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बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि: डॉ. विजय अग्रवाल

बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि: डॉ. विजय अग्रवाल

डॉ. विजय अग्रवाल

वाक्य सुंदर है और प्रभावशाली भी कि 'आई एम बिकाज़ ही वाज़' (मैं हूं, क्योंकि वह था). इस शीर्षक का वीडियो यू-ट्यूब पर अभी मौजूद है. इसमें 'आई' का संबंध टीना डाबी से है और 'ही' का संबंध डॉ. भीमराव आम्बेडकर से. उल्लेखनीय है कि ये वही टीना हैं, जिन्होंने पिछले साल आई.ए.एस. की परीक्षा में टॉप किया था. 'वह' का जिक्र उन्होंने इसलिए किया है, क्योंकि वे अनुसूचित जाति से हैं. साथ ही यह भी जानने योग्य है कि टीना के माता-पिता भारतीय इंजीनियरिंग सेवा के उच्च अधिकारी रहे हैं. दादा-दादी के बारे में मुझे नहीं मालूम, लेकिन टीना के बच्चों और पोते-पोतियों के बारे में काफी सही-सही भविष्यवाणी की जा सकती है, बशर्ते आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था ज्यों की त्यों बनी रही तो.

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टीना ने राजनीति विज्ञान में एम.ए. किया है. मैं आरक्षण के बारे में उनका ध्यान तीन तथ्यों की ओर आकर्षित करना चाहूंगा, जो उन्हें पहले से मालूम ही होगा. पहला तो यह कि इस मुद्दे पर संविधान सभा में हुई बहस में यह बात बिल्कुल साफ थी कि यह आरक्षण व्यक्ति के लिए न होकर समुदाय के लिए है. यानी कि यह व्यक्तिगत न होकर प्रातिनिधिक है. यह शब्द 'लोकतंत्र' के अनुकूल भी है. इसका सीधा और सरल सा अर्थ है कि आरक्षण का लाभ व्यक्ति को नहीं बल्कि उस समुदाय को मिलना चाहिए. आरक्षण के पिछले लगभग 60 साल का इतिहास मुख्यतः पीढ़ियों को मिलते जा रहे आरक्षण का इतिहास रहा है. जबकि आज उन्हें इसकी जरूरत नहीं है. टीना डाबी से बेहतर इसका अन्य कोई प्रमाण नहीं हो सकता.

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आरक्षण के प्रतिनिधिक एवं समुदायगत स्वरूप के आधार पर ही डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर ने केवल 10 साल के आरक्षण को पर्याप्त माना था. उससे छह गुना अधिक समय बीत जाने के बाद भी उनका सपना अधूरा इसलिए है, क्योंकि हमने उनके द्वारा निर्धारित स्वरूप की उपेक्षा की है. यदि ऐसा ही चलता रहा तो आगे भी यही होता रहेगा. यह दूसरा तथ्य था.

तीसरे तथ्य के रूप में मैं डॉ. आम्बेडकर द्वारा अपने जीवन के लगभग अंतिम वर्षों में व्यक्त विचारों में से एक का उल्लेख करना चाहूंगा. रामलीला मैदान में दिये गये अपने भाषण में उन्होंने देश के सरकारी अफसरों के प्रति जिसमें डॉक्टर, इंजीनियर आदि भी शामिल थे, गहरी निराशा व्यक्त की थी. उनकी निराशा का कारण था- इन अफसरों द्वारा स्वयं को समाज से अलग एवं विशिष्ट-व्यक्ति समझना. इस सत्य को आरक्षण का लाभ उठाने वाले अफसरों में आसानी से महसूस किया जा सकता है.

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तो फिर सवाल यह उठता है कि किया क्या जाये? रास्ते बंद कभी नहीं होते। हां, दिखाई भले ही न दें. इसका जो संवैधानिक रास्ता हो सकता है, आज वह बर्रे का छत्ता बन चुका है. कोई राजनीतिक दल उसे छेड़ने का दुस्साहस नहीं कर सकता. उनके सहारे बैठना इस समस्या की एक ‘ईमानदार एवं वैधानिक उपेक्षा‘ करनी होगी. इसलिए इसके निदान के लिए जो रास्ता निकलेगा, वह समाज से ही निकलेगा. वह रास्ता टीना डाबी और उनके जैसे लोग निकाल सकते हैं. रास्ता होगा- अपनी संतानों के लिए आरक्षण न लेने की घोषणा. वे घोषणा करे कि 'मेरी आने वाली पीढ़ी के पद मेरे ही समुदाय के जरूरतमंद लोगों को दिये जाएं.'

टीना डाबी इसकी शुरुआत करके एक नये आंदोलन की शुरुआत कर सकती हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी उन्ही के सुर में सुर मिलाकर कह सके कि 'आई एम, बिकॉज़ सी वॉज़.' बाबा साहेब के प्रति इससे बड़ी श्रद्धांजलि तथा ऋण उन्मुक्ति का उपाय भला और क्या हो सकता है?

(डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ लेखक और स्‍तंभकार हैं)

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