ब्लू व्हेल गेम को बैन करने में सरकार विफल क्यों...

ब्लू व्हेल गेम को बैन करने में सरकार विफल क्यों...
इस गेम को बैन करने के लिए कानूनी प्रावधानों के तहत कोई औपचारिक आदेश पारित नहीं किया गया है.

विराग गुप्ता

ब्लू-व्हेल समुद्र के किनारे पर मरने के लिए आती है, उसी तर्ज पर इंटरनेट की दुनिया में ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’गेम से बच्चों को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया जाता है. कई बच्चों के मौत के मुंह में जाने से बचने के बावजूद इस ऑनलाइन गेम की चपेट में आकर मुम्बई और पश्चिम बंगाल में दो बच्चों ने सुसाइड कर लिया. मीडिया की खबरों की मानें तो कई राज्य सरकार तथा अभिभावकों में फैलते असंतोष के बाद सरकार ने इस गेम पर प्रतिबन्ध लगा दिया. परन्तु आईटी मंत्रालय द्वारा 11 अगस्त को लिखे पत्र से यह साफ है कि सरकार ने इस गेम को बैन करने के लिए कानूनी प्रावधानों के तहत कोई औपचारिक आदेश पारित नहीं किया है.

बैन करने के लिए सरकार द्वारा कानूनी आदेश क्यों नहीं?

सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 (आईटी एक्ट) की धारा 69-ए में सरकार को आपत्तिजनक कंटेन्ट ब्लाक या बैन करने का अधिकार है. ब्लू व्हेल की शुरुआत 4 साल पहले रूस और यूरोप में वीके नामक सोशल मीडिया के माध्यम से हुई थी. पर भारत सरकार ने वीके कम्पनी को प्रतिबन्ध के लिए पत्र भेजा ही नहीं. यदि यह गेम गैर कानूनी है तो फिर इसे बैन करने के लिए सरकार ने आईटी एक्ट के तहत कानूनी आदेश क्यों नहीं पारित किया?

अमरीकी सोशल मीडिया कंपनियों की बजाय भारतीय कंपनियों को पत्र क्यों?

सरकार द्वारा गूगल इंडिया, माइक्रोसाफ्ट इंडिया, याहू इंडिया, फेसबुक समेत छह कंपनियों को बगैर पते के पत्र भेजा गया है. खुद को विज्ञापन प्रतिनिधि मानते हुए ये कंपनियां भारत में व्यापार और कंटेन्ट की कोई कानूनी जवाबदेही नहीं लेतीं. कम्पनियों की इस दलील को सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के सम्मुख केएन गोविन्दाचार्य मामले में माना था. भारतीय कम्पनियां अमेरिकी कम्पनियों की 100 फीसदी सहायक कम्पनी होने के बावजूद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को भारतीय कम्पनियों से सूचनाएं और सहयोग नहीं मिल पाता. फिर क्या वजह रही कि इस मामले में केन्द्र सरकार ने अमेरिका की मुख्य कंपनियों को निर्देश देने की बजाए भारत की कंपनियों को पत्र लिखा?

इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (आईएसपी) को निर्देश क्यों नहीं?

सरकार द्वारा लिखे गये पत्र से स्पष्ट है कि इस जानलेवा गेम में एडमिनिस्ट्रेटर द्वारा 50 स्टेप्स के माध्यम से बच्चों को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया जाता है. इस गेम पर प्रतिबंध की आशंका को देखते हुए पहले ही कई प्रोक्सी यूआरएल या आईपी एड्रेस बना लिये गये, जिन पर अब आईएसपी के बगैर लगाम नहीं लगाई जा सकती. सरकार द्वारा आईएसपी को इस बारे में दिशा-निर्देश नहीं दिये जाने से, ब्लू-व्हेल जैसे जानलेवा गेम्स पर कैसे रोक लगेगी?

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केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी को सरकारी पत्र का संज्ञान नहीं

आईटी मिनिस्ट्री ने 11 अगस्त के पत्र को महिला और बाल विकास मंत्रालय को भी भेजा था. इसके बावजूद तीन दिन बाद केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने ब्लू-व्हेल गेम पर प्रतिबन्ध के लिए ट्वीट कर दिया. इंटरनेट में इस गेम में प्रतिबंध कैसे सफल होगा, जब केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों में ही आपस में कोई समन्वय नहीं है.

इंटरनेट में गैर-कानूनी और जानलेवा गेम्स पर प्रतिबन्ध लगे

19 करोड़ से ज्यादा लोग भारत में मोबाइल गेम्स से जुड़कर इंटरनेट कम्पनियों को खासा मुनाफा देते हैं. केन्द्र सरकार के पत्र में ब्लू-व्हेल जैसे अन्य जानलेवा गेम्स पर रोक की बात कही गई है. गांवों के बच्चे गोरखपुर जैसे सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ रहे हैं तो दूसरी ओर शहरी बच्चे मोबाइल गेम्स की दुनिया में तबाह हो रहे हैं. भारत में 13 साल से कम उम्र के 65 फीसदी बच्चे गैर-कानूनी तरीके से सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर जुड़कर रेव-पार्टी, पोर्नोग्राफी, नशेबाजी और आत्मविकृति का शिकार हो रहे हैं. सरकार के पत्र से यदि ब्लू-व्हेल गेम्स पर रोक लग जाये तो फिर अन्य जानलेवा गेम्स और गैर-कानूनी ग्रुप बैन करने के लिए केन्द्र सरकार सोशल मीडिया कंपनियों पर दबाव क्यों नहीं बनाती?

(लेखक @viraggupta संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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