Zee Analysis : BJP से रिश्ता तोड़ने से शिवसेना को कितना फायदा!

2014 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा का गठबंधन टूट गया था और दोनों पार्टियों ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा था.

Zee Analysis : BJP से रिश्ता तोड़ने से शिवसेना को कितना फायदा!

भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का 28 साल पुराना गठबंधन टूटने के संकेत मिल रहे हैं. यह माना जाता है कि गठबंधन राजनीतिक कारणों से ज्यादा सांस्कृतिक और भावनात्मक कारणों से हुआ और इस साथ की वजह से भाजपा को महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार बनाने में कभी संकट नहीं आया व अन्य राज्यों में भी दोनों दलों को राजनीतिक लाभ मिलता रहा है. लेकिन जैसे-जैसे नरेंद्र मोदी के नेतृत्त्व में भाजपा का राष्ट्रीय स्तर पर उदय हुआ और पार्टी जमीनी स्तर पर भी मजबूत हुई, वैसे-वैसे भाजपा में अपने दम पर किसी सहयोगी दल को मजबूत होने का मौका देने की सोच कम हुई है. इसी सोच का नतीजा है कि शिवसेना ने लगभग निर्णायक तरीके से घोषणा की है कि वह अब इस गठबंधन से अलग होकर 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी. यह चार साल में दूसरी बार है जब शिवसेना ने अपने बूते पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, और शिवसेना के कड़े तेवर के बावजूद स्थिति आने वाले दिनों में फिर बदल जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

इससे पहले 2014 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा का गठबंधन टूट गया था और दोनों पार्टियों ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा था. बाद में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, जबकि शिवसेना को एक महीने तक विपक्ष में बैठना पड़ा था और उसके बाद उसी साल शिवसेना ने भाजपा से हाथ मिला लिया था. लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने के बाद भाजपा महाराष्ट्र में गठबंधन के छोटे सहयोगी की भूमिका निभाने में असहज थी. इसके बाद पिछले साल हुए बृहन्मुंबई नगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव में शिवसेना की सीटें ज्यादा होने के बावजूद भाजपा का कद बढ़ा.

शिवसेना का विस्तार और राजनीतिक विकास कठोर हिंदुत्व के दम पर हुआ, इसकी स्थापना ही मुंबई और महाराष्ट्र में स्थानीय लोगों व हिंदू समुदाय का वर्चस्व बनाए रखने के आधार पर हुई, और एक मजदूर संगठन से बढ़कर सांस्कृतिक व सामाजिक मुद्दों को समर्थन देते हुए यह कुछ राज्यों में एक असरदार राजनीतिक ताकत बन गई . शिवसेना के राजनीतिक व्यवहार में उग्र हिंदुत्व मूलतः तो राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का सामना करने के लिए सामने आया, अन्यथा शिवसेना और भाजपा के बीच कोई विशेष अंतर्विरोध नहीं थे. इसके चलते जैसे जैसे शिवसेना का रुख उग्र होता गया, वैसे ही भाजपा को उसका प्रतिरोध करना ही पड़ा. लेकिन क्या आज यह इतनी मजबूत हो गई है कि महाराष्ट्र में भाजपा के बिना, अपने दम पर प्रदेश के चुनाव में प्रभावशाली प्रदर्शन कर पाएगी?

इस सवाल से ज्यादा यह जानना महत्वपूर्ण है कि जहां शिवसेना अभी भी एक मुंबई-केन्द्रित या महाराष्ट्र-केन्द्रित दल से ऊपर नहीं उठ पाई है, वहीं इसकी सहयोगी भाजपा आज पूरे भारत में एक मजबूत राजनीतिक ताकत बन गई है. पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु-कर्नाटक तक भाजपा अन्य राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों के सामने एक मजबूत शक्ति बन चुकी है, जबकि शिवसेना अभी भी मुंबई में क्षेत्रीय स्तर पर अपने पुराने और परंपरागत मुद्दों में ही उलझी हुई है. पिछले करीब दो सालों से शिवसेना भाजपा पर हमलावर बनी हुई है. नोटबंदी और जीएसटी समेत केंद्र के कई निर्णयों पर शिवसेना ने तीखे हमले किए हैं. पाकिस्तान के साथ रिश्ते, सीमा पर हो रही घटनाएं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का काम और आर्थिक नीतियों पर शिवसेना के बोल वही रहे हैं जो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के हैं. यही नहीं शिवसेना ने एक बार तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तारीफ भी की है.

भाजपा ने अपने परंपरागत समर्थकों को नाराज करने का खतरा उठाते हुए कठोर हिंदूवाद से खुद को अलग करने की लगातार कोशिश की है. हाल ही में विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया का भाजपा से मोहभंग भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है. लेकिन शिवसेना अभी भी अपनी सोच बदलने को तैयार नहीं है. इसका स्पष्ट संकेत पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने यह कहकर दिया है कि न केवल महाराष्ट्र में, बल्कि राज्य के बाहर भी हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी. उन्होंने कहा कि पार्टी की हार होती है या जीत यह जरूरी नहीं, पार्टी की विचारधारा जरूरी है.

शिवसेना का कहना है कि उसने गठबंधन धर्म निभाने के लिए हमेशा ही समझौता किया है, लेकिन भाजपा ने शिवसेना को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. शिवसेना चाहेगी कि गठबंधन से अलग होने के निर्णय को प्रदेश के लोग उसकी ‘गरिमा’ के साथ जोड़कर देखें. उद्धव का यह बयान ही शिवसेना के इस निर्णय के पीछे की सोच को स्पष्ट रूप से दर्शाता है. ऐसे में यह भी कहा जा सकता है कि शिवसेना के अलग चुनाव लड़ने के फैसले से भाजपा में कोई ज्यादा परेशानी देखने को नहीं मिलेगी.

शिवसेना के इस नए रूप में उद्धव ठाकरे के बेटे और दिवंगत बाल ठाकरे के पोते आदित्य ठाकरे को शिवसेना का नया नेता चुना गया है. यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस युवा नेता को अपने तेवर दिखाने और खुद को स्थापित करने के लिए किसी अन्य धर्म या दल की जरूरत नहीं पड़ेगी– अपनी ही पार्टी की पूर्व सहयोगी भाजपा को ही शिवसेना समर्थकों और कमोबेश महाराष्ट्र की सभी समस्याओं के लिए दोषी ठहराया जा सकेगा.

(रतनमणि लाल वरिष्ठ लेखक और स्‍तंभकार है)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)