उस दौर के लोग इब्राहिम (अ.स.) और इस्माइल (अ.स.) से बेहद मोहब्बत करते थेस, और वह काबा जुड़े पत्थर को भी पाक मानने लगे और उसे घर ले जाने लगे.
लोगों का मानना था कि काबा के पास के ये पत्थर खुदा और उनके बीच का जरिया है, इसी के जरिए दुआएं कबूल होंगी.
यहां तक की सफर या कारोबार पर जाने वाले लोग अपने साथ पत्थर रखते थे ताकि बरकत और हिफाज़त मिल सके.
समय के साथ इन पत्थरों को चूमना, सजाना और उनसे मांगना बुतपरस्ती (आइडल वर्शिप) में बदल गया.
अगर किसी को ऐसा पत्थर मिलता जो जानवर या इंसान जैसी शक्ल रखता, तो उसे घर में रखकर पूजा शुरू कर देते.
इसके बाद अरबों ने खुद पत्थरों को काट-छांटकर उन्हें शक्ल देना शुरू किया और उन्हें देवता/बुजुर्गों से जोड़कर इबादत करने लगे.
अरब में पहली मूर्ति 'हुबल' की लाई गई. इसे अम्र-बिन-लुहय्यी नामक शख्स लाया था.
जमजम के पास इसाफ और नाइला नाम की मूर्तियां रखी गईं.
अलग-अलग कबीलों की अपनी-अपनी मूर्तियां थीं. मिसाल के तौर पर कुरैश की उज्जा, सकीफ की लात और औस और खजरज की मनात. मूर्ति पूजा शुरू होने में सदियों लगीं.