ब्लॉग: तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुस्लिम महिलाओं के लिए नई सुबह

ब्लॉग: तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुस्लिम महिलाओं के लिए नई सुबह

रतन मणि लाल

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक मामले में मंगलवार (22 अगस्त) को अपना फैसला सुनाते हुए इस पर अगले छह महीने तक के लिए रोक लगा दी है और केंद्र सरकार से कहा है कि वह तीन तलाक पर कानून बनाए. गौरतलब है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों में से तीन जजों ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है जबकि मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस खेहर और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर ने मामले में अलग राय दी. इसमें कोई शक नहीं कि कोर्ट के इस आदेश से मुस्लिम महिलाओं को बड़ी राहत मिली है और देश में कई ऐसी मुस्लिम महिलाएं हैं जिनकी जिंदगी तीन तलाक ने बर्बाद कर दी थी.

इसके सामाजिक दुष्प्रभावों के बावजूद मुस्लिम वर्ग के अन्दर से इसे बदलने के कोई शुरुआत कभी नहीं की गई थी जबकि दुनिया के कई इस्लामिक देशों ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से कहा गया था कि तीन तलाक 'आस्था का विषय' है और इसकी तुलना भगवान राम के अयोध्या में जन्म से की थी. मगर याचिकाकर्ता सायरा बानो की तरफ से वकील अमित सिंह चड्ढा ने बोर्ड की इस दलील को खारिज कर दिया था.

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कोर्ट ने 17 मई को केंद्र सरकार को सुझाव दिया था कि तीन तलाक के मुद्दे पर वह न्यायालय के फैसले का इंतजार करने के बजाय मुस्लिमों में तीन तलाक सहित शादी व तलाक से संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए एक कानून लाए, और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा था कि पहले उन्हें तीन तलाक से निपटने के लिए कानून बनाने दीजिए, उसके बाद शीर्ष न्यायालय उसे संविधान की कसौटी पर कसेगा.

पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे धार्मिक मसला बताते हुए इस पर सुनवाई न करने की मांग की थी. लेकिन मुस्लिम मामलों के जानकार मुज़फ्फर हुसैन गज़ाली के अनुसार मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग का मानना है कि एक मजलिस में तीन तलाक ऐसी प्रक्रिया है इससे महिलाओं की गरिमा आहत होती है. काजी तीन तलाक के मामले में प्रमाणपत्र जारी करते हैं जबकि उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं. वे यह भी कहते हैं कि तीन तलाक मनमाना तरीका है उसका शरीयत से कोई संबंध नहीं है.

इससे पहले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड 1985 में शाहबानो मामले को लेकर सुर्खियों में आया था. शाहबानो ने बुजुर्गीं में तलाक के बाद अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता दिलाए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी जिसे स्वीकार कर सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया था. उस समय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमिअत उलेमा ए हिंद ने इसे शरीयत में हस्तक्षेप बताते हुए तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. उनका कहना था कि शरीयत के अनुसार गुजारा भत्ता तलाक के बाद इद्दत की अवधि में ही दिया जाता है. इद्दत के बाद गुजारा भत्ता मांगना शरीयत के खिलाफ है.

सरकार पर दबाव बनाने के लिए देशव्यापी आंदोलन चलाया गया और जल्द ही संसद द्वारा कानून में संशोधन कर न्यायालय के फैसले को बदल दिया. इस संशोधन में यह बात शामिल है कि अगर कोई महिला चाहे तो 125 सीआरपीसी के तहत गुजारा भत्ते की मांग कर सकती है. पूर्व में केंद्रीय मंत्री रहे आरिफ मोहम्मद खान ने सरकार के इस कदम का विरोध किया था. आज कई कांग्रेस नेता स्वीकार करते हैं कि शाहबानो मामले में राजीव गांधी सरकार का निर्णय गलत था.

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गजाली के अनुसार मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में एक पंथ और समूह के वर्चस्व के कारण मुस्लिम समाज में उसका विश्वास कम हुआ है महिलाओं, बरेलवी और शियाओं के अलग मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बनाए जाने से भी इसका अंदाज़ा होता है. पर्सनल लॉ बोर्ड को मुसलमानों का प्रतिनिधि संगठन माना जाता है.

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इसमें सभी पंथों के उलेमा और बुद्धिजीवी शामिल हैं. लेकिन जिस प्रकार पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक पर अड़ियल रवैया अपनाया है उससे बोर्ड पर एक ही विचारधारा के लोगों के वर्चस्व का संकेत मिलता है. सवाल यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इतने लंबे समय में शरीयत अधिनियम 1937 और मुस्लिम विवाह अधिनियम 1939 की कमियों को क्यों दूर नहीं करा सका. बोर्ड को अदालत से टकराने के बजाय उन्हें सही जानकारी प्रदान करनी चाहिए थी ताकि न्यायपालिका निर्णय ले सकती थी.

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ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड और ऑल इण्डिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इस्लाम और देश की मुस्लिम महिलाओं की जीत करार देते हुए कहा कि इससे तलाक के नाम पर मुसलमान औरतों के साथ होने वाली नाइंसाफी पर रोक लगने की उम्मीद है. ऑल इंडिया मुस्लिम वुमेन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अम्बर का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुस्लिम समाज के लिये ऐतिहासिक है और यह देश की मुस्लिम महिलाओं की जीत है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है, कि यह इस्लाम की जीत है. उन्होंने उम्मीद जताई है कि आने वाले वक्त में तीन तलाक को हमेशा के लिये खत्म कर दिया जाएगा.

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मुस्लिम समाज में यह कोई छिपी बात नहीं है कि तीन तलाक की वजह से मुस्लिम औरतों के साथ नाइंसाफी होती आई है जबकि इस्लाम में कहीं भी तीन तलाक की व्यवस्था नहीं है. सिर्फ कुछ तथाकथित धर्मगुरुओं की बनाई हुई इस व्यवस्था की वजह से लाखों औरतों की जिंदगी बर्बाद हुई है, और अब इस फैसले के बाद से मुस्लिम महिलाओं को उम्मीद है कि उन्हें न्याय मिलेगा. यह जरूर है कि मुस्लिम महिलाएं इस मामले में नए कानून को शरीयत के हिसाब से बनाया जाना चाहती हैं.

(लेखक रतन मणि लाल वरिष्ठ लेखक और स्‍तंभकार है)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)