मैं पुरुष दिवस भला क्यों मनाऊं?

पुरुष दिवस को मनाए जाना इतना सहज क्यों नहीं लगता है जितना कि बाकी दिवस? यही बड़ा सवाल है.

मैं पुरुष दिवस भला क्यों मनाऊं?
अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के अवसर पर पैदा हुई विचारों की एक श्रंखला. (फाइल फोटो)

इस सवाल के कई मायने हैं. पहला तो बहुत ही आम सा है, लेकिन गहरा भी हो सकता है. आम इसलिए कि इसे “मैं ये काम क्यों करूं” वाली मानसिकता की श्रेणी में डाला जा सकता है, गहरा इसलिए कि यह पुरुष दिवस के औचित्य पर ही सवाल है और इसके कई आयाम निकल के आएंगे, जैसे  यह सवाल उठाने की मेरी योग्यता, इस सवाल की दुनिया के बाकी मुद्दों के मुकाबले चर्चा करने की जरूरत वगैरह वगैरह.

अब दूसरे मायने पर आते हैं. वह यह कि मुझे नहीं मालूम कि पुरुष दिवस क्यों मनाया जाता है? क्या मैं यह जानना भी चाहता हूं? तो ईमानदारी से कहूं तो मैंने यह भी नहीं सोच पा रहा हूं कि मुझे जानना चाहिए या नहीं.

क्या पुरुषों को भी दिवस की जरूरत है?
तीसरा, क्या पुरुषों को अपना दिवस मनाना चाहिए? जरा इस सवाल का पोस्टमार्टम करें. क्या मेरा जवाब सारे पुरुषों का प्रतिनिधित्व करता है या फिर ये मेरी वयक्तिगत आपत्ति है. या कि एक तथाकथित प्रबुद्ध(?) होने के नाते मैं यह सवाल उठाने का स्वतः अधिकारी हो जाता हूं. या मैं पुरुष दिवस को मनाने को पुरुषों के नैसर्गिक स्वाभिमान (जो पुरुष होने के नाते पुरुषों में अधिक होता है) के विरूद्ध मानता हूं. यानि मैं सीधी चुनौती दे रहा हूं कि दिवस मनाना पुरुषों की जरूरत कब से होने लगी? हम महिला दिवस (महिलाएं मुझे क्षमा करें) महिला सशक्तिकरण के लिए मनाते हैं  (यहां उन महिलाओं की बात हो रही हैं जिन्हें पता तक नहीं है कि महिला दिवस जैसी कोई चीज भी होती है). शांति दिवस, स्वतंत्रता दिवस, मदर्स डे, आदि इन सबके अपने-अपने संदेश हैं, सामाजिक संदेश हैं. सो अपना औचित्य है ,लेकिन पुरुष तो जिम्मेदारी का दूसरा नाम है न, वह समस्याओं का समाधान देने के लिए बना है. वह ‘अमूमन’ अपनी समस्या का समाधान मांगने के लिए नहीं बना है. उसका तो पौरुष ही समाधान देने में है, मांगने में नहीं. वगैरह वगैरह. 

उत्सव को दिन में क्या समेटना? 
चौथा, इसका सांस्कृतिक पक्ष. मैं जन्म से हिंदू हूं लेकिन भारतीय संस्कृति के परिपेक्ष्य में बात करूंगा. हम भारतीय उत्सव मनाते हैं दिन नहीं. यह वाक्य मुझे बहुत ही अच्छा लगा था इसलिए मैं इसे सही जगह लगाने का मौका ढूंढ रहा था. सो मिल गया. अब उत्सव को दिन में क्या समेटना? तो कैसा पुरुष दिवस? हमारे यहां तो विवाह भी 15-15 दिन के उत्सव हुआ करते थे. जिन्हें देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त न हो सका, मैंने सिर्फ अपने माता पिता से सुना था. आज तो दिल्ली जैसे शहर में कई (सभी नहीं) शादियां आठ से बारह घंटे में समाप्त होती देखी जा सकती हैं. तो फिर पुरुष उत्सव या पुरुष दिवस? मेरी संस्कृति और मेरे धर्म में, दोनों से कई गुना बेहतर चीजें है तो....

पुरुषत्व के आत्मविश्लेषण का अवसर?
पांचवा, समकालीन पक्ष देखें, आज समय इतना तेजी से भाग रहा है कि हम खुद को देख ही नहीं पा रहे हैं. जन्मदिन भी जब तक दूसरे बधाई न दें तो सूना सा लगता है. लेकिन मैं जन्मदिन को एक आत्मविश्लेषण के अवसर के तौर पर देखता हूं कि “उम्रे दराज में तजुर्बा के एक साल का इजाफा मुझे कैसे बेहतर बना सका?” ये मेरी व्यक्तिगत सोच हो सकती है और मैं इसे किसी के लिए भी नियम के तौर पर नहीं देखना चाहता. लेकिन क्या पुरुष दिवस भी पुरुषों के लिए उनके पुरुषत्व के आत्मविश्लेषण का अवसर है. क्या ये बिलकुल वैसा ही होगा जैसे मदर्स डे पर मेरी मां अपने मातृत्व का विश्लेषण करें. 

क्या वाकई हम इतने व्यस्त हो गए हैं, जिंदगी की भागदौड़ में इतने खो गए हैं कि अब दिवस हमें याद दिलाएंगे कि हमें प्रेम करना है या मेरे जीवन में, मेरे दोस्तों या मेरे पिता का क्या महत्व है? या कि जीवन के उत्सव प्रवाह में एक खास दिन, एक विशेष को, संबंध या व्यक्ति या कुछ और! 

जागरुकता फैलाने के लिए?
छठा, बाकी ज्यादातर दिवसों की तरह ही जागरुकता फैलाने के लिए (जैसे विश्व पर्यावरण दिवस, या स्वास्थ्य) कि पुरुषों के क्या फर्ज हैं और पुरुषों के प्रति क्या फर्ज हैं. लेकिन मुझे इसकी जरूरत नहीं लगती क्योंकि मैं तो पहले ही जागरुक हूं या पुरुष, अपने पुरुष होने के प्रति जागरुक तो होता ही है (क्या वाकई). और कौन से उसके अधिकारों में कमी आ गई है? सामाजिक रूप से पुरुष मूलतः सशक्त है, बेहतर स्थिति में है. तो पुरुष दिवस क्यों?

 सवाल तो उठ गया!
सातवां, मैं एक जमाने में विज्ञान का विद्यार्थी रहा था. सो मुझे अपनी नैसर्गिक (मानव होने के नाते) जिज्ञासा को पोसने की सलाह दी जाती थी और जाहिर चीजों पर सवाल लगाने के लिए आदर्श रूप से प्रेरित किया जाता था. यह अलग बात है कि मैं अपने माता-पिता और शिक्षकों से पूछने से डरता था. लेकिन सवाल पूछने की लालसा जैसे बनी रही. सो मेरा पुरुष दिवस पर सवाल. क्यों? अब इसका वैज्ञानिक उत्तर तो खोज का विषय है? सवाल मैंने उठा दिया. अब मैं न तो वैज्ञानिक हूं, न ही विज्ञान का छात्र रहा. लेकिन सवाल तो उठ गया.

जाते जाते.. 
अंत में, मेरा मतलब इस लेख के अंत से है, इस सवाल की ही चीरफाड़ करते हैं. “मैं पुरुष दिवस क्यों मनाऊं”. ‘मैं’, ‘मैं’ ही क्यों. ‘मैं’ व्यक्तिगत होता है. फिर ‘मैं’ में अहम का पहलू! उपरोक्त किसी बिंदु में आपको इस ‘मैं’ की भूमिका मिल जाएगी. इसके बाद ‘पुरुष’ का अपना एक किरदार होता है जो खुद को कभी इतना कमतर नहीं मान सकता कि उसका दिवस मनाया जाए. यह ‘पुरुष’ की मूल रूप से ताकत और कमजोरी दोनों है. फिर ‘दिवस’ संसार में कितने अच्छे और बुरे दिवस हैं (यकीन मानिए, हैं) उनके बीच पुरुषों का भी दिवस! बहस अंतहीन हो सकती है. उसके बाद ‘क्यों’ दुनिया सबसे कठिन सवाल और काम न करने की सबसे बड़ी ढाल, लेकिन विचारकों और चिंतकों के लिए गंभीर. और आखिर में ‘मनाऊं’ मतलब उत्सव या जागरुकता अभियान जैसी कोई चीज. बस इतना सा ही चिंतन रहा मेरा इस विषय पर बाकि फिर कभी!

डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)