इस्लाम में खुदकुशी को हराम करार दिया गया है. ऐसा इसलिए कि इस्लाम में आत्महत्या को हराम बताया गया है.
इस्लाम में माना जाता है कि इंसान का अपना जिस्म और उसकी जिंदगी उसकी अपनी नहीं, बल्कि यह अल्लाह की दी हुई अमानत है, जिसकी हर हाल में उसे हिफाजत करनी है.
बाकी नेमतों की तरह ज़िन्दगी भी इंसान के लिए अल्लाह की दी हुई एक नेमत है. ये किसी इंसान को एक बार मिलती है. इसे में उसे अपने रब को राज़ी कर वापस उसके पास जाना होता है.
इसलिए इस्लाम में हुक्म दिया गया है कि अपनी जिंदगी और अपने जिस्म की हिफाजत करो. यही वजह है कि इस्लाम ने खुदकुशी को हराम करार दिया है.
इस्लाम किसी भी शख्स को अपनी जान लेने का हरगिज हक नहीं देता. यानी जब इंसान अपनी जान का मालिक ही नहीं है, तो फिर वो अपनी जान लेने के फैसला कैसे कर सकता है.
जिस तरह से इस्लाम में किसी इंसान का कत्ल करना पूरी इंसानियत का कत्ल करने के बराबर है, उसी तरह से अपनी जिंदगी को खत्म करना अल्लाह के नजदीक न पसंदीदा अमल है.
एक हदीस में है कि "तुम्हारे जिस्म का भी तुम पर हक है और आखों का तुम पर हक है." (हदीस: बुखारी)
प्रोफेट मोहम्मद (स.) ने खुदकुशी को दर्दनाक अजाब के काबिल बताया है कि "वह दोजख में जाएगा, हमेशा उसमें गिरता रहेगा और हमेशा हमेशा वहीं रहेगा."
कुरान में जिक्र है कि "और अपने ही हाथों खुद को हलाकत में न डालो, और साहेबान-ए-एहसान बनो, बेशक अल्लाह एहसान वालों से मोहब्बत करता है." (सूरा: बकर, 195:2)