ज़िंदगी से यही गिला है मुझे... तू बहुत देर से मिला है मुझे
इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएं... क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ... आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
हुआ है तुझ से बिछड़ने के बा'द ये मा'लूम... कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल... कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर... जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे
अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर... चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए
इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब... इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम
ढूँड उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती... ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें