'ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब'; चकबस्त ब्रिज नारायण के शेर

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

गर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता... न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

चराग़ क़ौम का रौशन है अर्श पर दिल के... उसे हवा के फ़रिश्ते बुझा नहीं सकते

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

मज़ा है अहद-ए-जवानी में सर पटकने का... लहू में फिर ये रवानी रहे रहे न रहे

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब... मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे... साक़िया जाते हैं महफ़िल तिरी आबाद रहे

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

जो तू कहे तो शिकायत का ज़िक्र कम कर दें... मगर यक़ीं तिरे वा'दों पे ला नहीं सकते

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं... यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

ये कैसी बज़्म है और कैसे उस के साक़ी हैं... शराब हाथ में है और पिला नहीं सकते

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग ओ समर जाना... ख़ुदा को बाग़बाँ और क़ौम को हम ने शजर जाना

Published by: Siraj Mahi | Sep 23, 2023

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