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74 साल में भी नहीं टूटा इन 2 भारतीयों का ये नायाब रिकॉर्ड, जानिए डिटेल

टीम इंडिया के खिलाड़ियों ने क्रिकेट के कई रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं, लेकिन साल 1946 में एक ऐसा रिकॉर्ड बना था जो अपने आप में लाजवाब है. 

74 साल में भी नहीं टूटा इन 2 भारतीयों का ये नायाब रिकॉर्ड, जानिए डिटेल

नई दिल्ली: कुछ रिकॉर्ड खेलों की दुनिया में सदा के लिए बन जाते हैं यानी ये रिकॉर्ड ऐसे होते हैं कि इन्हें अजेय मान लिया जाता है. ऐसा ही एक रिकॉर्ड 74 साल पहले आज ही के दिन इंग्लैंड की धरती पर 2 भारतीय क्रिकेटर्स शूटे बनर्जी (Shute Banerjee) और चंदू सरवटे (Chandu Sarwate) की जोड़ी ने बनाया था. इन दोनों ने 10वें यानी आखिरी विकेट के लिए क्रिकेट इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी साझेदारी का रिकॉर्ड तो बनाया ही था. साथ में दोनों ने ही शतक भी ठोक दिए थे, जो आज तक दोबारा कोई नंबर 10 और 11 बल्लेबाज नहीं दोहरा पाए हैं. बनर्जी और सरवटे के इस रिकॉर्ड ने न केवल टीम इंडिया को इंग्लैंड की धरती पर जीत का स्वाद चखाया था बल्कि आने वाले टाइम की भारतीय क्रिकेट का भी नजारा दुनिया को करा दिया था.

सरे के साथ द ओवल मे था टूर मैच

भारतीय टीम 1936 के इंग्लैंड दौरे के 10 साल बाद 1946 में पहली बार विदेशी दौरे पर आई थी. टूर मैचों में पहला मुकाबला वूरस्टरशायर से 16 रन से हारने के बाद दूसरे मैच में बारिश के कारण आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से ड्रा खेलना पड़ा था. तीसरे टूर मैच में द ओवल के मैदान पर सरे के साथ मुकाबला था, जिसके लिए एलक बेडसर और एल्फ गोवर सरीखे दिग्गज गेंदबाज खेल रहे थे. टीम इंडिया के लिए दिक्कत ये हुई कि मैच में उसे अपने दोनों स्टार खिलाड़ियों लाला अमरनाथ और कप्तान नवाब पटौदी सीनियर के बिना उतरना था.

इन दोनों की ही तबीयत खराब थी. द ओवल स्टेडियम सेकंड वर्ल्ड वार में बंदी गृह बनाए जाने और जर्मन विमानों की बमबारी का शिकार होने के चलते भयावह दिखता था. ऐसे में टीम इंडिया के कप्तान विजय मर्चेंट ने शनिवार को चालू हुए मैच में टास जीतकर पहले बल्लेबाजी का निर्णय लिया. मर्चेंट (53) और गुल मोहम्मद (89) के बीच तीसरे विकेट के लिए 111 रन की साझेदारी के बावजूद बेडसर (5 विकेट) की गेंदबाजी के आगे टीम इंडिया के 9 विकेट 205 रन पर गिर गए.

सरे के कप्तान ने सोचा पारी खत्म, बुलाया ग्राउंड्समैन को रोलर के लिए

सरे के कप्तान बेनेट ने सोचा कि भारतीय पारी बस कुछ मिनटों की ही मेहमान बची है. इसलिए उन्होंने ग्राउंड्समैन को बुलाकर ये समझाना चालू कर दिया कि उन्हें अपनी टीम की बल्लेबाजी से पहले पिच पर कौन सा रोलर चलवाना है.

4:03 बजे पिच पर पहुंचे बनर्जी

टीम के 9 विकेट गिरने के बाद चालू हुई बनर्जी और सरवटे की ऐतिहासिक साझेदारी. जब नंबर 11 के तौर पर बनर्जी पिच पर पहुंचे तो शाम के 4.03 बजे थे. दोनों ने आक्रामक बल्लेबाजी चालू की. ऑफ साइड पर दोनों के शाट्स का सरे के गेंदबाजों पर कोई जवाब नहीं था. इस दौरान 39 वर्षीय एल्फ गोवर के चोटिल हो जाने का भी फायदा सरवटे और बनर्जी की जोड़ी को मिला. शनिवार का खेल खत्म होने तक सरवटे ने 107 रन बना लिए थे और बनर्जी 87 रन पर नाटआउट टिके हुए थे. दोनों ने महज 2 घंटे के खेल में 193 रन की साझेदारी कर ली थी.

रविवार को आराम के दिन के बाद सोमवार सुबह 11.30 बजे खेल चालू हुआ तो दर्शकों और मीडियाकर्मियों की भीड़ देखने लायक थी. सभी को महज ये जिज्ञासा थी कि ये जोड़ी 1919 में बनी 10वें विकेट की 307 रन की रिकार्ड साझेदारी तोड़ पाएगी या नहीं. बनर्जी के लेग साइड में गेंद को पुश करके तेजी से अपना 99वां रन लेने के साथ ही इस जोड़ी ने 1909 में केंट काउंटी के फ्रेंक वूली और एल्बर्ट फील्डर की 235 रन की साझेदारी का रिकार्ड तोड़ दिया, जो उस समय तक इंग्लैंड की धरती पर 10वें विकेट की सबसे बड़ी साझेदारी थी.

बनर्जी के आउट होने से टूटी साझेदारी पर बन चुका था रिकार्ड
12:27 बजे आखिरकार जैक पार्कर की गेंद पर बनर्जी डिफेंसिव पुश करने में चूके और बोल्ड हो गए. इसी के साथ उनकी और सरवटे की साझेदारी 249 रन पर टूट गई, लेकिन उस समय तक बनर्जी 121 रन बना चुके थे और सरवटे नाटआउट 124 रन अपने खाते में जोड़ चुके थे. दोनों की जोड़ी 307 रन की सबसे बड़ी साझेदारी का रिकार्ड तो नहीं तोड़ पाई, लेकिन ये क्रिकेट इतिहास में आज तक का पहला और आखिरी मौका था, जब 10वें और 11वें नंबर के बल्लेबाज ने एकसाथ शतक ठोका था. इसके चलते दोनों का नाम हमेशा के लिए क्रिकेट इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. भारतीय टीम का पहली पारी में स्कोर रहा 454 रन.

दोनों कर चुके थे घरेलू क्रिकेट में ओपनिंग

दरअसल शूटे बनर्जी और चंदू सरवटे को भले ही कप्तान विजय मर्चेंट ने सबसे आखिर में भेजा हो, लेकिन असल में वे इतने खराब बल्लेबाज नहीं थे. दोनों ही घरेलू क्रिकेट में ओपनिंग कर चुके थे और दोनों के ही नाम पर फर्स्ट क्लास क्रिकेट में शतक दर्ज हो चुके थे. बनर्जी ने पिछले रणजी सीजन में बिहार के लिए ओपनिंग करते हुए भी फिफ्टी ठोकी थी, जबकि सरवटे भी होल्कर की टीम के लिए रणजी ट्रॉफी सेमीफाइनल में ओपनिंग कर चुके थे. इतना ही नहीं बनर्जी और सरवटे वास्तव में 1945-46 के सीजन में पूर्व क्षेत्र की टीम के लिए खेलते हुए एकसाथ ओपनिंग करने उतर चुके थे यानी ये पहला मौका नहीं था, जब वे विकेट पर साथी बल्लेबाजों के तौर पर मौजूद थे.

बनर्जी-सरवटे के बाद नायडू ने रचा इतिहास

इस मैच में इतिहास रचने का कारनामा महज बनर्जी और सरवटे ने ही नहीं किया था बल्कि सीएस नायडू ने भी अपना नाम इतिहास में दर्ज कराया था. दरअसल इतनी लंबी साझेदारी के कारण टीम का मुख्य तेज गेंदबाज होने के बावजूद विजय मर्चेंट ने शूटे बनर्जी को गेंद फेंकने के बजाय आराम का मौका दिया. सीएस नायडू गेंदबाजी के लिए उतरे और हैट्रिक बना दी. ये इंग्लैंड की धरती पर किसी भारतीय गेंदबाज की पहली हैट्रिक थी. सरे की टीम महज 135 रन पर लुढ़क गई.

सरवटे ने गेंदबाजी में भी किया कमाल

सरे ने फॉलोआन पारी खेलते हुए सोमवार का खेल खत्म होने तक बिना विकेट खोए 172 रन बना लिए थे. लेकिन मंगलवार को उन पर चंदू सरवटे एक बार फिर भारी पड़ गए. इस बार सरवटे ने गेंद से कमाल दिखाया और 54 रन देकर 5 विकेट लेते हुए सरे की टीम को 338 रन पर लुढ़का दिया. भारतीय टीम को जीत के लिए 20 रन का लक्ष्य मिला  तो कप्तान मर्चेंट ने सरवटे को ही ओपनिंग करते हुए ये 20 रन बनाने का मौका दिया. हालांकि सरवटे महज 1 रन बनाकर आउट हो गए, लेकिन भारतीय टीम ने 9 विकेट से मैच जीतकर इतिहास रच दिया.

बदकिस्मत थे बनर्जी, महज एक टेस्ट खेल पाए

शूटे बनर्जी को क्रिकेट विशेषज्ञ भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे दुर्भाग्यशाली क्रिकेटरों में से एक गिनते हैं. बेहद तेज गेंदबाज और अच्छा आलराउंडर होने के बावजूद शूटे को शुरुआती दौर में अमर सिंह और मोहम्मद निसार की बेहतरीन तेज गेंदबाज जोड़ी के चलते मौका नहीं मिल पाया. इसके बाद 10 साल सेकंड वर्ल्ड वार के कारण बेकार हो गए. 1946 के दौरे पर भी इस रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन के बावजूद शूटे को टेस्ट मैच में डेब्यू करने का मौका नहीं मिला.

करीब 3 साल बाद 38 साल की उम्र में शूटे ने वेस्टइंडीज के खिलाफ मुंबई में अपना इकलौता टेस्ट मैच खेला. जिसमें उन्होंने एक पारी में 54 रन देकर 4 विकेट और मैच में कुल 5 विकेट चटकाए. इतना बेहतरीन ऑलराउंड प्रदर्शन करने वाले चंदू सरवटे ने 9 टेस्ट मैच खेले, लेकिन कभी उस स्तर का प्रदर्शन नहीं कर पाए. उन्होंने बल्ले से महज 208 रन बनाए तो गेंद से केवल 3 विकेट ही उनके हिस्से में आए.