो मुलायम या शिवपाल के एक इशारे पर अपना निर्णय लेंगे. बसपा द्वारा गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा को समर्थन दिए जाने की ख़बरों के बाद भले ही मुलायम और बसपा संस्थापक कांशीराम की पुरानी फोटो अखबारों में फिर से दिख रही हैं, लेकिन मुलायम की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

अखिलेश भले ही अपनी ओर से सपा और बसपा के बीच दूरियां कम करने के इच्छुक हों, लेकिन ऐसे गठबंधन का नेतृत्त्व वे खुद ही करना चाहेंगे इसमें किसी को संदेह नहीं है. ऐसे में बसपा का कार्यकर्त्ता अखिलेश को अपना नेता मानेंगे इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है.

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फिलहाल तो फूलपुर में सपा और बसपा के कार्यकर्ता दोनों दलों के झंडे लिए प्रचार कर रहे हैं और प्रदेश विधानसभा में ये दोनों दल एक-दूसरे का बढ़-चढ़कर साथ दे रहे हैं, लेकिन उपचुनावों के नतीजे कुछ भी हों, इन दोनों दलों की असली परीक्षा तो 2019 के लोकसभा चुनाव में ही होगी.

(लेखक रतनमणि लाल वरिष्ठ लेखक और स्‍तंभकार है)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)