अर्जुन अवॉर्ड विनर बनी पहलवान दिव्या काकरन के परिवार की संघर्ष की कहानी

दंगल फिल्म वाली गीता फोगाट जैसी ही संघर्षभरी है मुजफ्फरनगर की दिव्या काकरन की दास्तां. उनकी कामयाबी में उनके माता-पिता का बड़ा रोल रहा है.

अर्जुन अवॉर्ड विनर बनी पहलवान दिव्या काकरन के परिवार की संघर्ष की कहानी
एक मुकाबले के दौरान पहलवान दिव्या काकरान. (फोटो-Twitter/@divyawrestler)

नई दिल्ली: हौसला, जिद और कुछ कर दिखाने का जुनून, ये वो तीन मूल मंत्र हैं, जो किसी भी खिलाड़ी की सफलता तय करते हैं. ये बात देश के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स से लेकर एशियन गेम्स तक में मेडल जीत चुकी महिला पहलवान दिव्या काकरान (Divya Kakran) ने भी साबित की है. 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की क्राइम कैपिटल कहलाने वाले मुजफ्फरनगर के गांव पुरबालियान की इस छोरी को उसकी सफलताओं के लिए राष्ट्रीय खेल दिवस (National Sports Day) पर शनिवार को अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस अवॉर्ड तक पहुंचने के लिए दिव्या को क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े हैं? दरअसल दिव्या के कुश्ती मैट पर विपक्षी पहलवानों को चित करने से पहले उनके माता-पिता को जिंदगी के 'दांवपेंच' का सामना करना पड़ा था. 
 

 

पिता भी करते थे पहलवानी
दरअसल दिव्या के पिता सूरज काकरान भी गांव में पहलवानी करते थे. बड़ा पहलवान बनने के मकसद से वे 1990 में दिल्ली आ गए. यहां पहलवान नहीं बन पाए तो वापस गांव लौटकर दूध का कारोबार करने लगे. शादी हो गई और बच्चे भी हो गए, लेकिन दूध का कारोबार फेल हो गया. तब तक दिव्या भी बड़ी होने लगी थी और घर में ही पहलवानी के दांवपेंच दिखाने लगी थीं. 

गीता फोगाट की कहानी से मिली प्रेरणा
दिव्या के पिता ने एक दिन गीता फोगाट (Geeta Phogat) की कहानी एक अखबार में पढ़ी तो उन्हें लगा कि मेरी बेटी भी पहलवान क्यों नहीं बन सकती. बस इसके बाद वे फिर से दिल्ली आ गए और पूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी में एक कमरे का घर किराये पर ले लिया. वे दिव्या को रोजाना अखाड़े में लेकर जाने लगे.
 

 

घर चलाने के लिए बेचने लगे लंगोट, मां ने बेचा मंगलसूत्र
दिल्ली आने के बाद जब कुछ और काम नहीं मिला तो दिव्या की मां संयोगिता ने दर्जी बनकर सिलाई मशीन थाम ली. संयोगिता पहलवानों के लिए लंगोट बनाने लगी और सूरज उन्हें अखाड़ों में जाकर बेचने लगे. दूर-दूर तक के गांवों में भी दंगल के दौरान वे लंगोट का बंडल लेकर पहुंच जाते थे. 

इसी तरह से घर का गुजारा किसी तरह से होने लगा था. इस दौरान दिव्या को पहलवान बनाने का संघर्ष भी जारी रहा. लोग भद्दे कमेंट करते थे, लेकिन सूरज काकरान ने कभी किसी की बात नहीं सुनी. आर्थिक संकट ऐसा रहा कि एक बार दिव्या को दंगल के लिए भेजने को उसकी मां संयोगिता को अपना मंगलसूत्र तक बेचना पड़ा.

गीता की तरह ही पहला दंगल लड़के से, मिला 30 रुपये का इनाम
दिव्या को भी अपना पहला दंगल गीता फोगाट की ही तरह एक पुरुष पहलवान से लड़ना पड़ा था. दिव्या ने एक इंटरव्यू में बताया था कि इस दंगल के लिए उन्हें 30 रुपये का इनाम मिला था. लेकिन इसके बाद उन्हें ये पैसे कमाकर माता-पिता की मदद करने का जरिया लगा. वे पुरुष पहलवानों को चैलेंज कर दंगल लड़ने लगी थी.
 

 

कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में मेडल
अपने करियर में दिव्या काकरान ने 2018 में गोल्डकोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स और जकार्ता एशियन गेम्स में ब्रांज मेडल अपने नाम किए थे. एशियन चैंपियनशिप में एक सिल्वर और एक ब्रांज मेडल जीतने के बाद इस साल के शुरू में गोल्ड मेडल भी अपने नाम कर लिया था. नेशनल लेवल पर दिव्या के खाते में अब तक 20 से ज्यादा गोल्ड मेडल दर्ज हो चुके हैं.