वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में स्वामी विवेकानंद का महत्व

स्वामी जी ट्विन आइडियल्स की बात करते थे. वह कहते थे कि 'मैन मेकिंग और नेशन बिल्डिंग' दोनो ही एक सिक्के के दो पहलू हैं.

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में स्वामी विवेकानंद का महत्व

स्वामी विवेकानंद जी की जयंती को हम युवा दिवस के रूप में मनाते हैं. एक आध्यात्मिक हस्ती होने के बावजूद स्वामी जी ने युवाओं के दिलों में अमिट छाप छोड़ी. उनका मानना था कि विश्व मंच पर भारत की पुनर्प्रतिष्ठा में युवाओं की बहुत बड़ी भूमिका है. विवेकानंद जी का राष्ट्र चिंतन युवाओं को आज भी प्रेरित करता है.  स्वामी विवेकानंद ऐसे संत थे जिनका रोम-रोम राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत था. उनके चिंतन का केंद्र बिंदु राष्ट्र था. उनके कर्म और चिंतन की प्रेरणा से हजारों ऐसे कार्यकर्ता तैयार हुए जिन्होंने राष्ट्र रथ को आगे बढ़ाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया.

इस युवा संन्यासी ने निजी मुक्ति को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया था, बल्कि करोड़ों देशवासियों के उत्थान को ही अपना जीवन लक्ष्य बनाया. राष्ट्र के दीन-हीन जनों की सेवा को ही वह ईश्वर की सच्ची पूजा मानते थे. सेवा की इस भावना को उन्होंने प्रबल शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा था- 'भले ही मुझे बार-बार जन्म लेना पड़े और जन्म-मरण की अनेक यातनाओं से गुजरना पड़े लेकिन मैं चाहूंगा कि मैं उसे एकमात्र ईश्वर की सेवा कर सकूं, जो असंख्य आत्माओं का ही विस्तार है. वह और मेरी भावना से सभी जातियों, वर्गों, धर्मों के निर्धनों में बसता है, उनकी सेवा ही मेरा अभीष्ट है.'

विवेकानंद समृद्ध भारत के निर्माण के लिए बेचैन थे. इसके लिए जातिभेद ही नहीं, उन्होंने हर बुराई पर प्रहार किया. उन्होंने कहा था- 'समता का विचार सभी समाजों का आदर्श रहा है. यह सारी मानवता का आदर्श है. संपूर्ण प्राणिमात्र के विरुद्ध जन्म, जाति, लिंग भेद अथवा किसी भी आधार पर समता के विरुद्ध उठाया गया कोई भी कदम एक भयानक भूल है. और ऐसी किसी भी जाति, राष्ट्र या समाज का अस्ति‍त्व कायम नहीं रह सकता, जो इसके आदर्शों को स्वीकार नहीं कर लेता.' समता के लिए अपने प्रखर उद्गार में उन्होंने कहा- 'अज्ञान विषमता और आकांक्षा ही वे तीन बुराइयां हैं, जो मानवता के दु:खों की कारक हैं और इनमें से हर एक बुराई दूसरे की घनिष्ठ मित्र है.'

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स्वामी जी ट्विन आइडियल्स की बात करते थे. वह कहते थे कि 'मैन मेकिंग और नेशन बिल्डिंग' दोनो ही एक सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों एक दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते. इसलिए पहले देश का निर्माण फिर मनुष्य निर्माण भारत के परिदृश्य में संभव ही नहीं है. यह दोनों काम साथ-साथ करने की जरूरत है. हमारी संस्कृति की मूल भावना भी यही है और इसी लिए हम छात्रों और युवाओं को आज का नागरिक मानते हैं. उन्हें कल के लिए नहीं छोड़ सकते. उनकी जिम्मेदारियां भी इसीलिए कम नहीं हैं. 

हमें ऐसे संवेदनशील नागरिक चाहिए, जो गांव-गरीब को हिकारत वाली नजरों से न देखें, बल्कि उनके उत्थान में अपना भी योगदान दे सकें. उन्हें किसी की पीड़ा पर हंसी नहीं आए बल्कि पीड़ा महसूस हो ताकि उसके दर्द पर वह मरहम लगाएं. स्वामी विवेकानंद जी भी ऐसे संवेदनशील युवाओं का निर्माण चाहते थे. ये संवेदनशीलता ही हमारी विरासत है. 

शिक्षा जरूरी है, पढ़ाई आगे बढ़ने के लिए काम आती है. लेकिन हमें क्या केवल पढ़े लिखे मशीनी लोग ही चाहिए? नहीं! हमें ऐसे युवा चाहिए जो नेतृत्व कर सकें, समाज के प्रति अपने कर्तव्य को समझें. देश और समाज से जुड़ सकें. यह काम बेहतर कहां हो सकता है? घर के बाद तो शैक्षिक परिसर ही यह कर सकते हैं. देश के बहुसंख्य परिसरों में से ऐसे युवाओं की लंबी श्रृंखला निकल रही है. जो समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं. उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम ऐसी अनेकों कहानियां हमारे आपके बीच हैं जो हमारे लिए प्रेरणा बनती हैं. ये सब किसी न किसी रूप में आज के विवेकानंद ही हैं. 

देश में 50 हजार शैक्षिक परिसर हैं, इनमें कुछेक परिसरों में ही सबका ध्यान जाता है, ऐसा क्यों है? क्योंकि वे परिसर अपनी यह जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सके. वह अपनी स्थापना के समय की प्रस्तावना भूल गए. उनकी सोच विघटनकारी हो गई. उनकी सोच में से भारतीयता निकल सी गई है. यह देश के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं, ऐसे ही लोग युवाओं के खिलाफ चुनौती हैं, इनसे निपटना होगा. ये किसके समर्थक हैं और किस लिए लड़ रहे हैं. यह अपने आस पास हुड़दंगियों, नक्सलियों को ही देखना चाहते हैं. इन्हें देश की जयकार करने वाले युवाओं से तकलीफ है, 

लेकिन राष्ट्रवादी युवा ऐसा नहीं देख सकते. कुछ लोग आजादी और क्रांति की बात करते हैं, लेकिन इन्हें इसका मतलब नहीं पता. क्रांति का अर्थ देश को तोड़ना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ भारत के उत्थान से है. देश में आज हम जहां खड़े हैं, वहीं से नए भारत का निर्माण करना होगा.

(लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत मंत्री हैं)

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)