"कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी, कुछ मुझे भी ख़राब होना था"

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

शर्मसार

हुस्न को शर्मसार करना ही... इश्क़ का इंतिक़ाम होता है

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

मिज़ाज

फिर मिरी आंख हो गई नमनाक... फिर किसी ने मिज़ाज पूछा है

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

आंख

आंख से आंख जब नहीं मिलती... दिल से दिल हम-कलाम होता है

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

जवानी

क्यूं जवानी की मुझे याद आई... मैं ने इक ख़्वाब सा देखा क्या था

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

तूफ़ां

डुबो दी थी जहां तूफ़ां ने कश्ती... वहाँ सब थे ख़ुदा क्या ना-ख़ुदा क्या

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

नक़ाब

मुझ को ये आरज़ू वो उठाएं नक़ाब ख़ुद... उन को ये इंतिज़ार तक़ाज़ा करे कोई

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

उलझे

क्या क्या हुआ है हम से जुनूं में न पूछिए... उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

मुसलमां

हिन्दू चला गया न मुसलमां चला गया... इंसां की जुस्तुजू में इक इंसां चला गया

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

आवारा

आवारा ओ मजनूं ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ... मिलने हैं अभी मुझ को ख़िताब और ज़ियादा

Published by: Siraj Mahi | May 29, 2024

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