पहुंचा तो पत्रकार बनकर था, पर कदम ऐसे ठिठके कि पत्रकारिता भूल गया...

अंकित की रोती मां और बेसुध बहन को देख मैं खुद उस वक्त दुनिया का सबसे असहाय आदमी बन गया था. माइक आईडी थामे मेरे हाथ खुद-ब-खुद पीछे चले गए.

पहुंचा तो पत्रकार बनकर था, पर कदम ऐसे ठिठके कि पत्रकारिता भूल गया...

बुधवार को न्यूजरूम में दिल्ली हिंसा में मारे गए आईबी कर्मी अंकित शर्मा की मौत की खबर लगातार देख रहा था, हिंसा का ये रूप देख मन बेचैन था. अचानक तय किया कि हिंसाग्रस्त इलाके में जाऊंगा. अपनी रिपोर्टिंग टीम को फोन किया तो पता चला कि साथी वहां डटे हुए हैं. मैं भी पहुंचा. वहां पत्थरों की बोरी से लेकर पेट्रोल बम बहुतायत में पड़े थे. आगे बढ़ा तो कुछ पीड़ितों से बातचीत हुई. दंगों की कहानी जो उन्होंने सुनाई, वो वाकई सोचने को मजबूर करती है कि ये दंगे कितने खतरनाक होते हैं, खून से ही इनकी प्यास बुझती है.

कुछ ही देर में मृतक अंकित शर्मा के घर पहुंचा. वहां का मंजर देख वाकई दिल दहल गया. अंकित की रोती मां और बेसुध बहन को देख मैं खुद उस वक्त दुनिया का सबसे असहाय आदमी बन गया था. माइक आईडी थामे मेरे हाथ खुद-ब-खुद पीछे चले गए. तब अहसास हुआ कि कभी-कभी जिंदगी में कुछ लम्‍हे ऐसे आते हैं जब संवेदनाएं, भावनाएं इतनी घनीभूत हो जाती हैं कि हमारी पेशेवर जिंदगी को पीछे धकेल देती हैं. तब हम वह नहीं रह जाते जो होते हैं या होना चाहते हैं...इसके बरक्‍स हम भीतर से पूरी तरह से खाली हो जाते हैं. इसे इस तरह कहना सही होगा कि हम परिस्थिति के सामने निरुत्‍तर हो जाते हैं.

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पेशेगत जिंदगी में ये एक बड़ी चुनौती होती है. ऐसा इसलिए क्‍योंकि हम पत्रकारों का पेशा ऐसे मौकों पर बड़ा चुनौतीपूर्ण हो जाता है. बतौर रिपोर्टर आपका संपादक आपसे ये उम्‍मीद करता है कि हमको कोई शानदार बाइट मिलेगी, विजुअल मिलेगा. लेकिन ऐसे भावुक मौकों पर ये सब बातें बेमानी हो जाती हैं. ऐसा ही उस देर शाम मैंने भी महसूस किया.

पत्रकार होने के नाते मैंने अंकित के परिवार से मिलने का फैसला जरूर कर लिया लेकिन जब घर की दहलीज पर पहुंचा तो रुदन और विलाप के माहौल में मेरे कदम  ठिठक गए. मैं अंकित के भाई से मिला. उस वक्‍त ZEE NEWS के एडिटर-इन-चीफ के नाते हमसे ये अपेक्षा थी कि हम उससे कुछ घटना के बारे में बात कर पाते. उसकी बाइट ले पाते. पर उसकी मां का दर्द देख कर मेरे होंठ जैसे सिल गए. मैं उनसे कुछ भी नहीं कह पाया. बस वहां खड़ा रह गया और फिर चुपचाप वापस चला आया.

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घर से बाहर निकलकर मुझे अंकित का भाई दिखा. भाई को देख मैं समझ नहीं पा रहा था कि उस भाई से क्या पूंछू जिसे कल अपने भाई का अंतिम संस्कार करना है. मुंह से अचानक निकला, 'मुझे तो पता नहीं कि आपसे क्‍या पूछूं और क्‍या बात करूं. आप ही मुझे बताइए कि क्‍या आप कुछ कहना चाहते हैं, हम सब से कुछ कहना चाहते हैं, हमसे कुछ चाहिए आपको...'

ये विडंबना ही है कि इस घटना के महज एक शाम पहले मैं भारत की सर्वश्रेष्‍ठ जगह पर था. यानी राष्‍ट्रपति भवन में अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के सम्‍मान में दिए गए डिनर कार्यक्रम में शामिल था. उस दौरान दुनिया के दो सबसे ताकतवर नेताओं से मिल रहा था. सब कुछ बेहतरीन था. बेहद खूबसूरत शाम थी लेकिन उसके महज 24 घंटे की ये शाम बेहद बोझिल, गमजदा, गमगीन थी...बेहद उदास कदमों से वापस लौटा...

(लेखक: सुधीर चौधरी ZEE NEWS के एडिटर-इन-चीफ हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)