'भूल जाओगे कि रहते थे यहाँ दूसरे लोग'; इरफ़ान सिद्दीकी के शेर

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

उस की आंखें हैं कि इक डूबने वाला इंसां... दूसरे डूबने वाले को पुकारे जैसे

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

जाने क्या ठान के उठता हूं निकलने के लिए... जाने क्या सोच के दरवाज़े से लौट आता हूँ

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

अब आ गई है सहर अपना घर संभालने को... चलूँ कि जागा हुआ रात भर का मैं भी हूँ

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

उस को मंज़ूर नहीं है मिरी गुमराही भी... और मुझे राह पे लाना भी नहीं चाहता है

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

नफ़रत के ख़ज़ाने में तो कुछ भी नहीं बाक़ी... थोड़ा सा गुज़ारे के लिए प्यार बचाएँ

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

मैं झपटने के लिए ढूंढ रहा हूं मौक़ा... और वो शोख़ समझता है कि शरमाता हूं

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

रूप की धूप कहां जाती है मालूम नहीं... शाम किस तरह उतर आती है रुख़्सारों पर

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

उड़े तो फिर न मिलेंगे रफ़ाक़तों के परिंद... शिकायतों से भरी टहनियाँ न छू लेना

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

भूल जाओगे कि रहते थे यहां दूसरे लोग... कल फिर आबाद करेंगे ये मकां दूसरे लोग

Published by: Siraj Mahi | Apr 15, 2024

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