close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

इस 'फर्राटा गर्ल' पर लगा था पुरुष होने का आरोप, अब एशियन गेम्स में जीते 2 मेडल

इस फर्राटा धाविका ने गांव की गलियों से सिंथेटिक रेसिंग ट्रैक तक का सफर कड़े संघर्षों के बाद तय किया है.

इस 'फर्राटा गर्ल' पर लगा था पुरुष होने का आरोप, अब एशियन गेम्स में जीते 2 मेडल
दुती चंद ओडिशा के चाका गोपालपुर गांव की रहने वाली हैं.

जकार्ता: भारत की महिला धावक दुती चंद ने इंडोनेशिया में जारी 18वें एशियाई खेलों के 11वें दिन बुधवार को 200 मीटर में सिल्वर मेडल जीता. दुती ने फाइनल में 23.20 सेकंड का समय निकालते हुए दूसरा स्थान हासिल किया. इन खेलों में दुती का यह दूसरा सिल्वर मेडल है. इससे पहले उन्होंने 100 मीटर स्पर्धा का सिल्वर मेडल अपने नाम किया था.

एशियन गेम्स में भारत का नाम ऊंचा करने वाली इस फर्राटा धाविका ने गांव की गलियों से सिंथेटिक रेसिंग ट्रैक तक का सफर कड़े संघर्षों के बाद तय किया है. दुती चंद का बुरा समय जून 2014 में शुरू हुआ जब एथलेटिक्स फेडेरेशन ऑफ इंडिया ने दुती को जेंडर टेस्ट के लिए बुलाया. जेंडर टेस्ट में उनके पुरुष हार्मोन लेवल की जांच होनी थी जिसे हाइपरएन्ड्रोजेनिज्म कहते हैं. बिना किसी जांच और पुष्टि के उन्हें निलंबित कर दिया गया और वे ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेंलो में भाग नहीं ले सकीं.

हाइपर एंड्रोजेनिम्स एक प्रकार का मेडिकल कंडीशन है, जिसमें महिलाओं के शरीर में एंड्रोजेन्स (टेस्टोस्टेरोन जैसे पुरुष सेक्स हार्मोन) की अधिकता हो जाती है.  दुनिया भर में कई एथलीट इस मेडिकल कंडीशन के कारण मुश्किल झेल चुकी हैं.

विपरीत हालातों में दुती चंद ने हार नहीं मानी और इसको लेकर खेल पंचाट (सीएएस) में अपील की, जहां से उन्हें फौरी तौर पर राहत मिली. सीएएस ने सुनवाई में कहा था कि भविष्य में अगर दुती के खिलाफ नए सबूत नहीं ला सका तो आईएएफ को अपना फैसला वापस लेना होगा.

कोच ने हिम्मत बढ़ाई
दुती चंद ने बताया कि हमेशा यह सोचती थी कि अगर इस मामले में फैसला पक्ष में नहीं आया तो क्या करूंगी. मेरे साथ के लोग हमेशा कहता थे कि जब तक खेल सकती हो, खेलो.  मुश्किल के इस क्षण में दुती के कोच रमेश ने भी उनकी हिम्मत बढ़ाई. रमेश कहते हैं कि दुती ने उस समय काफी दुख झेला और आज उस दौर से निकल कर वह जहां खड़ी हैं, वह बहुत बड़ी बात है.

पुलेला गोपीचंद की मदद
दुती चंद के हालात बदलने में ही गोपीचंद की भूमिका उल्लेखनीय है. जब दुती साल 2014 के कॉमनवेल्थ खेलों का हिस्सा नहीं बन सकी थीं. उन्हें सब कुछ शून्य से शुरू करना था. उस समय उन्हें स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) के सेंटर में रहना कई मुश्किलों से भरा लग रहा था. इस मौके पर दुती के कोच एन रमेश अपने मित्र पुलेला गोपीचंद से संपर्क कर मदद मांगी और गोपीचंद ने बिना हिचके दुती को अपनी पुलेला गोपीचंद बैडमिंटन एकेडमी फाउंडेशन के दरवाजे खोल दिए.

दुती चंद ने 100 और 200 मीटर रेस में सिल्वर जीते, पीटी उषा के बाद ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला
3 फरवरी 1996 को जन्मी दुती चंद ओडिशा के चाका गोपालपुर गांव की रहने वाली हैं. उनके पिता गरीब बुनकर हैं. दुती के नौ सदस्यीय परिवार में पांच बहनें और एक भाई है. पिता की 500 से 1000 रुपए आमदनी होने के कारण दुती चंद के परिवार ने काफी गरीबी झेली और इसी वजह से उनके भाई-बहन की अच्छी पढ़ाई-लिखाई नहीं हो सकी. हालांकि, दुती के खेलों में आने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ हैं. वहीं, अब एशियन गेम्स में सिल्वर जीतने के बाद ओडिशा सरकार ने दुती चंद को 1.5 करोड़ रुपए देने की घोषणा की है.