अमृतलाल वेगड़ : चला गया नर्मदा का एक और प्रेमी

वेगड़ जी हम लेखकों की तरह नहीं थे. न ही छायावादियों जैसे स्वप्नदर्शी और स्वप्नजीवी ही. तब भी उनके पास सपने तो थे, जिन्हें वे उसी जीवन को मथकर उसी में रमकर निकालते थे.

अमृतलाल वेगड़ : चला गया नर्मदा का एक और प्रेमी

हमारे इस समय के विरल नर्मदा यात्री जीवनभर तरह-तरह से उन्हीं के पवित्र तटों की परिक्रमा करते हुए आज उन्हीं को अपनी अंतिम सांसों की आहुति देकर, उन्हीं को समर्पित हो गए. कहते हैं जीवन मृत्यु का क्षुद्र अंश है, किन्तु ऐसे भी पुरुषार्थी होते हैं जो मुहूर्त जैसे क्षण को अपने उज्ज्वल प्रकाश से इतना आलोकित कर देते हैं कि काल का दिग्विजयी अट्टाहास भी कुछ पलों के लिए हतचेत जैसा हो बैठता है. 'सौंदर्य की नदी नर्मदा' और 'अमृत्स्य नर्मदा' जैसी कालजयी कृतियों के लेखक और नर्मदा के ही लोकजीवन के रंग-बिरंगे रेखांकनकार अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा तट पर बसे अपने प्रिय गृह नगर जबलपुर (मध्य प्रदेश) को अलविदा कह दिया.

सच है कि वे भी परकम्मावासी थे, किंतु इसलिए नहीं कि किन्हीं अंधविश्वासी अर्थों में उन्‍हें मोक्ष पाना और स्वर्ग जाना था. नहीं, यह तो बिल्कुल नहीं था. ऐसे किसी मोक्ष या स्वर्ग में अगर उनका विश्वास होता तो वे शायद ही कभी, वह सब करते, जो वे जीवन भर करते रहे. हां, अपने कृत्यों से जरूर वे रंगों, रेखाओं और शब्दों को ऐसी यशस्विनी मुक्ति देने के अभिलाषी थे, जिनसे आदमी का भरोसा अब भी, इन्हीं के मार्फत सही, कायम तो रहे. वह अब भी इसी दुनया के कुछेक हिस्सों पर विश्वास कर सके, क्योंकि विश्वासहीन समय और समाज जीते भी रहें तो क्या? वह तो तब सांसों की व्यर्थ-सी परेड भर है. 

वेगड़ जी हम लेखकों की तरह नहीं थे. न ही छायावादियों जैसे स्वप्नदर्शी और स्वप्नजीवी ही. तब भी उनके पास सपने तो थे, जिन्हें वे उसी जीवन को मथकर उसी में रमकर निकालते थे. उनका यह खेल इस खूबसूरत अंदाज में हुआ करता था कि हमें जीवन से खेलने का स्वाद तो आता ही था, उसके तमाम तरह के क्रीड़ा- परिसरों को बहुरूपी-बहुरंगी अनुभूति भी विस्मित कर डालती थी. हममें से शायद ही किसी ने कभी महसूस किया और कहा हो कि वेगड़ जी का स्वभाव किन्हीं भी अर्थों में दार्शनिक और आध्यात्मिक हो, पर यह हिमाकत भी शायद ही कोई कर सके कि वे एक दृष्टिशून्य कलाकार और लेखक थे. असल में लेखक या किसी भी सृजनधर्मी में दृष्टि हो, जो सबसे अहम बात हुआ करती है. इसके लिए शब्द हो या रेखा, रूप हो या अरूप, कोई मायने ही क्या रखते हैं.

नर्मदा के तटों की परिक्रमा करते हुए, जीवन के कितने ही रूपों और रंगों की आवाजाही की भीड़ में किसी समाधिलीन साधक से, वे वह सब कुछ उसी निगाह से निहारते-परखते रहे, जैसा वह सचमुच था. यही उनकी साफगोई भी थी, ईमानदारी भी. अपना कोई रंग मनमाना, उन्होंने उस पर थोपा ही नहीं. न ही उसके रंग को अपनी कलाकारी से रंगा और पोता ही. इसलिए वह अपने स्वभाव में है वहां, भले ही कहने को यह नर्मदा के बहाने से हो.

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वे नहीं मानते थे कि जहां अमृत है, वहां विष तो नहीं ही होगा. विपरीत इसके, प्रत्येक पल इस अनुभव के साथ रहा करते थे कि विष के बिना तो अमृत की चमक ही फीकी हो जाएगी और अमृत नहीं होगा तो विष का अर्थ कैसे समझ आएगा. 

इसी तरह सौंदर्य की परिभाषा भी उनकी अपनी ही थी. वह न तो पद्मिनी जैसी थी, न जूही-चमेली जैसी. वह तो नर्मदा जैसी थी. लेकिन क्यों? लेकिन कैसे? इन सवालों के जवाब उनके प्रत्येक शब्द में हैं. इसलिए उनके शब्द न तो व्याकरण के हैं और न ही शब्दकोश के. प्रत्यक्ष जीवन में उनके बिना, उनके अर्थ समझ में ही नहीं आएंगे. तब किसी शायर ने ठीक ही कहा- ''ऐ मौजे बला कुछ इन को भी दो चार थपेड़े हल्के से, कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफां का नजारा करते हैं.'' ये पिकनिकबाज लोग हैं. तफरीह कर रहे हैं, जबकि जीवन तफरीह नहीं है. ड्राइंगरूम की बैठकबाजी नहीं है. वह तो भूख और पसीने की तालठोंक कुश्ती है. पेट और मुंह की हाथ और पैर से लाग-डांट है. सौंदर्य इसी मुठभेड़कारी पुरुषार्थ में है. अब इसी रहस्य को आप चाहें जिस वैचारिक रैपर में लपेटकर कहें या बेचें, फर्क क्या पड़ता है कि वह रैपर रामनामी है या उच्चस्तरीय सरकारी दलालों का. वेगड़ जी जैसे सर्जकों ने यह कभी किया ही नहीं. 

विदिशा से विस्थापित हो भोपाल पहुंचा तो वेगड़ जी का नाम कानों में पड़ा. देखना और सुनना फिर भी नसीब नहीं हो पा रहा था. पर मध्यप्रदेश हिंदी अकादमी, आदिवासी लोक-कला परिषद् और साहित्य-परिषदों के सचिवों से छिटपुट तौर पर उनके सुकर्मों की खबर लगती रही. ये मेरे बड़े-छोटे गुरुभाई लोग थे. साहित्य परिषद के ही एक बुलावे पर जबलपुर एक वक्तव्य देने के बहाने गया तो प्रशंसकों की भीड़ छंट जाने के बाद एक कुर्ता-पायजामा वाले, हथेलियों में छाता थामे, एक बुजुर्ग से सज्जन नम्रभाव से एकदम सामने आ गए- 'मैं अमृतलाल वेगड़.' बाप रे! मैं तो अपने ही आकाश से जैसे जमीन पर आ गया. मुझे तो कुछ सूझ ही कहां रहा था जैसे. इतना बड़ा नाम और दर्शन का सारा वैभव छिपाए हुए. तब से न जाने कितनी तो मुलाकातें हुईं. उन्होंने जबलपुर जाने पर अपने नमक का स्वाद चखाया और मैंने भी उनसे अपने घर की थाली में झूठन गिराने की प्रार्थना की, जिसे वे मान गए. भोपाल आते ही खबर करते कि- 'मैं आ गया हूं.' एकदम राजधानी के तेवर और लहजे से अलग प्रकार की भंगिमा. जैसी कि उनकी रचनाओं और कृतियों की थी.

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एक माह पहले तो वे आए थे. मिलने गया, तो तीन-साढ़े तीन का समय था, जब वे खाना लेकर अपने होटलवाले कमरे में लौटे थे. इतनी पकी उम्र. इतनी अनिश्चित-सी हो उठी दिनचर्या और फिर बगैर क्षणभर के विश्राम के फिर भारत भवन. मैंने स्नेहाधिकार से कहा भी- 'इतना एग्जर्शन.' पर वे मुस्कराते रहे. इस वक्त उनके साथ बेटे नीरज वेगड़ और उनकी पत्नी थे. नीरज पेशे से वकील और स्वभाव से छायाकार हैं. वो भी दीवानगी लिए हुए. हम सबने कई फोटोज भी खिंचवाए. पर जबलपुर लौटते ही सांस ने नए सिरे से धोखा देना शुरू किया. वे फिर तो अस्पताल भी गए, लौटे भी, शब्दों से भेंट-भाट भी शुरू हुई, लेकिन मौत भी जहां-तहां से लुकाछिपी खेलती ही रही. 

नीरज से पैदा हुई आत्मीयता से हाल-चाल भी लेता रहा. सोचता ही रहा कभी जाकर मिल आऊंगा. पर यह सोचना निकम्मापन दिखाता रहा. और वे आज चले ही गए. कविगुरु रवीन्द्रनाथ के शांतिनिकेतन से चित्रकला की शिक्षा अर्जित कर, किसी दीवानगी ने उन्हें नर्मदा के सौंदर्यपाश से कुछ इस तरह बांधा जैसे कि मानसकार राम से बंधे रहे. क्या मजा है कि भारत के एक महान चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन माधुरी दीक्षित पर तो अमृतलाल वेगड़ उनसे एकदम आगे-उसी नर्मदा पर रीझे, जिस पर कभी आदि शंकराचार्य रीझे थे. नर्मदा का यह सौंदर्य शायद ऐसे ही मन और ऐसी ही आंखों से निहारा जा सकता है.

(डॉ. विजय बहादुर सिंह, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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