कोमारम भीम को मुस्लिम टोपी में दिखाकर क्या साबित करना चाहते हैं राजामौली?

बाहुबली सीरीज के बाद एक व्यक्ति के लिए पूरे भारत का सम्मान बढ़ गया और वो व्यक्ति था सीरीज का डायरेक्टर एसएस राजामौली (Rajamouli) . स्पेशल इफैक्ट्स ही नहीं, भारत की संस्कृति का इतना शानदार प्रस्तुतिकरण इससे पहले किसी मूवी में देखने को नहीं मिला था.

कोमारम भीम को मुस्लिम टोपी में दिखाकर क्या साबित करना चाहते हैं राजामौली?

नई दिल्ली: बाहुबली सीरीज के बाद एक व्यक्ति के लिए पूरे भारत का सम्मान बढ़ गया और वो व्यक्ति था सीरीज का डायरेक्टर एसएस राजामौली (Rajamouli) . स्पेशल इफैक्ट्स ही नहीं, भारत की संस्कृति का इतना शानदार प्रस्तुतिकरण इससे पहले किसी मूवी में देखने को नहीं मिला था. अब वही राजामौली पूरे भारत में ही निशाने पर आ गए हैं. 

‘आरआरआर’ के टीजर से लोग भड़के
इसकी वजह बना है उनकी नई मूवी ‘आरआरआर’ का टीजर, आर आर आर मतलब राइज, रोर और रिवोल्ट. दरअसल इस मूवी के टीजर में हैदराबाद के निजाम को सालों तक घुटनों पर लाने वाले, एक दशक से ज्यादा उसके राज्य के जंगल में अपनी सत्ता चलाने वाले आदिवासी नायक कोमारम भीम (Komaram Bhima) को ताबीज के साथ साथ एक मुस्लिम टोपी (Muslim cap) में दिखा दिया गया है, इससे लोग भड़क गए हैं.

 सीताराम राजू और कोमारम भीम के जीवन पर बनी है फिल्म
कहा जा रहा है कि राजामौली की ये मूवी उस दौर के दो बड़े आदिवासी नेताओं अल्लूरी सीताराम राजू और कोमारम भीम के संघर्ष के इर्दगिर्द रची गई है. हालांकि अल्लूरी सीताराम राजू और कोमारम भीम के उम्र में तीन चार साल का ही फर्क रहा होगा, लेकिन दोनों के बीच की दूरी करीब 500 किमी थी. ऐसे में कुछ साल एक ही वक्त में दोनों ही आदिवासियों के लिए लड़ रहे होंगे. जहां सीताराम राजू मद्रास प्रेसीडेंसी में विशाखापत्तनम के आसपास के जंगलों में 1924 तक सक्रिय रहे, बाद में अंग्रेजों ने उन्हें पेड़ से बांधकर मार दिया, वहीं कोमारम भीम 1940 तक निजाम के राज्य में आदिलाबाद आदि के जंगलों में सक्रिय रहे. दोनों का एक ही उद्देश्य था, आदिवासियों की जिंदगी, उनके रीति रिवाजों, जंगल में उनके अधिकारों में उन्हें किसी की दखल पसंद नहीं था.

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दोनों ने आदिवासियों के लिए उठाई थी आवाज
अंग्रेज ज्यादा से ज्यादा कर पाने के लिए खेती की पद्धति बदल रहे थे, जबकि इससे पहले आदिवासियों के जंगल पर अधिकार को कभी किसी ने चुनौती नहीं दी थी. जब बल प्रयोग हुआ तो अल्लूरी सीताराम राजू ने हथियार उठा लिए और कई अंग्रेजों को मार डाला, हालांकि अरसे तक वो गांधीजी के असहयोग आंदोलन से भी जुड़े रहे. माना जा रहा है कि उनका रोल रामचरण तेजा ने किया है. जबकि कोमारम भीम का रोल जूनियर एनटी रामाराव के हिस्से में गया है.

निजाम ने छीन लिए थे आदिवासियों के अधिकार
कोमारम भीम उस वक्त 15 साल के थे, हैदराबाद स्टेट में उन दिनों आसफजाही निजाम का राज चलता था. निजाम ने लगभग हर जागीर में अपने जमींदार नियुक्त कर रखे थे. कोमारम भीम को विद्रोह के बीज अपने पिता से विरासत में  मिले थे. आदिवासी हमेशा से जंगल पर अपना अधिकार समझते आए हैं. लेकिन निजाम ने आदिवासियों से कई तरह के कर लेने शुरू कर दिए और कई नए तरह के प्रतिबंध लगा दिए. इसका विरोध कोमारम भीम के पिता ने किया तो उन्हें जान से हाथ धोना पड़ा. कोमारम भीम को बड़ा आघात पहुंचा, उसने अपना गांव छोड़ दिया और परिवार समेत दूसरे गांव चला गया. लेकिन कसम खा ली कि निजाम शाही के खिलाफ जल, जंगल, जमीन और आजादी की जंग अंजाम तक लड़ी जाएगी.

कोमारम भीम ने बनाया आदिवासियों का दल
कोमारम ने आदिवासी युवाओं का एक दल बना लिया और उन्हें गोरिल्ला छापामार पद्धति से युद्ध का कौशल सिखाने लगा. इधर अब्दुल सत्तार नाम के निजामशाही जागीरदार ने जंगल में आदिवासियों के पशुओं के चरने तक पर टैक्स लगा दिया. इतना ही नहीं वनों में आदिवासियों के बीच प्रचलित झूम खेती पर भी टैक्स मांगा. जो अनाज वो उगाते थे, उसमें से भी हिस्सा मांगा जाने लगा. 

निजाम के सैनिक लोगों को करते थे परेशान
आदिवासियों ने कभी भी जंगल की किसी भी चीज पर टैक्स नहीं दिया था, वो हमेशा उस पर अपना अधिकार समझते थे. उनकी कमाई का कोई साधन नहीं था, भूखे मरने की नौबत आ गई. कर ना देने पर धर्मपरिवर्तन के लिए लालच और बहू बेटियों को उठाने की धमकियां मिलने लगीं. जागीरदार के सैनिक अक्सर महिलाओं के साथ बदसलूकी करने लगे.

कोमारम भीम ने निजाम के खिलाफ लड़ाई शुरू की
ऐसे में कोमारम भीम ने उनके खिलाफ गोरिल्ला वॉर शुरू कर दी, शुरूआत हुई सिद्दीकी नाम के एक जमींदार से. उसे मारकर पेड़ पर लटका दिया गया. भीम ने ऐलान कर दिया कि अब से जल, जंगल और जमीन पर कोई टैक्स नहीं दिया जाएगा. जो भी जमींदार इसे जबरन वसूलने की कोशिश करता, उसका नाम कोमारम भीम के पास पहुंचा दिया जाता और कोमारम उसे अपने तरीके से सजा देता. जमींदारों और निजाम की पुलिस के बीच मौत का खौफ फैल गया. कोमारम आदिवासियों के रॉबिनहुड की तरह मशहूर होने लगा. एक एक करके ना जाने कितने जमींदार और पुलिसवालों को मौत के घाट उतार दिया गया.

12 साल तक निजाम की फौज को दी टक्कर
इतनी बड़ी निजाम फौज से उनके ही इलाकों में 12 साल तक टकराना आसान नहीं था, कोमारम भीम की बेटी का अपहरण कर लिया गया, उसको धर्मान्तरित करके मुसलमान बना दिया गया. एक दिन एक गद्दार की सूचना पर 9 अक्टूबर 1940 को चांदनी रात के दिन बिना मशाल जलाए निजाम की फौज ने उस पर हमला बोल दिया, मरते दम  तक भीम ने निजाम की फौज से लोहा लिया, लेकिन फिर बच नहीं पाए.

भीम की मौत के बाद हैदराबाद रियासत में हंगामा
भीम की मौत के बाद पूरे जंगल में, हैदराबाद रियासत में हंगामा हो गया, भीम की लोकप्रियता शिखर पर थी. हैदराबाद रियासत की आसफशाही निजाम के शासन से आजादी के लडने वालों के लिए कोमारम भीम एक बड़ा नाम था. उनके जाते ही कई तरह के विद्रोह शुरू हो गए. निजाम के पसीने छूट गए, उसको इतने बड़े विद्रोह का अनुमान नहीं था. उसने उनकी मौत के फौरन बाद लंदन यूनीवर्सिटी में एंथ्रोपलॉजी के ऑस्ट्रियाई प्रोफेसर क्रिस्टोफ को आदिलाबाद इलाके में आदिवासियों की समस्या की स्टडी करने भेजा. वो उन्हीं के बीच रहने लगा, उसने गोंड आदिवसियों की भाषा सीखी, उनकी समस्याऐं समझीं, इतनी ही नहीं उनको लेकर एक किताब भी लिख डाली. निजाम ने भी उसकी रिपोर्ट के बाद कई रियायतें दीं, आदिवासियों के कई मामलों से खुद को दूर कर लिया. इधर सरकार ने भी आजादी के बाद आदिलाबाद जिले में 400 करोड़ की लागत से आदिवासियों के लिए 4500 एकड़ पर एक प्रोजेक्ट शुरू किया और एक बांध बनाया.

भीम को भगवान की तरह पूजते हैं आदिवासी
आज भी जब भी हैदराबाद की निजाम के शासन से मुक्ति की बात होती है तो विद्रोह की पहली आवाज के तौर पर तो कोमारम भीम को याद किया ही जाता है, पूरी दुनियां को जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के प्रति जागरूक करने और ये नारा अमर करने में भी कोमारम भीम का योगदान कोई नकार नहीं सकता. उनको आदिवासी उसी तरह भगवान की तरह पूजते हैं, जैसे कि बिरसा मुंडा को. आप टीजर देखेंगे तो पाएंगे कि भीम के रोल में जूनियर एनटीआर एक बड़ा सा भगवा झंडा फहराता है, जिस पर हिंदी में लिखा है जल, जंगल, जमीन और तेलुगू टीजर में भी ये हिंदी में लिखा दिखता है, साफ है कि राजामौली की नजर हिंदी दर्शक पर है.

भीम को मुस्लिम टोपी पहनाना लोगों को रास नहीं आया
ऐसे में जब कोमारम भीम ने पूरी लड़ाई ही निजाम और उसकी रजाकार फौज के खिलाफ लड़ी हो, निशाने पर निजामशाही मुसलमान हों तो ये बात किसी को सहन नही हो रही कि कोमारम भीम मुस्लिम टोपी पहने थे, या फिर इस्लाम ग्रहण कर लिया था, वो भी तब जबकि उनकी बेटी के साथ इतनी बदसलूकी हुई थी.

इतिहास में कहीं भी भीम के मुस्लिम बनने का जिक्र नहीं
लेकिन फिर राजमौली को क्या जरुरत पड़ गई कि वो कोमारम भीम को एक मुस्लिम टोपी में दिखाए? लोग तर्क दे रहे हैं कि टीजर में पहले भीम आंखों में काजल लगाता है, फिर मुस्लिम कैप लगाता है, उससे लगता है कि वो मुस्लिम का वेश बदल रहा है ना कि वो धर्मान्तरित होकर मुसलमान बना है. तो वो ये जान लें कि अब तक कोमाराम भीम की दो आधिकारिक जीवनियां मानी जाती हैं, एक भुख्या वेंकटश्वरेलु ने और दूसरी लिंगम राजू ने लिखी है और दोनों में ही इस बात का कई जिक्र नहीं है कि कोमारम भीम ने इस्लाम अपनाया या कभी किसी का वेश भी बदला. वैसे इस पूरे विवाद पर टीम आरआरआर, एक्टर्स और डायरेक्टर राजामौली सभी खामोश हैं, जबकि 22 अक्टूबर को भीम की 119वीं जयंती के दिन इस टीजर को लांच किया गया था.

क्या राजामौली ने जानबूझकर शुरू किया है विवाद
गोंड आदिवासियों को भी कोमाराम भीम के सर पर मुस्लिम टोपी रखना नागवार गुजरा है, गोंड आदिवासियों का एक संगठन इसके खिलाफ कोर्ट चला गया है. सो लगता ये भी है कि कहीं ना कहीं राजामौली इस विवाद का फायदा उठाना चाहते हैं, जितनी हिंदू मुस्लिम विवाद में मूवी आएगी, उतना ही फायदा है. सो हो सकता है कि ये सीन खुद राजामौली ने ही अपने मन से गढ़ दिया हो, इसके 2 फायदे हैं, एक तो तेलंगाना और खासतौर पर हैदराबाद, आदिलाबाद इलाके में मुस्लिम युवाओं को मूवी से जोड़ने का फायदा मिलेगा और दूसरे हिंदू- मुस्लिम विवाद में फंसी तो मुफ्त की चर्चा होगी.

फिल्म पर हो सकता है बवाल
लेकिन अगर वाकई में ऐसा नहीं हुआ और राजामौली ने इतिहास को तोड़मरोड़ के कोमारम भीम को इस्लाम में धर्मान्तरित दिखाया तो बवाल होना तय मानिए.  

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