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संसद का शीत सत्रः जाल में मोदी, झमेले में जनता

संसद का शीत सत्रः जाल में मोदी, झमेले में जनता

26 नवंबर से संसद का शीत सत्र शुरू होने जा रहा है। 1949 में इसी दिन संविधान को अपनाया गया था। लोकसभा में शानदार बहुमत के साथ सत्ता संचालन की जिम्मेदारी लिए मोदी सरकार करीब डेढ़ साल बीतने के बावजूद जमीनी तौर पर ऐसा कोई मील का पत्थर स्थापित नहीं कर पाई जिसे बदलाव की नींव माना जा सके। जीएसटी, भूमि बिल अब भी संसद से हरी झंडी के इंतजार में हैं। नेताओं के शर्मनाक रवैये की वजह से कछुआ चाल से चल रही संसद की कार्यवाही को देखकर लगता है इन विधेयकों को कानून की शक्ल अख्तियार करने में अभी लंबा वक्त लगेगा। मोदी सरकार को राज्यसभा में बहुमत मिलने की निकट भविष्य में कोई उम्मीद नजर नहीं आती और देशहित पर पार्टीहित हावी होने के चलते विपक्ष से किसी प्रकार के रचनात्मक सहयोग की अपेक्षा करना निरर्थक है।

सत्र के शुरुआती दो दिन संविधान रचयिता बाबा साहेब अंबेडकर के सम्मान में विशेष बैठक होने वाली है। कम से कम इन दिनों अच्छे से संसद चलने की उम्मीद की जा सकती है। मोटे तौर पर देखा जाए तो इस वक्त लोकसभा में करीब आठ और राज्यसभा 11 विधेयक लंबित हैं। मॉनसून सत्र में हम तमाम नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ते देख चुके हैं। संसद होती ही इसलिये है कि बहस के जरिये तर्क-वितर्क किया जाए ना कि स्थगन प्रस्ताव और वॉक आउट के जरिये कार्यवाही ठप की जाये और बहस से बचा जाए। बीते मॉनसून सत्र में ललित मोदी प्रकरण, व्यापम घोटाला और विवादित बयानों पर तकरार के चलते जनता के 250 करोड़ रुपये बर्बाद करने वाले नेताओं के तेवर देखकर शीतकालीन सत्र में भी कामकाज होने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है। 'असहिष्णुता' को लेकर विपक्ष फिर से संसद में हंगामा कर सकता है।

ऐसे में शीत सत्र में संसद में फिर से वही सब देखने को मिल सकता है...शोर मचाते, कागज फाड़ते और तख्तियां लहराते सांसद। बात-बात पर इस्तीफे की मांग करती आवाजें। वैसे, इस्तीफे की मांग तो भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा निभाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण परंपरा रही है, ये अलग बात है कि नैतिकता के तकाजे पर इस्तीफे के उदाहरण बेहद कम देखने को मिले हैं। फिलहाल, बिहार चुनाव में मोदी नेतृत्व की करारी हार से विपक्ष के भी हौंसले बुलंद हैं। चुनाव परिणाम आने पर नीतीश कुमार के काबिलेतारीफ व्यक्तित्व को सामने रख जीत दर्ज करने लालू और राहुल के विजय भाषण को देखकर किसी तरह के रचनात्मक और सार्थक कर्त्तव्य निर्वहन के आसार नजर नहीं आते। हालांकि सियासी गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने राहुल गांधी से मुलाकात कर जीएसटी पर जेटली की योजना का स्वागत किया है। लेकिन यहां 'टर्म्स एंड कंडीशन' यह है कि इसके लिये जेटली को दोनों सदनों में विपक्ष के नेताओं मल्लिकार्जुन खड़गे और गुलाम नबी आजाद से मिलना पड़ेगा। मतलब यहां मसला 'इगो' का है।

दूसरी ओर संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू और मोदी सरकार का ‘सीपीयू’ कहे जाने वाले वित्त मंत्री अरुण जेटली विरोधियों से बातचीत कर मसलों का हल निकालने की जुगत में लगे हैं, लेकिन बात करने से हर जगह बात कहां बनती है। क्योंकि इन्हीं में से कुछ सुधारों मसलन विदेशी निवेश, भूमि अधिग्रहण कानून, जीएसटी को यूपीए के कार्यकाल में उन्होंने खुद नकार दिया था। फिर संशोधन और समझौते के फेर में सारे मसौदे घूम-फिरकर करीब-करीब वहीं लौट आए हैं, जहां से चले थे। ऐसे में अब जंग जनता के लिये नहीं बल्कि सुधारों के श्रेय को लेकर हो रही है। 

जनतंत्र का अपमान करने वाली हरकतों के पीछे सिर्फ विपक्ष ही नहीं काफी हद तक सत्ता पक्ष भी जिम्मेदार है। दरअसल, नरेंद्र मोदी की लहर में बड़ी मात्रा में ऐसे प्रदूषक भी संसद में घुस आए हैं, जिन्हें ना तो संसद की मर्यादा की चिंता है और ना देश की जनता की। उन्हें सिर्फ इस बात की चिंता है कि कहीं बयानबाजी में पिछड़ने के चलते कहीं वे मीडिया वैल्यू कम ना कर बैठें, जिसमें सिर्फ सुर्खियां बटोरने से मतलब है। मीडिया भी ऐसे नेताओं को चुन-चुनकर रखता है, जिनके मुंह से कुछ ना कुछ छलकता ही रहता है। फिर छलकी हुई चंद बूंदों से 'जाम का इंतजाम' होने में देर कहां लगती है।

अच्छा होता स्वच्छ भारत अभियान के तहत इन ‘हंगामा रस’ के विशेषज्ञों की भी सफाई कर दी जाती। काश, बदलाव और सुधार की बात करने वाले मोदी सभी राजनीतिक दलों के विवादित बयान देने वाले नेताओं पर मौन रहने के बजाय कोई कदम उठाते। चुप्पी तोड़ने का मतलब यह नहीं कि ट्विटर या संसद के माध्यम से प्रधानमंत्री पारंपरिक रूप से निंदा करे, बल्कि ऐसी ठोस कार्रवाई मसलन, विवादित बयानों पर कानून बना दें जिससे बार-बार की विवाद, खेद, सफाई, खंडन और माफी की परंपरा पर लगाम लग सके। क्योंकि बेहद उम्दा शख्सियत माने जाने वाले डॉ. मनमोहन सिंह को भी अपनी चुप्पी के चलते ही सबसे ज्यादा आलोचना झेलनी पड़ी थी। शायराना अंदाज में एक बार उन्होंने कहा था- 'हजारों जवाबों से मेरी खामोशी अच्छी... ना जाने कितने सवालों की आबरू रख ली।' लेकिन इसी खामोशी से उनकी आबरू को ऐतिहासिक रूप से घायल कर दिया है। 

बहरहाल, देश की जनता को इंतजार है जमीनी सुधार और विकास का, ना कि 'असहिष्णुता' और विवादित बयानों पर हंगामे का। किसानों को इंतजार है कृषि संबंधी मसलों के समाधान का, ना कि सिर्फ मुआवजे के इंतजार में जान गंवाने या नेताओं के बेहूदा बयानों को सुनने का। जिस युवा शक्ति के नाम पर मोदी देश को महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर बताते हैं उसे इंतजार है ऐसी सम्मानजनक नौकरी का; जिसका वेतन किसी को बताते समय उन्हें शर्म महसूस ना हो, ना कि योजनाओं और संस्थाओं के पुनः नामकरण के अभियान का।