Karbala Poetry: कर्बला पर मशहूर शायरों के शेर

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

मेरे सीने से ज़रा कान लगा कर देखो, साँस चलती है कि ज़ंजीर-ज़नी होती है

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

बुलंद हाथों में ज़ंजीर डाल देते हैं, अजीब रस्म चली है दुआ न माँगे कोई

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

जब भी ज़मीर-ओ-ज़र्फ़ का सौदा हो दोस्तो, क़ाएम रहो हुसैन के इंकार की तरह

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

फिर कर्बला के ब'अद दिखाई नहीं दिया, ऐसा कोई भी शख़्स कि प्यासा कहें जिसे

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

साँस लेता हूँ तो रोता है कोई सीने में, दिल धड़कता है तो मातम की सदा आती है

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

कल जहाँ ज़ुल्म ने काटी थीं सरों की फ़सलें, नम हुई है तो उसी ख़ाक से लश्कर निकला

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

तुम जो कुछ चाहो वो तारीख़ में तहरीर करो, ये तो नेज़ा ही समझता है कि सर में क्या था

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

किस शेर की आमद है कि रन कांप रहा है, रुस्तम का जिगर जेर कफन कांप रहा है

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

खास से है खाक को उल्फत तड़पता हूं अनीस, कर्बला के वास्ते मैं कर्बला के लिए

Published by: Siraj Mahi | Jul 15, 2024

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