हुस्न को शर्मसार करना ही... इश्क़ का इंतिक़ाम होता है
फिर मिरी आंख हो गई नमनाक... फिर किसी ने मिज़ाज पूछा है
आंख से आंख जब नहीं मिलती... दिल से दिल हम-कलाम होता है
क्यूं जवानी की मुझे याद आई... मैं ने इक ख़्वाब सा देखा क्या था
डुबो दी थी जहां तूफ़ां ने कश्ती... वहाँ सब थे ख़ुदा क्या ना-ख़ुदा क्या
मुझ को ये आरज़ू वो उठाएं नक़ाब ख़ुद... उन को ये इंतिज़ार तक़ाज़ा करे कोई
क्या क्या हुआ है हम से जुनूं में न पूछिए... उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम
हिन्दू चला गया न मुसलमां चला गया... इंसां की जुस्तुजू में इक इंसां चला गया
आवारा ओ मजनूं ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ... मिलने हैं अभी मुझ को ख़िताब और ज़ियादा