मैं तो जब मानूँ मिरी तौबा के बाद... कर के मजबूर पिला दे साक़ी
पी रहा हूँ आँखों आँखों में शराब... अब न शीशा है न कोई जाम है
बराबर से बच कर गुज़र जाने वाले... ये नाले नहीं बे-असर जाने वाले
नियाज़ ओ नाज़ के झगड़े मिटाए जाते हैं... हम उन में और वो हम में समाए जाते हैं
आँखों में नूर जिस्म में बन कर वो जाँ रहे... या'नी हमीं में रह के वो हम से निहाँ रहे
जो उन पे गुज़रती है किस ने उसे जाना है... अपनी ही मुसीबत है अपना ही फ़साना है
हज्व ने तो तिरा ऐ शैख़ भरम खोल दिया... तू तो मस्जिद में है निय्यत तिरी मय-ख़ाने में
हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है... अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं
ये रोज़ ओ शब ये सुब्ह ओ शाम ये बस्ती ये वीराना... सभी बेदार हैं इंसाँ अगर बेदार हो जाए