'तू तो मस्जिद में है निय्यत तिरी मय-ख़ाने में'; जिगर मुराबादी के शेर

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

मैं तो जब मानूँ मिरी तौबा के बाद... कर के मजबूर पिला दे साक़ी

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

पी रहा हूँ आँखों आँखों में शराब... अब न शीशा है न कोई जाम है

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

बराबर से बच कर गुज़र जाने वाले... ये नाले नहीं बे-असर जाने वाले

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

नियाज़ ओ नाज़ के झगड़े मिटाए जाते हैं... हम उन में और वो हम में समाए जाते हैं

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

आँखों में नूर जिस्म में बन कर वो जाँ रहे... या'नी हमीं में रह के वो हम से निहाँ रहे

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

जो उन पे गुज़रती है किस ने उसे जाना है... अपनी ही मुसीबत है अपना ही फ़साना है

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

हज्व ने तो तिरा ऐ शैख़ भरम खोल दिया... तू तो मस्जिद में है निय्यत तिरी मय-ख़ाने में

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है... अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

ये रोज़ ओ शब ये सुब्ह ओ शाम ये बस्ती ये वीराना... सभी बेदार हैं इंसाँ अगर बेदार हो जाए

Published by: Siraj Mahi | Apr 06, 2024

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