पिता ने कहा था- 'तू और तेरा साज एक हो जाएंगे'

विश्वख्याति प्राप्त संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा ने पिछले दिनों भोपाल स्थित कलाओं के घर भारत भवन में संतूर समारोह के दौरान श्रोताओं के बीच अपनी कला यात्रा से जुड़ी स्मृतियां साझा की. उनसे यह संवाद किया वरिष्ठ कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने. इस दिलचस्प बातचीत को कथात्मक शैली में बुना गया है.

पिता ने कहा था- 'तू और तेरा साज एक हो जाएंगे'

मासूम जिदों और रंगीन सपनों से भरी मेरे बचपन की भी एक रूपहली दुनिया रही. लड़कपन के बाद किशोर-युवा हुआ, तो संघर्ष के ऊबड-खाबड़ रास्तों पर बिना डरे चलने का हौसला पाया. भीतर के विश्वास ने कुछ ऐसा साथ दिया कि एक मुकाम पर कामयाबी ने मुस्कुराते हुए अपने दामन में भर लिया. लेकिन आज 80 पार की उम्र में जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो इस सौभाग्य पर माथा झुकाने को मन करता है कि पिता से मिले सुरीले संस्कार, जम्मू-कश्मीर की जीवनदायी प्रकृति और संस्कृति तथा गुणी संगीत विभूतियों के आश्रय ने बचपन में ही जैसे भविष्य की इबारत लिख दी थी.

याद आता है- मेरी उम्र पांच साल की रही होगी. जम्मू का हमारा घर तब संगीत की महफिलों से गुलजार रहा करता था. हमारे खानदान में वैसे पीढ़ियों से चली आ रही संगीत की कोई परंपरा नहीं थी लेकिन मेरे पिता पंडित उमादत्त शर्मा बहुत ही मंझे हुए गायक और तबला वादक थे. उस समय सितार वादक पंडित रविशंकर, तबला वादक उस्ताद अल्ला रखा खां, पंरु सामता प्रसाद, गायिका सिद्धेश्वरी देवी, बेगम अख्तर जैसे उच्चकोटि के संगीतकारों का जम्मू आना होता था. ये विभूतियां हमारे घर भी आती. इन्हें शिरकत करते हुए देखता और इनको संगीत के विषय पर गूढ़ चर्चा करते सुनना एक ऐसा विलक्षण अनुभव था जिसके मर्म को आज मैं ठीक से समझ पा रहा हूं. तो पिता की प्रेरणा से इस माहौल ने मेरे भीतर सुर-ताल में रमने के लिए एक नैसर्गिक रुझान पैदा किया.

इसी दौरान पिताजी ने मुझे तबले पर हाथ रखने का आदेश दिया. उन्हीं के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से मेरी उंगलियां तबले के दाएं-बाएं पर थिरकने लगी. जम्मू रेडियो स्टेशन पर बाल कलाकारों के कार्यक्रम में मुझे भी तबला प्रस्तुत करने के अवसर मिलने लगे. तबले के साथ ही गायन भी मैंने पिताजी से ही सीखा. लेकिन एक दिन अचानक एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मेरी जिं़दगी की दिशा ही बदल दी. हुआ यूं कि जम्मू-कश्मीर की सदियों पुरानी सूफी लोक-संस्कृति में सौ तारों को मिलाकर बजाये जाने वाले एक वाद्य से पिताजी का परिचय हुआ. उन्हें वह साज़ बहुत पसंद आया. उसके तारों से निकले कंपन्न में जैसे जम्मू-कश्मीर के पहाड़ों-झरनों का चंचल-कोमल संगीत गूंजता था. पिताजी को जाने क्या सूझा कि छोटे आकार का वही वाद्य मेरे हाथों में दिया और कहा 'इसे बजाओ. एक दिन यह वाद्य और तुम्हारा नाम एक ही हो जायेगा. तुम दुनिया में इसी साज़ के कारण जाने जाओगे!' यह वाद्य था-संतूर. इस तरह संतूर बहुत छोटी उम्र में मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया.

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जम्मू की हरीसिंह स्कूल में मेरा दाखिला करा दिया गया लेकिन मन के तारों पर सात सुरों के गणित ने कुछ ऐसा जादू कर रखा था कि किताबों के सबक बहुत रास नहीं आते. हालांकि मैं नोट्स ले लेता था. हर साल पास भी हो जाता. घर आकर देखता कि पिताजी अपने कमरे में रियाज़ कर रहे हैं तो मैं भी उन्हीं के साथ खो जाता. पिता ने संतूर की तासीर और उसकी पुरानी तहज़ीब से मेरा परिचय कराया. उसे बजाने की पद्धति समझाई. उसकी तकनीक और राग-भाव की गहरी समझ का मार्गदर्शन किया. मेरी आत्मा पर संतूर की स्वर-लहरियों ने कुछ ऐसा असर किया कि मैं सब कुछ भूलकर घंटों रियाज में खोया रहता. मां बाहर से दरवाजे पर दस्तक देती- 'बेटा खाना खा लो'. तब पता चलता समय का. निश्चिय ही जीवन और संगीत साथ हो लिए थे.

स्कूल की पढ़ाई पूरी हुई तो बीए करने जम्मू के ही गांधी मेमोरियल कॉलेज में एडमिशन ले लिया. वहां लड़कियों की संख्या भी कम न थी. वहीं मैंने संस्कृत पढ़ी. कालिदास का 'कुमार संभव' पढ़ा. वह वक्त एक रूमानी सपने की तरह याद आता है. तीज-त्योहारों पर घर और शहर भर में साज-सज्जा और मौसमी पकवानों की महक फैल जाती. सब कुछ परंपरागत तौर-तरीकों से होता. आज की तरह बाज़ारों की चकाचैंध और टेक्‍नोलॉजी तब नहीं थी. मन में भरपूर उमंगें उछालें मारती. त्योहार-प्रसंगों की ताजगी बहुत दिनों तक हमारे मन में रची-बसी रहती.

पिता ने मेरे जीवन में अभिभावक और गुरु दोनों का फर्ज निभाया. उनकी आज्ञा से ही मैंने संतूर को आत्मसात कर जीवन की दिशा तय कर ली थी. मैं इस वाद्य के साथ कल्पना की सुरीली स्वच्छंद उड़ान का आनंद लेना चाहता था. जैसा कि होता है, युवा होते-होते नौकरी की चाही-अनचाही जरूरत ने मुझे भी अपनी गिरफ्त में लेना चाहा. पिताजी जम्मू रेडियो स्टेशन पर म्यूजिक सुपरवाईजर थे और जम्मू रेडियो पर ही मुझे भी म्यूज़िक प्रोड्यूसर की नौकरी का प्रस्ताव मिला. पिताजी चाहते थे कि मैं वह नौकरी कर लूं लेकिन मेरा पक्का विचार था कि मुझे नौकरी नहीं करना है, चाहे वह संगीत ही क्यों न हो. पिताजी इस पर बहुत नाराज़ हुए लेकिन बता दूं कि वैसे कभी संगीत सिखाते हुए मुझ पर गुस्सा नहीं हुए.

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पिताजी ने कहा- 'अगर कलाकार बनना है तो यहां क्या कर रहे हो बड़ी जगह जाओ और कलाकारों के बीच खुद को स्थापित करो'. मैंने कहा- 'ठीक है, मैं मुंबई जाऊंगा'. मां ने भी मेरा साथ दिया. फिर पिताजी ने मुझे पांच सौ रुपए दिये और कहा कि जब तक तुम्हारा वहां कुछ ठीक से जम नहीं जाता, तब तक मैं तुम्हें पैसे भेजता रहूंगा. मेरी देखभाल के लिए पिताजी ने अपना एक शागिर्द भी साथ भेज दिया. वह एक जून 1960 की तारीख थी जब मैंने मुंबई की धरती पर कदम रखा.

शुरू में मैं धोबी तालाब रोड पर होटल कश्मीर में रहा. बाद में व्ही.जी. जोग साहब का एक विद्यार्थी था, जो एक जज साहब का बेटा था, वह मुंबई में एक कमरे में रहता था. जोग साहब मुझसे एक दिन बोले- 'आप यहां इस गंदे से कश्मीर होटल में रहते हैं जो आपके लिए ठीक नहीं है. आज मेरे विद्यार्थी के साथ उसके कमरे में रहें और कुछ किराया आप भी देते रहें'. इस तरह मुंबई में मेरे बसने की यह शुरुआती दास्तान थी.

हालांकि इससे पहले 1965 में मैं हरिदास सम्मेलन में बजाने के लिए मुम्बई आया था. पंडित जसराज से भी मुलाकात उसी समय हुई. आज हम लोगों की दोस्ती को पचपन बरस से ज्‍यादा हो गए हैं. मेरे उस कार्यक्रम को सुनने के लिए जसराजजी की पत्नी मधुरा जी भी आई हुई थीं. उनको मेरा वादन इतना पसंद आया कि उन्होंने वहीं से अपने पिताजी फिल्मकार व्ही. शांताराम को फोन पर कहा कि मैंने एक नया साज सुना है और मुझे इसकी आवाज इतनी पसन्द आयी है कि शायद ये आपकी फिल्म में काम आये. मेरा कार्यक्रम समाप्त होने पर मधुरा जी मुझसे मिलने ग्रीन-रूम में आयीं और उन्होंने अपना परिचय दिया और कहा कि मैं व्ही. शान्ताराम जी की बेटी हूं और पिताजी ने कल आपको स्टूडियो में बुलाया है. मैंने कहा कि कल तो मुझे वापस जाना है क्योंकि मेरी बीए द्वितीय वर्ष की परीक्षा है अतः मैं रुक नहीं सकता और मैं वापस चला गया. लेकिन मैंने मधुरा जी को अपना विज़िटिंग कार्ड दे दिया था. मुझे आश्चर्य हुआ कि मेरी परीक्षा खत्म होते ही उन्होंने मुझे मुंबई वापस बुलवाया और तब मैंने 'झनक झनक पायल बाजे' फिल्म में पहली बार सन्तूर बजाया. इसी फिल्म में उस्ताद अमीर खां साहब ने टाइटल म्यूज़िक गाया और पं. सामताप्रसाद 'गुदई महाराज' ने तबला बजाया था.

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गोपीकृष्ण जी इस फिल्म के हीरो थे. इस फिल्म के सिलसिले में मैं सात-आठ दिन मुम्बई में था. इसी बीच एक दिन शान्ताराम जी ने मुझसे पूछा कि तुम्हारी क्या योजना है? मैंने कहा- 'जी, बस संगीत ही करना है.' उन्होंने कहा कि ठीक है, तुम यहीं रूक जाओ, मैं तुम्हें अपनी अगली फिल्म में संगीत निर्देशक का काम दूंगा. मैंने कहा- 'आपकी बड़ी मेहरबानी है कि आपको मुझ पर इतना विश्वास है पर मुझे अभी पढ़ाई पूरी करनी है और मैं अभी अपने पिताजी से संगीत की शिक्षा ले रहा हूं, मुझे फिल्म के संगीत निर्देशन में कोई दिलचस्पी नहीं है, मैं ऐसे ही आपके बुलावे पर फिल्म में बजाने चला गया था.' उन्होंने पूछा- 'पढ़ाई के बाद क्या करोगे?' मैंने कहा- 'करना तो संगीत ही है.' उन्होंने कहा- 'तो फिर अभी क्यों नहीं?' मैं तुम्हें फिल्म दे रहा हूं. परन्तु मैं रुका नहीं और वापस चला गया.

तो 1955 से मुम्बई आना-जाना शुरू हो गया था. शुरुआती दिनों में बहुत कठिन समय गुज़रा. एक समय ऐसा भी आया कि पांच सौ रुपए जो घर से लाया था वो खत्म हो चले थे. खाने के लिए भी पैसे नहीं बचे थे. लेकिन कुछ न कुछ इंतजाम भगवान कर ही देता था. लेकिन मैंने पिताजी को कभी नहीं बताया कि मैं किन हालातों से गुजर रहा हूं. क्योंकि मैं अगर उन्हें बताता तो वो मुझे वापस बुला लेते और कहते कि आकर नौकरी कर लो. धीरे-धीरे फिल्मों में बजाते-बजाते आर्थिक स्थिति ठीक होने लगी थी. उस समय में मैं कार्यक्रम भी करता था तो कभी पैसा मिलता और कभी नहीं भी मिलता. लेकिन कार्यक्रम करने का उद्देश्य यह होता था कि लोग मुझे सुनें. लोगों ने सुना तो फिर चर्चा भी शुरू हुई. चार लोगों ने प्रशंसा की तो चार लोगों ने आलोचना भी की. यह सब 1960 से जो शुरू हुआ तो लगभग सात-आठ साल तक चलता रहा.

मेरा पहला एच.एम.व्ही का इ.पी. रिकॉर्ड 1960 में आया. वह मेरा पहला स्वतंत्र वादन का रेकॉर्ड था. फिर 1961 में पहला एल.पी. रेकॉर्ड आया. जब मैंने 'झनक झनक पायल बाजे' फिल्म के लिए बजाया था तो उस फिल्म के गानों का एक रिकॉर्ड निकला था. वह बहुत लोगों से सुना था. उस समय एच.एम.व्ही. में जी.एम. जोशी हुआ करते थे. एक बार मैं उनसे मिला तो उन्होंने कहा - 'अरे, हम तो आपको ढूंढ रहे थे.' मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि उस समय लोग मुझे ज़्यादा जानते नहीं थे. मैंने कहा- 'क्यों?' जोशी जी बोले-'हम आपकी रेकार्डिंग करना चाहते हैं.' तो ये एक चीज़ मुझे बड़ी आसानी से मिली. बाकी कोई भी चीज़ आसानी से नहीं मिली. मैंने ऐसा भी वक्त मुम्बई में देखा है कि शाम को खाने के पैसे जेब में नहीं है.

हमारा लालन-पालन जिस तरह से हुआ उसमें हमें उधार मांगने की आदत नहीं रही. ऊपर से पिताजी ने हमारी देखरेख के लिए एक शिष्य साथ में भेज दिया था तो उसके खाने-पीने का इन्तज़ाम भी मुझे ही देखना पड़ता था. अब मैं उस दिन सोच रहा था कि क्या करूं? ये शागिर्द भी मेरे बारे में क्या सोचेगा कि खाने के पैसे भी नहीं हैं. परन्तु, मेरा ईश्वर पर अटूट विश्वास है और उसने हमेशा ही मेरी मदद की है. तभी बाहर घण्टी बजती है, जाकर देखता हूं तो दरवाजे़ पर पोस्टमेन तेरह रुपए पचहत्तर पैसे का मनीआर्डर लिए खड़ा था, जो जालंधन रेडियो से मेरी रिकॉर्डिंग के एवज़ में आया था. हमेशा तो रेडियो की तरफ से चेक आता था पर ईश्वर की कृपा देखिए कि उस दिन मनीआर्डर आया. हम बड़े खुश हुए. नीचे गये. बीस-बीस पैसे का टिकिट लेकर बस से ग्रान्ट रोड जाकर वहां एक होटल हुआ करता था 'शेर-ए-पंजाब', उसमें जाकर खाना खाया. उस समय दो रुपये में खाना हो जाता था. तो ऐसे कुछ न कछ मदद हर समय हो जाया करती थी. ऐसा समय काफी दिनों तक चला. तो वो सब आसान नहीं था. आर्थिक संघर्ष बहुत करना पड़ा. फिल्मों की रिकॉर्डिंग से भी ज्यादा पैसा नहीं मिलता था.

मेरा मानना है कि यदि आपकी तालीम का आधार बहुत ठोस है तो कहां से क्या विचार आपके दिमाग में आकर बैठ जायेगा और कितने सालों बाद वो किस रूप में आपके खुद के संगीत में प्रस्फुटित होगा, आप स्वयं नहीं जान पायेंगे. हमारे मोहल्ले में एक सफाई कर्मचारी था. वो बहुत सुरीला गाता था. हमारे पिताजी इस तरह के व्यक्ति थे कि कभी-कभी वो उसको, छुआछूत से हटकर, घर में बुलाकर बिठाकर कहते- 'अरे गोटी, गाना सुनाओ'. बहुत सुरीला लोकसंगीत वो गाता था. हमारी माताजी भी कभी-कभी अपना काम करने के बाद गाती थीं तो वो भी मेरे दिमाग में रहा. जो संगीत आपके मिजाज़ का नहीं है वो आपके दिमाग के कम्यूटर में 'सेव' नहीं होता, 'डीलीट' हो जाता है और जो संगीत आपकी रुचि, आपके मन मिजाज का होता है वो आपके दिमाग में रह जाता है और फिर कई सालों के बाद जब आप कुछ नयी चीज़ करने का प्रयास करते हैं तो उसकी कुछ न कुछ शक्ल आपकी सोच के ज़रिये आपके काम में सामने आती है. इससे आपके संगीत में एक अलग रंग आ जाता है. जैसा कि मैंने शुरू में बताया कि जब हम बड़े हो रहे थे तब पचास के दशक में संगीत का बड़ा माहौल था. सिद्धेश्वरी देवी, बेगम अख्तर को सुना, उनके साथ बजाया भी. गिरिजा देवी को सुना. तो इस तरह कई लोगों को सुना. जो ज़्यादा अच्छा लगा, उनके नाम याद रह जाते हैं. एक समारोह में तो मैंने केसरबाई केसरकर के पहले बजाया भी.

फिल्म संगीत का मुझे बचपन से शौक था. जैसा कि मैंने पहले बताया 1955 में मैंने मधुरा जी के ज़रिये वी. शान्ताराम जी की फिल्म 'झनक झनक पायल बाजे' के बैकग्राउण्ड स्कोर में पहली बार सन्तूर बजाया. उसका संगीत मैंने खुद ही कम्पोज़ किया था, वैसे संगीत तो वसन्त देसाई का था. उस समय मधुरा जी की जसराज जी से शादी नहीं हुई थी. फिर साठ के दशक में मैं वापस मुम्बई आ गया और मैंने फिल्मों में बजाना शुरू किया. उस समय भी मुझे फिल्मों में संगीत देने के लिए ऑफर आने लगे थे. लेकिन मैंने किया नहीं, क्योंकि इस बारे में मेरी सोच बड़ी साफ थी कि पहले मुझे सन्तूर को भारत में और पूरी दुनिया में स्थापित करना है. अभी यदि मैं इससे हट गया तो वो सब हो नहीं पायेगा. इस तरह संगीत निर्देशन का काम मैंने 1980 में पहली बार यश जी के लिए 'सिलसिला' में शुरू किया. उस समय हमने फिल्म के 3-4 गाने ही रिकॉर्ड किये थे और हमको दूसरी 8-10 फिल्मों के 'ऑफर' आने लगे थे. लेकिन मैंने हरि जी बांसुरी वादक पं. हरिप्रसाद चैरसिया के साथ पहले यह तय किया था कि हमें इन सब चक्कर में ज्‍यादा नहीं पड़ना है.

मेरा मानना है कि बड़े संगीतकार का बेटा बड़ा संगीतकार बनेगा यह जरूरी नहीं है. यह कई जन्मों का संयोग है. रियाज से उसमें समझ पैदा होती है, लेकिन उसमें संस्कार नहीं हैं. तो किसी भी महान कलाकार का लड़का क्यों न हो वह संगीतकार नहीं बन पाता. इसी सोच की वजह से मैंने अपने बेटे राहुल को बचपन में संगीत नहीं सिखाया. मैं पहले यह देखना चाहता था कि उसकी रुचि संगीत में है या नहीं. मेरे दो बेटे हैं-रोहित और राहुल. बड़े बेटे रोहित ने संगीत नहीं सीखा. लेकिन राहुल जब 10-11 साल का हुआ तो मुझे लगा कि इसमें सांगीतिक प्रतिभा और उसमें कम्पोज़ करने की प्रतिभा भी है. मेरी पत्नी मनोरमा का भी ख्याल था कि बच्चों को संगीत में नहीं बढ़ाना है. उसने अपने जीवन में बहुत तकलीफ देखी है, तो मनोरमा नहीं चाहती थी कि बच्चे भी वही सब देखें. लेकिन राहुल में प्रतिभा देखी तो मैंने मनोरमा को कहा कि अगर हम राहुल को नहीं सिखायेंगे तो यह उसके साथ अन्याय होगा. राहुल के काॅलेज में पढ़ने के साथ उसकी कायदे से तालीम शुरू हुईं. उसकी रुचि कम्पोजिंग में ज्यादा थी, लेकिन धीरे-धीरे वह सन्तूर वादन में आ गया. अपने बेटे में इस तरह मैं अपनी विरासत को जीवित होते देख सुख का अनुभव करता हूं.

संवाद और संकलन -विनय उपाध्याय

(मीडियाकर्मी, लेखक और कला संपादक)